जिला प्रशासन द्वारा स्वतंत्रता सेनानी के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटकर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई।
मन में था जोश देश भक्ति का और अपने शरीर से कई चिकित्सकों को शिक्षा देने की भावना
यह कहानी है 102 वर्षीयस्वतंत्रता सेनानी एवं शिक्षाविद् मदन चंद्र भुइयां की
लखीमपुर जिले के चराइदोलोनी निवासी प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् एवं समाज सुधारक मदन चंद्र भूईयां ने आजीवन अपने दिल में देशभक्ति का जोश लिए अपने पूर्ण स्वस्थ जीवन काल में ही निर्णय लिया था कि मरने के बाद भी उनका पार्थिव शरीर देश के काम आए। इसीलिए इसी दृढ़ संकल्प के साथ उन्होंने अपना शरीर चिकित्सा महाविद्यालय को दान देने की शपथ खाई थी और सभी सरकारी अधिकारी कार्रवाई को पूरी कर ली थी।
उनकी इस मनोकामना को उनके परिवार के सभी सदस्यों ने पूरा किया और एक सौ दो वर्ष की आयु में उनके मरणोपरांत उनके शव को लखीमपुर चिकित्सा महाविद्यालय में परिवार के सदस्यों द्वारा दान किया गया ताकि उनके शरीर से भी कई देशभक्त चिकित्सक बनकर निकले और राष्ट्र की सेवा करें
उनका 20 मई 2026 की सुबह 5 बजे निधन हो गया। उन्होंने असम मेडिकल कॉलेज में अंतिम सांस ली। वे 102 वर्ष के थे। उनके निधन से असम ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खो दिया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा, शिक्षा और समाज कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उनकी अंतिम यात्रा पर असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने उनके देश भक्ति और उपलब्धियां के बारे में बताते हुए शोक व्यक्त किया अब और एक अब पूर्णिय क्षति बताई। उनके निवास स्थान पर लखीमपुर जिला प्रशासन द्वारा स्वतंत्रता सेनानी के पार्थिव शरीर को को तिरंगे में लपेटकर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। लखीमपुर जिलाउपायुक्त आदित्य विक्रम यादव ने असम सरकार के तरफ से श्रद्धा सुमन अर्पित किए ।
1925 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान जन्मे मदन चंद्र भुइयां छात्र जीवन से ही देशभक्ति की भावना से प्रेरित थे। वर्ष 1942 के क्विट इंडिया मूवमेंट में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। महात्मा गांधी के आदर्शों और श्रीमंत शंकर देव तथा माधव देव की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्होंने भूमिगत आंदोलन में संदेशवाहक, आयोजक और युवा प्रेरक के रूप में कार्य किया। ब्रिटिश शासन की कड़ी निगरानी के बावजूद वे गुप्त संदेश पहुंचाने, स्वतंत्रता सेनानियों की सहायता करने और तिरंगा फहराने जैसे आंदोलनों में शामिल रहे।
स्वतंत्रता के बाद उन्होंने 1954 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और शिक्षक के रूप में अपना जीवन शुरू किया। 1955 में उन्हें नागालैंड के थेमकेइदिमा हाई स्कूल में हिंदी शिक्षक के रूप में नियुक्त किया गया। 1956 के नागा विद्रोह के दौरान उग्रवादियों ने उनके आवास पर हमला किया, जहां उन्होंने मृत होने का नाटक कर अपनी जान बचाई। बाद में भारतीय सेना ने उन्हें सुरक्षित बाहर निकाला। असम लौटने के बाद उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक योगदान दिया। उन्होंने हरमोटी पिचोला मिडिल इंग्लिश स्कूल की स्थापना की और संस्थापक प्रधानाध्यापक के रूप में कार्य किया।
वे नैतिक मूल्यों, संस्कृति और सामाजिक जिम्मेदारी पर आधारित शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। शिक्षकों के अधिकारों और कल्याण के लिए भी उन्होंने लगातार कार्य किया तथा मिडिल इंग्लिश टीचर्स एसोसिएशन के जिला और राज्य स्तर पर कई बार अध्यक्ष रहे।
सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। वे नारायणपुर साहित्य सभा के अध्यक्ष, असम साहित्य सभा के आजीवन सदस्य तथा असम राज्य नामधर्म सेवक समाज के पदाधिकारी रहे। गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित भुइयां जीवनभर खादी पहनते रहे और समाज हित के लिए भूमि दान भी किया।
उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए असम सरकार ने 1997 में भारत की स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती पर उन्हें कॉपर मोमेंटो से सम्मानित किया। वर्ष 2013 में उन्हें पद्मनाथ गोहाई बरुआ जीवन समृद्धि अवार्ड प्रदान किया गया। वहीं 2025 में उन्हें ऑल असम फ्रीडम फाइटर एडवाइजरी कमेटी का सदस्य नियुक्त किया गया।
वे अपने पीछे पत्नी श्रीमती रत्न प्रभा भुइयां और सात संतानों को छोड़ गए हैं। उनके पांचवें पुत्र श्रीमंत भूइयां भारतीय वायुसेना में सेवा दे चुके हैं और कारगिल युद्ध में भी भाग ले चुके हैं।
मदन चंद्र भुइयां का जीवन साहस, सादगी, देशभक्ति और निस्वार्थ सेवा की मिसाल था। स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, असमिया संस्कृति और समाज सेवा में उनका योगदान सदैव याद किया जाएगा।








कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें