पुणे से ऋचा मिश्र
पुणे, 23 सितम्बर - आज पूरे देश में गणपति विसर्जन की धूम रही। गणेश चतुर्थी के 10 दिन बाद अनंत चतुर्दशी के दिन भक्तों के घर विराजमान गणपति आज अपने घर वापस चले जाते हैं। आपको बता दें कि गणपति बप्पा का जन्मदिन 10 दिन बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है और 11वें दिन उन्हें विसर्जित किया जाता है। गणेश विसर्जन आज सुबह 07 बजकर 49 मिनट से दोपहर 12 बजकर 19 मिनट तक, दोपहर 2 बजे से शुरू होकर 3.30 बजे तक और फिर सायंकाल 6 बजकर 30 मिनट से रात्रि 11 बजे तक चला। गणेश विसर्जन के दिन बप्पा को धूम-धाम से विदा किया जाता है। अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति बप्पा मोरया की ध्वनि से पूरा माहौल गूंज उठता है। महाराष्ट्र में गणपति पूजा को बहुत बड़े रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र के मूल निवासी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं एवं अपने घर में गणपति को विराजमान करते हैं। घरो के अलावा रास्तों पर पंडाल लगाकर एवं आवासीय सोसाइटीयों के अंदर सामूहिक रूप से गणपति पूजा का पालन किया जाता है। यह तो वह बात थी जो आमतौर पर सुनी जाती है, असल बात तो यह है कि मराठी परिवार के अलावा बाहर से आए प्रवासी परिवार भी इस उत्सव को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं। हमारी बात कानपुर के प्रवासी परिवार से हुई। पुणे के वाघोली क्षेत्र के ऑक्सी वैली नामक सोसाइटी में रहने वाले नितिन गेरा एवं वर्तिका गेरा ने हमें बताया कि जब वह कानपुर में रहते थे तब वह गणपति को अपने घर में विराजमान नहीं करते थे पर पिछले कुछ सालों से पुणे में रहने के दौरान सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहलुओं के आदान-प्रदान के बाद वह गणपति को हर वर्ष अपने घर में निमंत्रित करके विराजमान करते हैं। यह भारत की परंपरा एवं संस्कृति को दर्शाता है।
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क्या है मान्याताएँ ?
गणपति या गणेश विसर्जन को लेकर कई धामिर्क और सामाजिक मान्ताएं प्रचलित हैं. ब्रिटिश काल में लोगों में एकता और सौहार्द बढ़ाने के लिए गणेश स्थापना और विसर्जन की परंपरा को फिर से शुरू किया गया। वहीं धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की कथा सुनाने के बाद भगवान गणेश का तेज शांत करने के लिए उन्हें सरोवर में डुबोया था। कहा जाता है कि वेदव्यास ने गणेश चतुर्थी के दिन से भगवान गणेश को महाभारत की कथा सुनानी शुरू की थी। लगातार 10 दिन तक वेदव्यास गणपति को कथा सुनाते रहे और गणेश जी कथा लिखते रहे। जब कथा पूरी हो गई तब वेदव्यास ने आंखें खोली तो देखा कि अत्यधिक मेहनत की वजह से गणेश जी का तापमान बढ़ा हुआ है। उनका तपामान कम करने के लिए वेदव्यास उन्हें पास के सरोवर में ले गए और स्नान कराया। उस दिन अनंत चर्तुदशी थी और तब से गणेश प्रतिमा का विसर्जन करने की परंपरा शुरू हो गई।











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