चैंबर ऑफ कॉमर्स ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को सोपा ज्ञापन
लखीमपुर से राजेश राठी और ओम प्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट
लखीमपुर: लखीमपुर नगर की व्यस्त सड़कों पर खड़े तीन स्थायी ट्रैफिक सिग्नल—मालपानी चाराली, जनता होटल तिनाली और एवरेडी पेट्रोल पंप—आज जिस बदहाली, उपेक्षा और तकनीकी जर्जरता का प्रतीक बन चुके हैं, वह पूरे शहर की यातायात व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर को सामने लाने के लिए पर्याप्त है। ये वही सिग्नल हैं जिन्हें कभी नगर की सड़क सुरक्षा की धड़कन कहा जाता था, और जिनके लाल–पीले–हरे रंगों के बदलते संकेतों पर हजारों वाहन चालकों की गति, दिशा और सुरक्षा निर्भर करती थी। लेकिन आज इन तीनों सिग्नलों की हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो शहर की अपनी ही सुरक्षा व्यवस्था को किसी ने धीरे-धीरे ‘आईसीयू’ में धकेल कर छोड़ दिया हो।मालपानी चाराली का मुख्य सिग्नल जो यातायात की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण प्वाइंट माना जाता है वह विगत कई महीनों से मानो "वेंटीलेटर" पर पड़ा अंतिम सांसें गिन रहा है। कभी-कभार इसकी लाल लाइट अकेली टिमटिमाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करती है, लेकिन पूरी प्रणाली बुरी तरह ठप है। जनता होटल तिनाली का सिग्नल सालों से अचेत अवस्था में पड़ा है उक्त ट्रैफिक सिग्नल प्वाइंट पर न लाल, न हरी, न पीली एक भी लाइट की जीवनरेखा शेष नहीं। एवरेडी पेट्रोल पंप स्थित सिग्नल का हाल इससे भी बुरा है, वर्षों से कोई भी लाइट नहीं जली। स्थानीय लोग मजाक में कहने लगे हैं कि “सिग्नल की लाइट नहीं, उसका तो मात्र इतिहास ही बचा हुआ है।”यह स्थिति केवल तकनीकी खराबी का संकेत नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक लापरवाही की भी गवाही देती है, जो शहर में चल रहे यातायात अनुशासन के बड़े दावों पर सीधे प्रश्नचिह्न लगा देती है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि ट्रैफिक विभाग अन्य मामलों में अत्यधिक सक्रिय है जैसे हेलमेट न पहनने वाले सवारों से लेकर दस्तावेजों की अवधि समाप्त होने तक, ड्राइविंग लाइसेंस न होने से लेकर छोटी-छोटी त्रुटियों पर भी हर जगह प्रतिदिन लाखों रुपए के चालान काटे जा रहे हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल चालान काटना ही ट्रैफिक प्रबंधन है? क्या शहर की आधारभूत यातायात व्यवस्था जैसे ट्रैफिक सिग्नलों की मरम्मत करवाना विभाग की उतनी ही जिम्मेदारी नहीं है? यही नहीं, इस संदर्भ में विगत कुछ दिनों पूर्व लखीमपुर चैंबर ऑफ कॉमर्स ने लखीमपुर पुलिस अधीक्षक को एक मेमोरेंडम के माध्यम से औपचारिक रूप से अवगत भी कराया था। उक्त मेमोरेंडम में इसके अलावा यातायात सुरक्षा से जुड़े कई अन्य गंभीर मुद्दे भी समाहित थे—जैसे ई-रिक्शा पर विभिन्न क्षेत्रों में निषेध से होने वाली कठिनाइयां, दुपहिया वाहन पर अत्यधिक माल लादना, फुटपाथ का खाली नहीं रहना, ट्रैक्टर ट्राली से भयानक ध्वनि प्रदुषण होना, स्कूलों के खुलने -बंद होने के समय होने वाली परिस्थिति को नियंत्रित करने के लिये व्यवस्था सुदृढ़ करना, रास्तों के किनारे निर्माण सामग्री,बांस आदि भंडारण से होने वाली असुविधा, व्यस्त मार्गों पर भारी वाहनों (FCI के माल ढोने वाले वाहन) के चलने से होने वाली असुविधा आदि। शहर के जागरूक लोगों का मानना है कि खराब ट्रैफिक सिग्नल सिर्फ असुविधा ही नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देते हैं। बिना संकेतों के चौराहे पर वाहन अपनी मर्जी से निकलते हैं, पैदल यात्रियों के लिए सड़क पार करना जोखिमपूर्ण हो जाता है, अचानक मोड़ और ओवरटेकिंग के दौरान विवाद और खतरे दोनों बढ़ जाते हैं। लखीमपुर जैसे बढ़ते यातायात वाले शहर में सिग्नलों का निष्क्रिय होना जीवन-रक्षा के सबसे बुनियादी सिस्टम का ढह जाना है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब विभाग चालान से लाखों का राजस्व जुटा रहा है तो उसी राशि का एक छोटा-सा हिस्सा भी ट्रैफिक सिग्नलों की मरम्मत में खर्च न होना आश्चर्यजनक है। आम लोगों ने कई मौकों पर सोशल मीडिया से लेकर जन-सुनवाइयों तक, इस समस्या को लेकर आवाज उठाई है, लेकिन लगता है उनकी यह आवाजें अब भी संबंधित विभाग के कानों तक नहीं पहुंच पा रही हैं। आज ये तीनों ‘मृतप्राय’ सिग्नल अपनी खामोशी से शहर को यह संदेश दे रहे हैं कि यातायात अनुशासन केवल जनता पर सख्ती बरतने से नहीं आता, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी, त्वरित मरम्मत और बुनियादी ढांचे की सक्रिय देखरेख से स्थापित होता है। अब शहर की नजरें इस पर टिकी हैं कि प्रशासन इन मौन लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण संकेतों की पुकार कब सुनता है और कब उन्हें पुनः जीवनदान मिलता है।







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