पत्रकारिता की गरिमा, चुनौतियों और जिम्मेदारियों पर हुआ गहन मंथन — दिवंगत पत्रकारों को दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि
लखीमपुर से राजेश राठी और ओम प्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट
लखीमपुर. लखीमपुर जिला प्रशासन के सौजन्य से तथा जिला तथ्य एवं जन संजोग अधिकारी कार्यालय और लखीमपुर जिला पत्रकार संघ के सहयोग से आज लखीमपुर आवर्त भवन के सभाकक्ष में राष्ट्रीय प्रेस दिवस अत्यंत गरिमापूर्ण और सादगी से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का नेतृत्व लखीमपुर जिला आयुक्त प्रणबजीत काकोटी ने किया। इस विशेष अवसर पर उच्च पुलिस अधीक्षक गुनिंद्र डेका, जन संजोग अधिकारी प्राचुर्ज्यो प्रतिम नियोग, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक प्रफुल्लो कमान, नॉर्थ लखीमपुर प्रेस क्लब, जाफा तथा लखीमपुर जिला पत्रकार संघ के सभी पदाधिकारी व पत्रकार बड़ी संख्या में उपस्थित हुए। सभा की शुरुआत पारंपरिक जातीय संगीत के मधुर स्वरों से हुई, जिसने समारोह के वातावरण को सांस्कृतिक सौंदर्य और गरिमा से भर दिया। संगीत के पश्चात सभा में एक अत्यंत भावुक क्षण आया, जब पत्रकारिता जगत से जुड़े उन सभी दिवंगत पत्रकारों को याद किया गया, जिन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया और आज हमारे बीच नहीं हैं। उनकी दिवंगत आत्माओं की शांति हेतु सभा में एक मिनट का मौन रखा गया। पूरा सभागार श्रद्धा, संवेदना और सम्मान से भर गया—यह क्षण इस बात का प्रतीक था कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की सेवा का मूल्यवान माध्यम है, जिसके योद्धाओं के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। कार्यक्रम में वक्ताओं ने राष्ट्रीय प्रेस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके महत्व को विस्तार से रेखांकित किया। 16 नवंबर 1966 को प्रेस परिषद् की स्थापना हुई थी, जिसके बाद से हर वर्ष यह दिन प्रेस की स्वतंत्रता, उसके मानकों और मीडिया की जिम्मेदार भूमिका के सम्मान में मनाया जाता है। प्रेस परिषद् देश में मीडिया की नैतिकता, अनुशासन और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रहरी के रूप में कार्य करता है। वक्ताओं ने कहा कि प्रेस केवल समाचार का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का वह चौथा स्तंभ है जो जनता की आवाज़, समाज की दृष्टि और शासन का आईना बनकर कार्य करता है। पत्रकार जिस साहस, निष्ठा और निष्पक्षता से जनता को सूचना उपलब्ध कराते हैं, वह राष्ट्र के स्वस्थ भविष्य की नींव होती है। अपने संबोधनों में जिला आयुक्त प्रणबजीत काकोटी और उच्च पुलिस अधीक्षक गुनिंद्र डेका ने कहा कि पत्रकारिता का इतिहास उतना ही पुराना है जितना समाज और शासन का इतिहास। प्राचीन काल में राजाओं के दूत संवाद का साधन थे, वहीं आज पत्रकार आधुनिक समाज में सूचना, सत्य और लोकतांत्रिक जागरूकता के वाहक हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकार जनता और शासन के बीच वह पुल हैं, जो न सिर्फ समस्याओं को उजागर करते हैं, बल्कि समाधान की दिशा भी दिखाते हैं। पत्रकारिता आज भी सत्य की खोज और जनजागरूकता का सबसे सशक्त माध्यम बनी हुई है। सभा में वक्ताओं ने विशेष रूप से सोशल मीडिया और कुछ डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फैल रही फेक न्यूज की समस्या पर गहन चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आज सूचना की गति बढ़ गई है, परंतु उसके साथ गलत या भ्रामक सूचनाओं का प्रसार भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारों की भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें हर समाचार की जांच, तथ्यों का सत्यापन, गहन विश्लेषण और निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाते हुए सत्य को जनता तक पहुँचाना होता है। एक सही समाचार समाज को दिशा देता है, जबकि गलत समाचार भ्रम और अराजकता पैदा कर सकता है। अधिकारियों ने कहा कि कई बार ऐसा होता है कि महत्वपूर्ण जानकारी पुलिस या प्रशासन तक पहुँचने से पहले पत्रकारों तक पहुँच जाती है, जो पत्रकार जगत की सक्रियता और उनकी नेटवर्किंग की क्षमता का प्रमाण है। लेकिन फेक न्यूज की बढ़ती प्रवृत्ति पत्रकारों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाती है, इसलिए पत्रकारों को अधिक सतर्क, जिम्मेदार और तथ्यपरक होकर कार्य करना होगा। सभी वक्ताओं ने कहा कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि निस्वार्थ सामाजिक सेवा है। पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर भी जनता तक सच्चाई पहुँचाते हैं। वे कठिन परिस्थितियों में भी अपनी प्रतिबद्धता नहीं छोड़ते। आज जब देश और समाज तेजी से परिवर्तित हो रहा है, पत्रकारों का दायित्व और भी बढ़ गया है। पारदर्शिता, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता और समर्पण ही पत्रकारिता की असली शक्ति है। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गान के सामूहिक गायन से हुआ। पूरे सभागार में एक स्वर में गूँजते इस गीत ने देशभक्ति और एकता का अद्भुत वातावरण उत्पन्न कर दिया।इसके बाद सभी पत्रकारों, अधिकारियों और अतिथियों के लिए एक भव्य प्रीति भोज का आयोजन किया गया। एक ही पंक्ति में बैठकर साथ भोजन करने का यह क्षण आपसी सौहार्द, सम्मान और सहयोग की भावना को नई ऊर्जा प्रदान करता रहा। यह केवल भोजन नहीं, बल्कि संवाद, एकता और सद्भाव का प्रतीक था। राष्ट्रीय प्रेस दिवस का यह आयोजन लखीमपुर में न केवल पत्रकारिता के गौरव को पुनर्स्थापित करता है, बल्कि मीडिया की जिम्मेदारी, चुनौतियों और समाज में उसकी अनिवार्य भूमिका को भी गहराई से उजागर करता है। कार्यक्रम के अंत में सभी वक्ताओं ने आशा व्यक्त की कि लखीमपुर के पत्रकार भविष्य में भी इसी साहस, निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा के साथ समाज और प्रशासन के बीच एक मजबूत, विश्वसनीय और संवेदनशील सेतु बने रहेंगे—क्योंकि पत्रकारिता का मूल मंत्र सदैव रहा है: “सत्य के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति जिम्मेदारी।”








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