मथुरा देवी चांडक ने एमएस जयनारायण भंवरलाल से शुरू की थी ग्यारस की परंपरा, आज भी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभाई जा रही धार्मिक विरासत
टियोक से बिजू तुनवाल
टियोक। टियोक में धार्मिक आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता की एक ऐसी मिसाल देखने को मिल रही है, जो पिछले 58 वर्षों से निरंतर श्रद्धा की ज्योत के रूप में प्रज्वलित है। खाटू श्याम बाबा की ग्यारस के अवसर पर एमएस जयनारायण भंवरलाल परिसर में आयोजित होने वाला धार्मिक कार्यक्रम अब केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पांच दशकों से अधिक समय से चली आ रही ऐसी परंपरा बन चुका है, जिसमें कई पीढ़ियों की आस्था, संस्कार और स्मृतियां जुड़ी हुई हैं।
करीब 58 वर्ष पूर्व मथुरा देवी चांडक ने एमएस जयनारायण भंवरलाल से खाटू श्याम बाबा की ग्यारस के अवसर पर ज्योत प्रज्वलित कर इस धार्मिक परंपरा की नींव रखी थी। उस समय श्रद्धा और भक्ति के साथ शुरू किया गया यह छोटा-सा धार्मिक प्रयास धीरे-धीरे समाज की आस्था से जुड़ता चला गया। देखते ही देखते यह आयोजन टियोक में श्याम बाबा के भक्तों के लिए विशेष धार्मिक अवसर बन गया।
मथुरा देवी चांडक द्वारा प्रज्वलित की गई उस ज्योत की लौ समय के साथ बुझी नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी और अधिक श्रद्धा के साथ आगे बढ़ती रही। परिस्थितियां बदलीं, समय बदला और परिवार की पीढ़ियां बदलीं, लेकिन श्याम बाबा के प्रति आस्था और ग्यारस की इस परंपरा में कोई कमी नहीं आई। मथुरा देवी चांडक के बाद उनके पुत्र श्याम सुंदर चांडक ने इस धार्मिक परंपरा को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने वर्षों से पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ ग्यारस के अवसर पर ज्योत प्रज्वलित करने तथा धार्मिक आयोजन की परंपरा को कायम रखा है।
परिवार की इस निरंतरता के साथ समाज के लोगों का सहयोग और सहभागिता भी इस आयोजन की विशेष पहचान बन गई। धीरे-धीरे यह कार्यक्रम एक परिवार की धार्मिक परंपरा से आगे बढ़कर समाज की सामूहिक आस्था का स्वरूप लेता गया। यही कारण है कि प्रत्येक ग्यारस पर श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल होकर श्याम बाबा की ज्योत के दर्शन करते हैं और भजन-कीर्तन के माध्यम से अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
बुधवार को ग्यारस के पावन अवसर पर एमएस जयनारायण भंवरलाल परिसर में एक बार फिर श्रद्धा और भक्ति का वातावरण देखने को मिला। विधि-विधान के साथ खाटू श्याम बाबा की ज्योत प्रज्वलित की गई। ज्योत प्रज्वलित होते ही श्रद्धालुओं ने दर्शन कर बाबा के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
पूजा-अर्चना के पश्चात सामूहिक भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ। श्याम बाबा के भजनों और जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालु देर रात तक भक्ति में लीन रहे और बाबा के भजनों पर श्रद्धा के साथ सहभागिता करते रहे।
आयोजन में समाज के बद्रीनारायण करनानी, कामाख्या लाल चांडक, चांद रतन सोमानी, शिव भट्ट, गोमती देवी, कांता देवी, राजगोपाल बिहानी, सुरेश शर्मा, राजकुमार जैन, अरुण तिवारी, विकास चांडक, गोपाल मुंद्रा और मिंटू तुनवाल सहित समाज के अनेक लोग उपस्थित रहे।
58 वर्षों की इस धार्मिक परंपरा का सबसे भावपूर्ण पक्ष यह रहा कि आयोजन के दौरान उपस्थित बुजुर्गों के बीच पुरानी स्मृतियां एक बार फिर जीवंत हो उठीं। उन्होंने उस समय को याद किया, जब मथुरा देवी चांडक ने इसी स्थान से श्याम बाबा की ग्यारस की ज्योत प्रज्वलित कर इस परंपरा की शुरुआत की थी।
उन दिनों संसाधन सीमित थे और आयोजन भी आज की तरह व्यापक स्वरूप में नहीं होते थे, लेकिन श्रद्धा और विश्वास में कोई कमी नहीं थी। एक महिला द्वारा श्रद्धा के साथ प्रज्वलित की गई ज्योत धीरे-धीरे परिवार की आस्था बनी और फिर समाज की धार्मिक विरासत का हिस्सा बन गई।
आज जब उसी परंपरा को 58 वर्ष पूरे हो चुके हैं, तो यह यात्रा अपने आप में कई पीढ़ियों की कहानी कहती है। जिन लोगों ने शुरुआती वर्षों में इस आयोजन को देखा था, वे आज नई पीढ़ी को उस परंपरा से जुड़ते हुए देख रहे हैं।
टियोक में श्याम बाबा की ग्यारस की यह परंपरा इस बात का उदाहरण है कि धार्मिक संस्कार केवल एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। यदि अगली पीढ़ी उन्हें श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ स्वीकार करे, तो वे वर्षों बाद भी उसी उत्साह के साथ जीवित रहते हैं।
मथुरा देवी चांडक द्वारा शुरू की गई ज्योत आज नई पीढ़ी तक पहुंच चुकी है। परिवार ने इसे संभाला और समाज ने इसे अपनाकर अपनी आस्था से सींचा। यही कारण है कि 58 वर्ष बाद भी इस ज्योत को लेकर श्रद्धालुओं में वही उत्साह और श्रद्धा देखने को मिलती है।
समाज के लोगों का कहना है कि ग्यारस का यह आयोजन केवल पूजा, ज्योत और भजन-कीर्तन तक सीमित नहीं है। यह वर्षों पुराने पारिवारिक एवं सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर भी बनता है। इस अवसर पर विभिन्न परिवारों के लोग एक साथ एकत्रित होते हैं, एक-दूसरे से मिलते हैं और पुरानी स्मृतियों को साझा करते हैं।
ऐसे आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। 58 वर्ष पुरानी यह परंपरा इसी कारण आज भी अपना महत्व बनाए हुए है।
ग्यारस के अवसर पर आयोजित भजन-कीर्तन का क्रम रात्रि तक चलता रहा। श्रद्धालु श्याम बाबा के भजनों में भाव-विभोर होकर शामिल हुए। पूरे परिसर में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। भजन-कीर्तन के पश्चात लगभग रात्रि 1:30 बजे श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण कर श्याम बाबा का आशीर्वाद लिया और इस प्राचीन परंपरा के निरंतर आगे बढ़ते रहने की कामना की।
टियोक में पिछले 58 वर्षों से प्रज्वलित श्याम बाबा की यह ज्योत केवल दीपक की लौ नहीं है। यह उस विश्वास की प्रतीक है, जिसे मथुरा देवी चांडक ने श्रद्धा के साथ प्रज्वलित किया, परिवार ने उसे संभाला और समाज ने अपनी सहभागिता से पीढ़ियों तक जीवित रखा।
आज इस परंपरा को पीछे मुड़कर देखने पर एक लंबी धार्मिक यात्रा दिखाई देती है—एक ऐसी यात्रा, जिसकी शुरुआत एक महिला की श्रद्धा से हुई और जो पांच दशक से अधिक समय बाद भी उसी आस्था के साथ जारी है।
समय की रफ्तार के साथ बहुत कुछ बदल गया, लेकिन श्याम बाबा की ग्यारस की यह परंपरा टियोक में आज भी उसी विश्वास के साथ कायम है। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को संदेश देता है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब उन्हें केवल निभाया नहीं, बल्कि श्रद्धा और संस्कार के साथ अगली पीढ़ी को सौंपा जाए।
टियोक में श्याम बाबा की यह ज्योत इसी निरंतरता की साक्षी है—एक ज्योत, एक विश्वास और 58 वर्षों की आस्था की ऐसी यात्रा, जो आज भी निरंतर प्रकाशमान है।










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