आज महात्मा गांधी की 157वीं जयंती है। हर साल की तरह इस बार भी हम गांधी जी को याद करेंगे, उनकी तस्वीर पर फूल चढ़ाएंगे, भाषण देंगे और शाम को सब कुछ भूलकर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट जाएंगे। लेकिन इस बार एक बात है जो हमें परेशान करनी चाहिए। गांधी जी जिस इंसान को हम हर साल याद करते हैं, उनके सिद्धांतों को दुनिया ने अपना लिया, पर हमने गांधी जी को सिर्फ एक तस्वीर और एक छुट्टी बना दिया।
जरा सोचिए, आज की दुनिया कैसी है। 2025 में दुनिया भर में 65 सशस्त्र संघर्ष दर्ज हुए। यह 1946 के बाद सबसे ज्यादा है। यूक्रेन में 4 साल से युद्ध चल रहा है और थमने का नाम नहीं ले रहा। गाजा में युद्धविराम के बाद भी 5 हजार से ज्यादा उल्लंघन हुए और 1400 से ज्यादा लोग मारे गए। सूडान में 86 लाख लोग अपने घर छोड़ चुके हैं। म्यांमार में 38 लाख लोग बेघर हैं। यह वह दुनिया है जहां हम गांधी जी का अहिंसा का संदेश भेज रहे हैं।
गांधी जी ने कहा था कि आंख के बदले आंख का सिद्धांत पूरी दुनिया को अंधा बना देगा। आज अगर गांधी जी हमारे बीच होते तो शायद हम उनसे पूछते, "बापू, आपने हमें अहिंसा का रास्ता दिखाया, लेकिन जब दुनिया युद्ध और हिंसा में डूबी हो, तब अहिंसा को प्रभावी कैसे बनाया जाए?" शायद गांधी जी हमें याद दिलाते कि हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता। हमने हिंसा को इतना आम बना दिया है कि शांति अब सिर्फ एक नारा लगती है, जिसे हर तरफ दोहराया जाता है, पर कहीं अमल में नहीं लाया जाता। गांधी जी ने हमें सिर्फ आजादी ही नहीं दी, उन्होंने हमें यह भी सिखाया कि आजादी के बाद अपने मतभेदों को कैसे सुलझाया जाए।
गांधी जी की सबसे बड़ी बात यह थी कि उन्होंने अहिंसा को कमजोरों का नहीं, बहादुरों का हथियार कहा। यह बात आज और भी सच लगती है। जब यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए खुद को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश कर रहा है, तब गांधी जी का स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का विचार केवल पुरानी बात नहीं रह जाता। गांधी जी का वह विचार एक व्यावहारिक रास्ता बन जाता है, जो आज भी काम आ सकता है। गांधी जी ने कभी कहा था कि दुनिया में सात ऐसी चीजें हैं जो हमें तबाह कर सकती हैं, और उनमें से एक है बिना सिद्धांत की राजनीति। आज जब चारों तरफ यही हो रहा है, तब गांधी जी की याद सबसे ज्यादा जरूरी हो जाती है।
लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यही है। हम गांधी जी को याद करने का जो तरीका अपनाते हैं, वह खुद गांधीवादी नहीं है। हम गांधी जी को एक दिन के लिए याद करते हैं और बाकी तीन सौ चौंसठ दिन उनके सिद्धांतों को भूल जाते हैं। गांधी जी ने कहा था कि आपको वह बदलाव खुद बनना होगा जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। लेकिन हम गांधी जी को याद तो करते हैं, उनके जैसा बनने की कोशिश नहीं करते।
आज जरूरत इस बात की है कि हम गांधी जी को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्ति के रूप में न देखें। हमें गांधी जी को एक जीवित सवाल की तरह देखना चाहिए। क्या हम सत्य, अहिंसा और सबको साथ लेकर चलने के रास्ते पर अब भी चल सकते हैं? क्या हमारे पास वह हिम्मत बची है जो गांधी जी के पास थी?
गांधी जयंती सिर्फ एक छुट्टी का दिन नहीं है। यह खुद से कुछ सवाल पूछने का दिन है। और आज इस आत्मचिंतन की जरूरत सबसे ज्यादा है, क्योंकि हमारे चारों तरफ युद्ध है, असमानता है और नफरत है। गांधी जी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम गांधी जी के बताए रास्ते पर चलने की कोशिश करें, न कि सिर्फ गांधी जी की मूर्ति पर माला चढ़ाकर लौट जाएं।





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