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5000 वर्ष पुराना पांडवों का लाक्षागृह, जो बना महाभारत के युद्ध की नींव


मेरठ। मेरठ से महज 35 किलोमीटर दूर बागपत जिले के बरनावा में महाभारत काल का लाक्षागृह आज भी अवशेषों के रूप में विद्यमान है। लाख से बने इसी महल में कौरवों ने पांडवों को जिंदा जलाकर मारने की साजिश रची थी लेकिन विदुर के चातुर्य से वे जिंदा बच निकले थे। जब भीष्म पितामह ने धृतराष्ट्र से युधिष्ठिर का राज्याभिषेक करने के लिए कहा तो यह बात दुर्योधन को पसंद नहीं आई। उसने सोचा कि यदि ऐसा हो गया तो हमेशा हमेशा के लिए कौरव पांडवों के अधीन हो जाएंगे और हमको उनका सेवक बनकर रहना पड़ेगा। लेकिन दुर्योधन की धृतराष्ट्र के सामने एक न चली। 



मामा शकुनि ने भी दुर्योधन का साथ दिया। धृतराष्ट्र ने दुर्योधन से पांडवों के रुकने के लिए उचित स्थान का प्रबंध करने को कहा। दुर्योधन ने अपने पिता से पांडवों को वर्णावत चलने की बात कही। पांडव अपनी माता के साथ वर्णावत को निकल पड़े। उधर मामा शकुनि और दुर्योधन ने मिलकर पांडवों को खत्म करने के लिए चाल चली। उन्होंने वर्णावत में एक महल बनवा कर पांडवों को जलाकर मारने की साजिश रची। इसी महल को लाक्षागृह कहा गया, जो लाख से बनवाया गया था। लाख एक ऐसा पदार्थ होता है जो आग को बहुत जल्दी पकड़ लेता है। 



विदुर को दुर्योधन के षड्यंत्र का पता चल गया था। उन्होंने सारी बात पांडवों को बताई और एक कारीगर को सुरंग खोदने के लिए भेजा ताकि पांडव सुरक्षित सुरंग से बाहर निकल सकें। वर्णावत-बरनावा पहुंचकर रात के समय पांडवों द्वारा स्वयं लाक्षागृह को आग के हवाले करने के बाद वे सभी एक सुरक्षित सुरंग से बाहर निकल आए। लाक्षागृह में जल जाने की खबर जब लोगों को पता चली तो पांडवों की मृत्यु पर वे सब विलाप करने लगे। दुर्योधन ने भी घटना को सच मानकर दुखी होने का ढोंग किया। लेकिन कौरव यह नहीं जानते थे कि उनके दुश्मन उस समय जीवित थे। (हि.स.)

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