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चीन बनाएगा ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध



प्रमोद भार्गव


भारतीय आक्रामकता के चलते सीमा पर अपने नापाक मंसूबों पर पानी फिरने के बाद भी चीन अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। भारत की आपत्ति के बावजूद उसने ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की 14वीं पंचवर्षीय परियोजना को संसद में मंजूरी दे दी है। इसमें तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर विवादास्पद बांध निर्माण के प्रस्ताव समेत अरबों डॉलर की कई बड़ी योजनाओं का खाका तैयार किया गया है। तिब्बत क्षेत्र में ब्रह्मपुत्र पर जिस जल विद्युत परियोजना को मंजूरी मिली है, वह अरुणाचल-प्रदेश की सीमा से सटे तिब्बत के मेंदोग काउंटी के एकदम निकट है। इस योजना को 2035 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इस अवसर पर चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री ली कछयांग भी मौजूद थे।


दरअसल तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के अध्यक्ष शी डल्हा ने चीन सरकार से यह परियोजना जल्द शुरू करने की मांग की थी। इस परियोजना से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है। भारत को शंका है कि बांध के निर्माण से नदी के जल प्रवाह में बाधा आ सकती है। इससे खासतौर से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सूखे और बाढ़ की स्थिति निर्मित हो सकती है। यही स्थिति बांग्लादेश में भी बन सकती है। इसीलिए दोनों देशों ने इस परियोजना पर घोर आपत्ति जताई। चालाक चीन इस हालातों को कृत्रिम रूप से भी निर्मित कर सकता है। ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बन जाता है तो चीन इस पानी का इस्तेमाल भारत को परेशान करने की दृष्टि में भी कर सकता है। यदि बारिश में बांध में भरे पानी को वह ज्यादा मात्रा में छोड़ता है तो पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को बाढ़ का सामना करना पड़ सकता है। यदि चीन सिंचाई के समय पानी रोक देता है तो इन राज्यों को सूखे के हालात का सामना करना होगा।


एशिया की सबसे लंबी इस नदी की लंबाई 3000 किमी है। तिब्बत से निकलने वाली इस नदी को यहां यारलुंग झांगबों के नाम से जाना जाता है। इसी की सहायक नदी जियाबुकू है। जिसपर चीन हाइड्रो प्रोजेक्ट बना रहा है। दुनिया की सबसे लंबी नदियों में 29वां स्थान रखने वाली ब्रह्मपुत्र 1625 किमी क्षेत्र में तिब्बत में ही बहती है। इसके बाद 918 किमी भारत और 363 किमी की लंबाई में बांग्लादेश में बहती है। तिब्बत के मेंदोग काउंटी में यह परियोजना निर्माणाधीन है। यह स्थल अरुणाचल और सिक्किम के एकदम निकट है। सिक्किम के जाइगस के आगे से ही यह नदी अरुणाचल में प्रवेश करती है। असम में ब्रह्मपुत्र का पाट 10 किमी चैड़ा है। जब यह बांध पूरा बन जाएगा, तब इसकी जल ग्रहण क्षमता 29 करोड़ क्यूबिक मीटर पानी रोकने की होगी। ऐसे में चीन यदि बांध के द्वार बंद रखता है तो भारत के साथ बांग्लादेश को जल की कमी का संकट झेलना होगा और बरसात में एक साथ द्वार खोल देता है तो इन दोनों देशों की एक बढ़ी आबादी का बाढ़ का सामना करना होगा। ये हालात इसलिए उत्पन्न होंगे, क्योंकि जिस ऊंचाई पर बांध बंध रहा है, वह चीन के कब्जे वाले तिब्बत में है, जबकि भारत और बांग्लादेश बांध के निचले स्तर पर हैं। ब्रह्मपुत्र पर बनने वाली यह तिब्बत की सबसे बड़ी परियोजना है। भारत ने इस पर पहले भी चिंता जताई थी, लेकिन चीन ने कतई गौर नहीं किया।


समुद्री तट से 3300 मीटर की ऊंचाई पर तिब्बती क्षेत्र में बहने वाली इस नदी पर चीन ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के तहत तीन पनबिजली परियोजनाओं को भी निर्माण की स्वीकृति दी हुई है। चीन इन बांधों का निर्माण अपनी आबादी के लिए व्यापारिक, सिंचाई, बिजली और पेयजल समस्याओं के निदान के उद्देश्य से कर रहा है, लेकिन उसका इन बांधों के निर्माण की पृष्ठभूमि में छिपा अजेंडा, खासतौर से भारत के खिलाफ रणनीतिक इस्तेमाल भी है। दरअसल चीन में बढ़ती आबादी के चलते इस समय 886 शहरों में से 110 शहर पानी के गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। उद्योगों और कृषि संबंधी जरूरतों के लिए भी चीन को बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत है। चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का अनूठा इस्तेमाल करते हुए अपने शिनजियांग, जांझु और मंगोलिया इलाकों में फैले व विस्तृत हो रहे रेगिस्तान को भी नियंत्रित करना चाहता है। चीन की यह नियति रही है कि वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए पड़ोसी देशों की कभी परवाह नहीं करता।


चीन ब्रह्मपुत्र के पानी का मनचाहे उद्देश्यों के लिए उपयोग करता है तो तय है, तय अरुणाचल में जो 17 पनबिजली परियोजनाएं प्रस्तावित व निर्माणाधीन हैं, वे सब अटक जाएंगी। ये परियोजनाएं पूरी हो जाती है और ब्रह्मपुत्र से इन्हें पानी मिलता रहता है तो इनसे 37,827 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा। इस बिजली से पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में बिजली की आपूर्ति तो होगी ही, पश्चिम बंगाल और ओड़ीसा को भी अरुणाचल बिजली बेचने लग जाएगा। चीन अरुणाचल पर जो टेढ़ी निगाह बनाए रखता है, उसका एक बड़ा करण अरुणाचल में ब्रह्मपुत्र की जलधारा ऐसे पहाड़ व पठारों से गुजरती है, जहां भारत को मध्यम व लघु बांध बनाना आसान है। ये सभी बांध भविष्य में अस्तित्व में आ जाते हैं और पानी का प्रवाह बना रहता है तो पूर्वोत्तर के सातों राज्यों की बिजली, सिंचाई और पेयजल जैसे बुनियादी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।


2015 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन यात्रा पर गए थे, तब असम के तात्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने उनसे आग्रह किया था कि ब्रह्मपुत्र नदी के जल बंटवारे के मुद्दे का समाधान निकालें। लेकिन इस मुद्दे पर द्विपक्षीय वार्ता में कोई प्रगति हुई हो, ऐसा देखने में नहीं आया। जबकि चीन और भारत के बीच इस मुद्दे पर विवाद और टकराव निरंतर बढ़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पानी के उपयोग को लेकर कई संधियां हुई हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र की पानी के उपभोग को लेकर 1997 में हुई संधि के प्रस्ताव पर अमल किया जाता है। इस संधि के प्रारूप में प्रावधान है कि जब कोई नदी दो या इससे ज्यादा देशों में बहती है तो जिन देशों में इसका प्रवाह है, वहां उसके पानी पर उस देश का समान अधिकार होगा। इस लिहाज से चीन को सोची-समझी रणनीति के तहत पानी का मनमाना इस्तेमाल करने का अधिकार है ही नहीं। इस संधि में जल प्रवाह के आंकड़े साझा करने की शर्त भी शामिल है। लेकिन चीन संयुक्त राष्ट्र की इस संधि की शर्तों को मानने के लिए इसलिए बाध्यकारी नहीं है, क्योंकि इस संधि पर अब तक चीन और भारत ने हस्ताक्षर ही नहीं किए हैं। इसीलिए उरी हमले के बाद कूटनीतिक चाल चलते हुए चीन ने अपने मित्र पाकिस्तान को अपने हितों के लिए संजीवनी देते हुए भारत में जलापूर्ति करने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की एक सहायक नदी जियाबुकू का पानी रोक दिया था। इस नदी पर चीन 74 करोड़ डॉलर (करीब 5 हजार करोड़ रुपए) की लगत से जल विद्युत परियोजना के निर्माण में लगा है। जून 2014 में शुरू हुई यह परियोजना पूरी होने के करीब है। पाकिस्तान ने भारत को धमकी भी दी थी कि अगर भारत ने सिंधु नदी का पानी रोका तो वह चीन के जरिए ब्रह्मपुत्र का पानी रुकवा देगा। उरी हमले के बाद यह आशंका सच भी साबित हुई थी।


2013 में एक अंतरमंत्रालय विशेष समूह गठित किया गया था। इसमें भारत के साथ चीन का यह समझौता हुआ था कि चीन पारदर्शिता अपनाते हुए पानी के प्रवाह से संबंधित आंकड़ों को साझा करेगा। लेकिन चीन ने इस समझौते का पालन नहीं किया। वह जब चाहे तब ब्रह्मपुत्र का पानी रोक देता है अथवा इकट्ठा छोड़ देता है। पिछले वर्षों में अरुणाचल और हिमाचल प्रदेशों में जो बाढ़ आई है, उनकी पृष्ठभूमि में चीन द्वारा बिना किसी सूचना के पानी छोड़ा जाता रहा है।


नदियों का पानी साझा करने के लिए अब भारत को चाहिए कि वह चीन को वार्ता के लिए तैयार करे। इस वार्ता में बांग्लादेश को भी शामिल किया जाए। क्योंकि ब्रह्मपुत्र पर बनने वाले बांधों से भारत के साथ-साथ बांग्लादेश भी बुरी तरह प्रभावित होगा। इसके आलावा लाओस, थाईलैंड व वियतनाम भी प्रभावित होंगे। लेकिन ये देश पाकिस्तान की तरह चीन के प्रभाव में हैं, इसलिए चीन इनके साथ उदरता बनाए रखेगा। चीन, भारत और बांग्लादेश के साथ यही उदारता दिखने में आए, यह मुश्किल है। इसलिए संयुक्त राष्ट्र संधि की शर्तों को चीन भी स्वीकार करे, इस हेतु भारत और बांग्लादेश इस मसले को संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच पर उठानी की जरूरत है। इस मंच से यदि चीन की निंदा होगी तो उसे संधि की शर्तों को दरकिनार करना आसान नहीं होगा।

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