अजय कुमार शर्मा
अपने समय के दो सुपर सितारे राज कपूर और दिलीप कुमार का रिश्ता पेशावर (अब पाकिस्तान) से था और दोनों के परिवार एक दूसरे को अच्छे से जानते थे। यह रिश्ता दोनों परिवारों के बॉम्बे (अब मुंबई) आने के बाद भी बना रहा। दिलीप कुमार (तब यूसुफ खान) के पिता गुलाम सरवर खान का क्रॉफर्ड मार्केट में फलों का कारोबार था। राज कपूर के पिता पृथ्वीराज कपूर फिल्मों में काम कर रहे थे और राज कपूर ने भी स्टूडियो में काम करना शुरू कर दिया था। उन दिनों के पारंपरिक परिवारों में फिल्मों को देखना ही बुरा समझा जाता था। उनमें काम करने का मतलब तो परिवार की नाक कटना या मूंछ का झुकना होता था। दिलीप कुमार ने भी अपने पिता के इन विचारों के चलते फिल्मों में अपने काम करने की बात उन्हें नहीं बताई थी, लेकिन उनके पिता को इसकी जानकारी कैसे हुई। इसका दिलचस्प किस्सा दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह पेश किया है-
"जुगनू" फिल्म 1947 के बाद के महीनों में रिलीज हुई और हिट हो गई। इसके होर्डिंग कई जगह लगाये गये थे जिनमें क्रॉफर्ड मार्केट के पास का इलाका भी शामिल था। एक सुबह जब आग़ा जी (दिलीप कुमार के पिता) सेवों की आमद का हिसाब किताब कर रहे थे तो वशेशरनाथ जी (पृथ्वीराज कपूर के पिता और राज कपूर के दादाजी) उनसे मिलने चले आये। दोनों वर्षों पुराने दोस्त थे और उनमें हंसी-मजाक के साथ नोक-झोंक भी चलती रहती थी। आगा जी अकसर उनकी चुटकी लेते हुए कहते रहते थे कि उन्हें अपनी मूंछें ऐंठने का कोई हक नहीं था क्योंकि उनका बेटा और पोता 'नौटंकी' के पेशे में थे। उन्हें लगता था कि अगर वे सरकारी अफसर होते तो सचमुच इज्जत की बात होती। उन दिनों ज़्यादातर पिता अपने बेटों के बारे में ऐसे ही सपने देखते थे। सभी जानते थे कि मैं और राज एक ही कॉलेज में पढ़ते थे और उन दिनों बम्बई यूनिवर्सिटी से बी.ए. की डिग्री लेना बहुत बड़ी बात थी। इसलिए आग़ा जी को राज कपूर का सरकारी नौकरी में जाने के बजाय अपने पिता की तरह एक्टिंग के पेशे में जाना बहुत ज्यादा अखर रहा था। दिलचस्प बात यह थी कि खुद बशेशरनाथ जी इस बात से ज़्यादा परेशान नहीं थे, हालाँकि ये ख़ुद बहुत बड़े सरकारी अफ़सर थे और पेशावर के कमिश्नर के पद पर रह चुके थे। उनके बेटे पृथ्वीराज कपूर एक्टिंग के पेशे में खूब नाम कमा चुके थे। आगा जी मेरे नाम के आगे "ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर" जुड़ा देखना चाहते थे। उन्होंने यह उपाधि कहीं देखी थी और उन्हें लगता था कि यह बड़ी इज्जत की बात थी। कॉलेज में मुझे मन लगाकर पढ़ते देखकर उन्होंने यह सपना पाल लिया था कि मैं अपना नाम "यूसुफ खान ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर" लिखूँ। वे मुझसे भी इसका जिक्र कर चुके थे।
उस सुबह बशेशरनाथ जी ने आग़ा जी की चुटकी लेते हुए अपनी मूंछें उमेठी और कहा कि वे उनको कुछ दिखाना चाहते थे कुछ ऐसा जिसे देखकर उनका कलेजा बाहर आ जायेगा। आग़ा जी सोच में पड़ गये कि आखिर ऐसी क्या बात हो सकती थी। बशेशरनाथ जी उन्हें मार्केट से बाहर ले गये और सड़क के दूसरी तरफ़ लगी 'जुगनू' फ़िल्म की लम्बी-चौड़ी होर्डिंग दिखाते हुए बोले, "वह देखो! वह रहा तुम्हारा साहबजादा यूसुफ!"
जैसा कि आग़ा जी ने मुझे बाद में बताया था, उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन उन्हें इस बात को लेकर कोई ग़लतफहमी भी नहीं हुई कि पोस्टर पर छपा जाना-पहचाना चेहरा उनके बेटे यूसुफ का ही था। पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था- सिनेमा के परदे पर एक नये जगमगाते सितारे का उदय! पर उसका नाम यूसुफ खान नहीं, दिलीप कुमार था! बशेशरनाथ जी उनकी बग़ल में खड़े उनके चेहरे पर आते-जाते भावों को देखते रहे। फिर उन्होंने कहा, "तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। उसने दूसरा नाम अपना लिया है ताकि ख़ानदान की इज़्ज़त बची रहे। वह बहुत बड़ा स्टार बनने जा रहा है!"
बशेशरनाथ जी के ये शब्द आग़ा जी को तसल्ली देने के लिए काफ़ी नहीं थे। उनके दिल पर न जाने क्या गुज़र रही थी। बहुत बाद में जब उन्होंने मेरे इस कैरियर को दिल से मंजूरी दे दी तो उन्होंने मुझे बताया था कि उस सुबह उन्हें कैसा महसूस होता रहा था। जाहिर था कि उनके दिल को एक झटका-सा लगा था मानो उनका कोई ख्वाब टूट गया हो। पर उन्होंने किसी से भी अपने गुस्से या अपने ग़रूर के टूटने का इजहार नहीं किया था। वे बिल्कुल ख़ामोश हो गये थे और उन्होंने मुझसे बात करनी बन्द कर दी थी। वे एकाध अल्फाज़ में ही मेरी किसी बात का जवाब देते थे और में उनसे आँखें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाता था।
चलते चलतेः जब हालात बहुत अजीब हो गये और दिलीप कुमार समझ नहीं पा रहे थे कि क्या किया जाए तब उन्होंने अपनी परेशानी राज को बतायी तो उन्होंने कहा कि वह जानता था कि- ऐसा होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में बीच-बचाव करने के लिहाज से सबसे बेहतर आदमी उनके पिता पृथ्वीराज जी हो सकते हैं। फिर एक दिन पृथ्वीराज जी अचानक ही उनके घर चले आये। उस शाम को जब दिलीप कुमार घर लौटे तो अम्मा ने उनके बारे में बताया और यह भी कि उनसे बातचीत करने के बाद आग़ा जी काफ़ी सन्तुष्ट और खुश लग रहे थे।
(लेखक- राष्ट्रीय साहित्य संस्थान के सहायक संपादक हैं। नब्बे के दशक में खोजपूर्ण पत्रकारिता के लिए ख्यातिलब्ध रही प्रतिष्ठित पहली हिंदी वीडियो पत्रिका कालचक्र से संबद्ध रहे हैं। साहित्य, संस्कृति और सिनेमा पर पैनी नजर रखते हैं।)







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