घर का निर्माण करते समय लोग अक्सर कमरों, रसोई और मुख्य द्वार की दिशा पर ध्यान देते हैं, लेकिन सीढ़ियों की योजना को उतना महत्व नहीं देते। वास्तु ग्रंथों में सीढ़ियों को केवल एक संरचनात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि भवन के भीतर ऊर्जा के प्रवाह को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण तत्व माना गया है।
सीढ़ियाँ कहाँ बनानी चाहिए?
वास्तु के अनुसार भवन में सीढ़ियों का स्थान सामान्यतः पश्चिम या उत्तर भाग में रखना अधिक उपयुक्त माना गया है। इसका उद्देश्य भवन के प्रमुख भागों में खुलापन बनाए रखना और आवागमन को व्यवस्थित करना है। सीढ़ियों का स्थान ऐसा होना चाहिए कि वे घर के मध्य भाग अर्थात ब्रह्मस्थान को प्रभावित न करें।
ग्रंथों में स्पष्ट निर्देश मिलता है कि ब्रह्मस्थान तथा मर्मस्थानों पर सीढ़ियाँ नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि इन्हें भवन के संवेदनशील ऊर्जा बिंदु माना गया है।
सीढ़ियों की दिशा कैसी हो?
वास्तु में सीढ़ियों का घुमाव विशेष महत्व रखता है। ऊपर चढ़ते समय सीढ़ियों का मोड़ दक्षिणावर्त अर्थात घड़ी की दिशा (Clockwise) में होना शुभ माना गया है। कई पारंपरिक ग्रंथों तथा वास्तु आरेखों में भी यही व्यवस्था दिखाई गई है। सीढ़ी सीधी हो सकती है, किंतु यदि उसमें मोड़ हो तो वह दाहिनी ओर घूमता हुआ होना चाहिए।
इसी प्रकार ऊपरी मंज़िल पर पहुँचने के बाद व्यक्ति का मुख पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर होना श्रेष्ठ माना गया है।
सीढ़ियों की संख्या का क्या नियम है?
वास्तु में सीढ़ियों के राइज़र (चढ़ने वाले स्टेप्स) की संख्या विषम (Odd Number) रखने की परंपरा है। विशेष रूप से ऐसी संख्या को शुभ माना गया है जिसे 3 से विभाजित करने पर शेषफल 2 प्राप्त हो।
उदाहरण के लिए:
● 11 सीढ़ियाँ (11 ÷ 3 = शेष 2)
● 17 सीढ़ियाँ (17 ÷ 3 = शेष 2)
● 23 सीढ़ियाँ (23 ÷ 3 = शेष 2)
● 29 सीढ़ियाँ (29 ÷ 3 = शेष 2)
वास्तु परंपरा में इसे शुभ फलदायी माना गया है और अनेक भवनों में इसी गणना का उपयोग किया जाता रहा है।
सभी स्टेप्स की ऊँचाई समान क्यों हो?
वास्तु ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि सीढ़ियों के सभी स्टेप्स की ऊँचाई समान होनी चाहिए। असमान ऊँचाई वाली सीढ़ियाँ न केवल चलने में असुविधा उत्पन्न करती हैं, बल्कि दुर्घटना की संभावना भी बढ़ाती। इसलिए वास्तु का यह नियम व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
ब्रह्मस्थान में सीढ़ियाँ क्यों नहीं?
ब्रह्मस्थान को भवन का ऊर्जा केंद्र माना गया है। वास्तु साहित्य में इसे खुला, हल्का और अवरोध रहित रखने की सलाह दी गई है। इसी कारण यहाँ भारी संरचनाएँ, स्तंभ, बीम या सीढ़ियाँ बनाने से बचने का निर्देश दिया गया है।
निष्कर्ष
वास्तु शास्त्र में सीढ़ियों को केवल एक वास्तु तत्व नहीं, बल्कि भवन की कार्यक्षमता, सुरक्षा और ऊर्जा संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण भाग माना गया है। पश्चिम या उत्तर भाग में स्थित सीढ़ियाँ, दक्षिणावर्त घुमाव, समान ऊँचाई वाले स्टेप्स तथा उचित संख्या में राइज़र जैसे नियम केवल परंपरा नहीं हैं, बल्कि व्यवस्थित निर्माण और सुगम उपयोग की दृष्टि से भी सार्थक दिखाई देते हैं। जब सीढ़ियों की योजना सोच-समझकर बनाई जाती है, तो वे केवल एक मंज़िल से दूसरी मंज़िल तक नहीं ले जातीं, बल्कि पूरे भवन की व्यवस्था और संतुलन को भी बेहतर बनाती हैं।
रिपोर्ट: देवकी नंदन देवड़ा
मो. 9377607101








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