जीउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत माताओं की उस आस्था और तप का पर्व है, जिसमें वे अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती हैं। यह पर्व खास तौर पर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में व्यापक रूप से मनाया जाता है। नेपाल के कुछ हिस्सों में भी इसकी परंपरा है।
हिंदू पंचांग के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। इस व्रत में कई स्थानों पर महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। यानी व्रत के दौरान अन्न के साथ पानी का भी सेवन नहीं किया जाता। इसी कठिन तप के कारण जीउतिया को मातृ आस्था और संकल्प से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।
जीउतिया का संबंध भगवान जीउतवाहन से जुड़ी लोककथा से भी माना जाता है। कथा के अनुसार राजा जीमूतवाहन ने एक नाग युवक के प्राण बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत कर दिया था। उनके त्याग और दूसरों के जीवन की रक्षा करने की भावना को इस पर्व की कथा परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है।
जीउतिया के अवसर पर महिलाएं भगवान जीउतवाहन की पूजा करती हैं, व्रत कथा सुनती हैं और अपनी संतान के मंगल की प्रार्थना करती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में पूजा की विधि, प्रसाद और अन्य रीति-रिवाजों में अंतर देखने को मिलता है।
इस पर्व को अक्सर पुत्र की लंबी आयु से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी व्यापक लोकपरंपरा संतान के जीवन, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना से जुड़ी है। इसलिए जीउतिया केवल एक उपवास नहीं, बल्कि मां के त्याग, संकल्प और संतान के प्रति ममता को व्यक्त करने वाली परंपरा के रूप में भी देखी जाती है।
2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत 3 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। व्रत और पारण के समय स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
जीउतिया की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें मां अपनी संतान के सुखी और दीर्घ जीवन की कामना के साथ कठिन व्रत का संकल्प लेती है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी परिवार, ममता और आस्था से जुड़े एक महत्वपूर्ण लोकपर्व के रूप में जीवित है।





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