गुवाहाटी। श्री परशुराम भवन में पितृपक्ष के पावन अवसर पर सर्वपितृ कल्याणार्थ श्रीमद् भागवत सेवा समिति के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद् भागवत महापुराण सप्ताह ज्ञान यज्ञ का सातवां एवं अंतिम दिन श्रद्धा और भक्तिमय वातावरण में संपन्न हुआ।
दिन के यजमान श्री शिवकुमार जी एवं श्रीमती ममता देवी दाधीच ने सहपरिवार प्रातःकालीन देव-अर्चन एवं पूजन किया। इसके बाद विधि-विधानपूर्वक हवन संपन्न हुआ। दोपहर 3 बजे व्यास पूजन एवं श्रीमद् भागवत महापुराण का पूजन किया गया।
कथा के दौरान अध्यात्म एवं साहित्य के आचार्य तथा प्रख्यात कथावाचक पंडित श्री नन्दू जी महाराज जाजड़ा ने श्रीमद् भागवत महापुराण में वर्णित 24 गुरुओं की व्याख्या करते हुए कहा कि एक ही इंद्रिय के वशीभूत होकर पतंगा, भंवरा, हिरण, मछली और हाथी जैसे जीव अपने प्राण गंवा बैठते हैं। मनुष्य तो पांचों इंद्रियों और असंख्य विषयों के आकर्षण में बंधा हुआ है। ऐसी स्थिति में उसकी दशा की कल्पना सहज ही की जा सकती है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर एवं सद्गुरु की कृपा से ही मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में कर परमात्मा का स्मरण कर सकता है। सोशल मीडिया, टेलीविजन और पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध के प्रति युवाओं के बढ़ते आकर्षण पर चिंता व्यक्त करते हुए महाराज जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति को लुप्त होने से बचाने का प्रभावी उपाय युवाओं में अध्यात्म एवं संस्कारों के प्रति रुचि उत्पन्न करना है।
उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत के श्रवण से आध्यात्मिक चेतना जागृत होती है और संस्कृति की रक्षा का मार्ग प्रशस्त होता है। भारतीय संस्कृति में प्राणी मात्र में परमात्मा का स्वरूप देखने और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” का संदेश दिया गया है।
महाराज जी ने राजा परीक्षित और श्री शुकदेव मुनि के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को मानव जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति के अनेक उपाय बताए। राजा परीक्षित ने सात दिनों तक अनुकूल आचरण करते हुए अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त किया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान संक्रमण काल में महात्माओं, साधु-संतों एवं विद्वानों का दायित्व है कि वे अपने मंदिरों, मठों और ज्ञान के माध्यम से समाज की सुप्त चेतना को जागृत करें तथा भारतीय संस्कृति की रक्षा का माध्यम बनें। ऋषि-मुनियों ने अथक परिश्रम से जिस महान सांस्कृतिक धरोहर को हमें सौंपा है, उसकी रक्षा करना हम सभी का दायित्व है।
महाराज जी ने कहा कि जैसे नदियों में गंगा, देवों में भगवान श्रीकृष्ण, वैष्णवों में भगवान शिव और क्षेत्रों में काशी श्रेष्ठ मानी जाती है, उसी प्रकार अठारह पुराणों में श्रीमद् भागवत महापुराण को श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम माना गया है। उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत का श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से आध्यात्मिक शांति एवं परम कल्याण की प्राप्ति होती है।
कथा के समापन अवसर पर व्यास पीठ से पंडित नन्दू जी महाराज ने श्री परशुराम भवन एवं गुवाहाटी में धर्म और समाज सेवा के लिए योगदान देने वाली दिवंगत पुण्यात्माओं को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने स्वर्गीय श्री मुरलीधर जी शर्मा, स्वर्गीय श्री गणपतराय जी धानुका, स्वर्गीय श्री केदार जी शर्मा, स्वर्गीय श्री रामकुमार जी चौधरी, बारपेटा रोड के स्वर्गीय पंडित श्री नथमल जी मिश्र, स्वर्गीय पंडित श्री ज्वाला प्रसाद जी चौमाल, स्वर्गीय पंडित श्री महावीर जी चौमाल, स्वर्गीय पंडित श्री शिवभगवान जी मंगलहारा, लढाक जी महाराज, स्वर्गीय पंडित श्री श्यामसुंदर जी शर्मा (पंचायती ठाकुरबाड़ी के पुजारी), स्वर्गीय श्री मोतीलाल जी जोशी, स्वर्गीय श्री गौरीशंकर जी जोशी, स्वर्गीय पंडित श्री जय नारायण जी दाधीच, पंडित श्री कल्याण सहाय जी दाधीच, देशवाली समाज के पंडित श्री रामबच्चन जी शास्त्री, गुवाहाटी के कर्मठ व्यक्तित्व स्वर्गीय डॉक्टर श्री भगवती प्रसाद जी सराफ, स्वर्गीय श्री मुरलीधर जी सुरेका, पूर्वांचल प्रहरी के संपादक श्री जी.एल. अग्रवाल तथा बारपेटा रोड के पुजारी पंडित श्री परमानंद जी जोशी सहित सभी पुण्यात्माओं को श्रद्धापूर्वक नमन किया।
महाराज जी ने कहा कि जिन-जिन यजमानों ने श्रीमद् भागवत महापुराण आयोजन में शारीरिक, आर्थिक एवं अन्य प्रकार से सहयोग प्रदान किया, उनके साथ उपस्थित सभी श्रद्धालुओं के पूर्वजों को भी स्मरण करते हुए परमात्मा से प्रार्थना की गई कि इस पुण्य आयोजन का पूर्ण फल दिवंगत आत्माओं को प्राप्त हो और भगवान उन्हें अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें।
व्यास पूजन के अवसर पर गौड़ महिला समिति, पारीक महिला परिषद, पूर्वांचल दाधीच परिषद, दाधीच महिला शक्ति सहित विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों ने व्यास पीठ का पूजन एवं सम्मान किया। श्रीमती संतोष शर्मा एवं श्री विनोद शर्मा द्वारा प्रस्तुत भजनों से सभागार भक्तिरस में सराबोर हो गया। श्रद्धालु भजनों पर भाव-विभोर होकर झूमने लगे और श्री परशुराम भवन का वातावरण भक्तिमय हो उठा।
कथा के समापन अवसर पर विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया।
इस प्रकार सात दिवसीय श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ श्रद्धा, भक्ति, आध्यात्मिक चेतना और पितृ स्मरण के साथ संपन्न हुआ।





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