विभिन्न संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने किया सम्मानित, ‘प्राज्ञ-बिक्षण’ अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन
रिपोर्ट: बिजू कुमार तुनवाल
टियोक। वृहत्तर टियोक के सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में आजीवन योगदान देने वाले प्रख्यात संस्कृत विद्वान, शिक्षाविद, लेखक एवं सेवानिवृत्त प्राध्यापक और प्राचार्य डॉ. अकण चंद्र सैकिया का शनिवार को टियोक में सार्वजनिक अभिनंदन किया गया। शंकरदेव की सांस्कृतिक परंपरा के साधक डॉ. सैकिया के बहुआयामी व्यक्तित्व और उपलब्धियों पर आधारित ‘प्राज्ञ-बिक्षण’ शीर्षक अभिनंदन ग्रंथ का भी विधिवत विमोचन किया गया।
टियोक उच्चतर माध्यमिक बालिका विद्यालय में आयोजित इस गरिमामय समारोह में टियोक, काकजान, जाजी सहित वृहत्तर क्षेत्र के विभिन्न स्थानों से शिक्षाविद, साहित्यकार, सांस्कृतिक कार्यकर्ता, गणमान्य नागरिक और उनके प्रशंसक शामिल हुए। मरियानी विधानसभा क्षेत्र के विधायक रूपज्योति कुर्मी ने भी समारोह में उपस्थित होकर डॉ. सैकिया के प्रति सम्मान व्यक्त किया और उन्हें शुभकामनाएं दीं।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में असम साहित्य सभा के अध्यक्ष डॉ. बसंत कुमार गोस्वामी उपस्थित रहे। जगन्नाथ बरुआ विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. ज्योतिप्रसाद शइकिया ने ‘प्राज्ञ-बिक्षण’ अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन किया। विशिष्ट अतिथियों में जाजी हेमनाथ शर्मा महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. मानजिंग गोगोई, काकजान महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. रश्मि रेखा शइकिया तथा टियोक के चंद्रकमल बेजबरुआ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. बिनयरत्न राजखोवा शामिल रहे। वक्ताओं ने डॉ. सैकिया के जीवन-दर्शन, शैक्षणिक योगदान और साहित्य-संस्कृति के प्रति उनकी दीर्घकालीन साधना पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर टियोक मारवाड़ी समाज, मारवाड़ी सम्मेलन तथा टियोक राधा-कृष्ण मंदिर की ओर से भी डॉ. अकण चंद्र सैकिया का सम्मान किया गया। समाज की ओर से बद्रीनारायण करनानी, कामाख्या लाल चांडक, रामावतार बिहानी, बिजू तुनवाल, मनोहरलाल मुंद्रा और गोपाल मुंद्रा ने उन्हें सम्मानित किया। वहीं, आदित्य कुमार तुनवाल ने उन्हें असमिया गमछा पहनाकर स्वागत किया।
इसके अतिरिक्त, डॉ. सैकिया के निवास पर पहुंचकर टियोक मारवाड़ी समाज, मारवाड़ी सम्मेलन और राधा-कृष्ण मंदिर समिति की ओर से विशेष अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। इस दौरान बद्रीनारायण करनानी, कामाख्या लाल चांडक, रामावतार बिहानी, मनोहरलाल मुंद्रा, गोपाल मुंद्रा तथा अधिवक्ता यूनियन के प्रतिनिधियों ने उनका सम्मान किया।
उन्हें अभिनंदन-पत्र, चादर, मयूरपंखी बैज, राजस्थानी पगड़ी, शेलेंग चादर, दुपट्टा और असमिया गमछा भेंट किया गया। समाज के प्रतिनिधियों ने उनके आजीवन शैक्षणिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान की सराहना करते हुए उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की। यह सम्मान टियोक में विभिन्न भाषा और संस्कृतियों के बीच आपसी सद्भाव, सम्मान तथा सामाजिक एकता का प्रतीक बना।
डॉ. अकण चंद्र सैकिया केवल संस्कृत के विद्वान और शिक्षाविद ही नहीं, बल्कि वृहत्तर टियोक के सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़े सम्मानित व्यक्तित्व हैं। शंकरदेव दर्शन में जीवनबोध की खोज करने वाले डॉ. सैकिया ने नैतिक और आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अस्सी वर्ष की आयु पार करने के बाद भी अध्ययन, लेखन और सामाजिक कार्यों के प्रति उनकी सक्रियता नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
जोरहाट जिले के जगदुवार न-पमुवा सोनारी गांव में जन्मे डॉ. सैकिया ने 333 नंबर जगदुवार सोनारी प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद टियोक हाई स्कूल से वर्ष 1963 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने जोरहाट के जगन्नाथ बरुआ महाविद्यालय से वर्ष 1967 में संस्कृत विषय में ऑनर्स के साथ स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वर्ष 1971 में गुवाहाटी विश्वविद्यालय से संस्कृत में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की। इसके अतिरिक्त, वर्ष 1980 में काव्यशास्त्री उपाधि और 1989 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध का विषय था—‘Rukminiharana Legend in Sanskrit and Later Indian Literature’।
डॉ. सैकिया ने 1 अप्रैल 1965 को जोरहाट के शंकरदेव सेमिनरी में शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने टियोक हाई स्कूल और मेलेंग माध्यमिक विद्यालय में भी अध्यापन किया। 11 सितंबर 1972 को जाजी हेमनाथ शर्मा महाविद्यालय के संस्कृत विभाग में प्राध्यापक के रूप में योगदान दिया और लगातार 28 वर्षों तक शिक्षण कार्य किया। इसके बाद 1 अप्रैल 2000 को काकजान महाविद्यालय के प्राचार्य का पदभार संभाला और 31 जनवरी 2006 को सेवानिवृत्त हुए।
अध्यापन और प्रशासनिक दायित्वों के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति और शोध के क्षेत्र में भी डॉ. सैकिया का योगदान उल्लेखनीय रहा है। कई महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना के माध्यम से उन्होंने अपने गहन अध्ययन, जीवन-दर्शन और सामाजिक प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त किया है। सेवानिवृत्ति के बाद भी अध्ययन और लेखन के प्रति उनकी सक्रियता निरंतर बनी हुई है।
उल्लेखनीय है कि 8 मई 2026 को आयोजित एक सार्वजनिक सभा में डॉ. सैकिया को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने तथा उनके जीवन और कार्यों पर आधारित अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया था। इसी निर्णय के अनुरूप शिक्षाविद हिमेन भट्टाचार्य को अध्यक्ष बनाकर वृहत्तर टियोक और आसपास के क्षेत्रों के लोगों के सहयोग से ‘प्राज्ञ-बिक्षण’ ग्रंथ के प्रकाशन की पहल की गई।
एक विद्वान की आजीवन साधना, कर्मनिष्ठा और सामाजिक प्रतिबद्धता को सार्वजनिक मान्यता देने के साथ-साथ उनके अनुभवों, जीवन-दर्शन और कार्यों को भावी पीढ़ी के लिए संरक्षित करने का यह प्रयास टियोक के बौद्धिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में विशेष महत्व रखता है। विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे प्रशंसकों और शुभचिंतकों की उपस्थिति डॉ. अकण चंद्र सैकिया के प्रति समाज की गहरी श्रद्धा और आत्मीयता का प्रमाण बनी।



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