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श्वेता हत्याकांड: न्याय तक का सफ़र


प्रवेश मिश्र












श्वेता हत्याकांड में आरोपी गोविंद ने अपना आरोप कबूल लिया है | क्या न्याय मिल गया मेधावी श्वेता को ? हो गयी प्रक्रिया पुरी ? इसमें कोई दो राय नहीं है की हमे पुलिस एवं सारे सम्बंधित सरकारी तंत्र की पीठ थपथपानी चाहिए | अभी तक के पुलिसिया कार्यवाही की प्रक्रिया सराहनीय रही है | सभी ने इस पुरे प्रकरण की गंभीरता एवं संवेदनशीलता को समझते हुए बेहद तत्परता के साथ गुत्थी को सुलझाने में ज्यादा समय नहीं लगाया | पर क्या महज आरोपी को पकड़ लेने से और कबूलनामा दर्ज करवाने से शोक संतप्त अभिभावकों के दुखो का अंत हो जाएगा ? प्रक्रिया अभी भी बाकी है | न्यायपालिका पर पूर्ण विश्वास है मुझे, पर आमतौर पर इंसाफ के लिए लग जाने वाले समय पर दुःख व्यक्त करना भी लाजमी है | न्यायपालिका के काम करने की एक प्रक्रिया है और इस प्रक्रिया के दौरान भूतकाल में कई आरोपियों को बयान से पलटते हुए या अपने कबुलनामे से बदलते हुए इस समाज ने देखा है | इस हत्याकांड के सन्दर्भ में हम सभी लोगो को सतर्क और जागरूक रहने की जरुरत है | श्वेता के परिवार के साथ सिर्फ कुछ दिनों तक नहीं बल्की हमें तब तक रहना है जब तक गुनहगार को आपने कृत की सज़ा न मिल जाए |
मैंने विडियो लाइब्रेरी के जरिये कुछ विडियो देखें | राज्यभर में हायर सेकेंडरी (कॉमर्स) में प्रथम आने के बाद श्वेता का एक निजी चैनल को दिए बाइट का एक भाग मिला | आत्मविश्वास छुपाए नहीं छुप रहा था | कदम ज़मीन पर तो नहीं लग रहे थे | हर सपनो को साकार करने का सामर्थ्य साफ़ चेहरे पर दिख रहा था | सपने अब अधूरे रह गए | शायाद न्याय ही इकलौता शब्द है जिससे श्वेता को सच्ची श्रधांजलि दी जा सकती है | अफवाहों का बाजार भी गर्म है | हर तरफ अविश्वसनीय माध्यमो से अलग अलग बाते की जा रही है, जिनका शायद इस काण्ड से सरोकार ना हो | सामाजिक संस्थाओ पर भी सवालिया निशान लगाया गया यह कह कर की सब श्वेता के साथ खड़े नहीं हुए, विशेष तौर पर मारवाड़ी संगठन पर | वर्तमान परिवेश को देखते हुए यह नहीं लगता है | बहुत सारे लोगो और अनेको संस्थाओ को श्वेता के हक़ में खड़े होते हमने पिछले दो दिनों मै देखा है | मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी युवा मंच इत्यादी अनेको संस्थाओं ने अपना दुःख व्यक्त किया है एवं न्याय प्रक्रिया में निष्पक्ष जांच का समर्थन किया है | कानूनी जांच चल रही है और उसकी कई मर्यादाएं होती है | संवेदनशील मामलो में कानूनी पेचीदगीयों का ख़ास ख़याल रखना पड़ता है | पुलिस सक्रियता से इस मामले में शुरू से काम कर रही है | कहीं ना कहीं अभिभावक भी पुलिसिया कार्यवाही से असहमत नहीं होंगे | प्रारंम्भ से ही कहीं भी ऐसा नहीं लगा की सरकारी तंत्र द्वारा अनुचित या अनुपयुक्त तफ़तीश की जा रही हो और समाज असंतुष्ट हो | मेरे अनुसार सामाजिक संस्थाओं को पैनी नज़र रखनी चाहिए इस पुरे घटनाक्रम पर और जैसे ही लगे की कुछ सवाल मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो रहे हो, तो अपनी आवाज़ बुलंद कर लें | 
असम के मारवाड़ी सामाजिक संस्थाओं ने समाज में पानी पिलाने के अलावा बहुत कुछ और भी किया है | सबसे मेल खाता हुआ उदाहरण गोरेश्वर कांड है | गोरेश्वर में सात साल की बालिका के साथ दुष्क्रम हुआ और पुलिसिया महकमा शांत बैठा हुआ था | आधिकारिक रखवाले की कमजोरी साफ़ दिखाई दे रही थी | तब मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी युवा मंच समेत अनेको संगठनो ने एकता दिखाते हुए एक पटल पर आके बिरोध प्रदर्शन किया और मौजूदा व्यवस्था को कार्यवाही करने पर मजबूर कर दिया | श्वेता हत्याकांड में ऐसा कभी नहीं था | जब सारे तंत्र अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हो तो सामजिक संगठन निष्पक्ष जांच के अलावा प्रशासन से और क्या गुहार लगा सकता है | कल नौ बड़े संगठनो की रैली होगी, जिसमे मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी युवा मंच भी प्रमुख है | न्याय तक का सफ़र बहुत कठिन और लम्बा होता है जहां आरोपी आपनी तरफ से हर दाँव पेंच लगा कर बचने की कोशिश करता है | न्यायपालिका से आग्रह रहेगा की इस पुरे प्रकरण को किसी फास्ट ट्रैक पद्धति के तहत जल्द से जल्द निष्कर्ष तक पहुचाएं | अब सबसे बड़ी भूमिका सामाजिक संगठनो की रहेगी | जैसा की सब शोक संतप्त परिवार को आश्वाशन दे रहे है, निष्पक्ष जांच के लिए हो रहे प्रसंस्करण पर पैनी नज़र रखनी होगी | आरोपी को कड़ी से कड़ी सज़ा दे कर समाज के सामने एक उदाहरण देना चाहिए ताकि आने वाली पीढियों तक यह याद रखा जाए और कोई और इस तरीके के कृत को दोहरा ना सके | पुलिस आयुक्त हिरेन चन्द्र नाथ के मुताबिक़, श्वेता शादी करने की मांग रख रही थी और आरोपी उससे सहमत नहीं था | यह एक व्यक्तिगत मामला है जिसको में ज्यादा विस्तार में नहीं लिखना चाहूँगा पर इतना जरुर कहना चाहूँगा की श्वेता आरोपी के साथ आपना जीवन बिताना चाहती थी पर आरोपी ने उसका जीवन मिटाना वाज़िब, आसान और सस्ता समझा | हमारी संस्कृति में शादी को एक महत्वपूर्ण बंधान माना जाता है | शादी तो नहीं पर मरणोपरांत मुखाग्नी की रश्म आरोपी ने घृणित तरीके से अपने आप पुरी कर दी | यह निंदनीय है | हम उस भारत देश के नागरीक है जहा सीमा पर मारे जाने वाले दुश्मनों के शवो को भी आदर सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाता है | श्वेता तो आरोपी की परिचित थी और एक अच्छे अरसे से एक दुसरे को जानते थे | इसको सिर्फ आरोप नहीं बल्की घृणित आरोप कहा जाए तो ज्यादा सही होगा | पहले तो अपने किसी परिचित की हत्या करना और फिर डर के मारे लाश को ठिकाने लगाने में हज़ार तिकड़म लगाने वाले इस व्यक्ति के हाथ श्वेता को आग लगाने से पहले ज़रा भी नहीं काँपे ? इस तरह के व्यक्ति एक विशेष समाज, राज्य या देश ही नहीं बल्की सम्पूर्ण वसुधा के लिए घातक है | 
मैंने अपने लेख मैं आरोपी को सिर्फ आरोपी ही कहा है क्यूंकि आरोपी के नाम को श्री कृष्ण से जोड़ा जाता है और नाम के कुछ एक अर्थो में एक अर्थ वेदों के रक्षक का निकलता है | किसी भी कोण से आरोपी अमानुषिकता, निर्दयता के रक्षक के अलावा कुछ नहीं लगता | यह अब समाज को मिल कर सुनिश्चित करना होगा की यह अपराधी किसी भी तरह बाहर ना आ पाए | अपराधी का अगर कोई साथी है तो वह भी बराबर की सज़ा के हकदार है | अगर हम सच में एक स्वच्छ समाज चाहते है तो इस तरह के लोगो को समाज में वापस प्रवेश ना मिले यह हम सबको मिल कर प्रतिज्ञा लेनी होगी | सही मायने में तभी हम एक स्वच्छ भारत का निर्माण कर पाएंगे | भौतिकवादी समाज में हम सब संस्कारों एवं कर्मो की स्वच्छता को भूल गए है | अलग अलग सामाजिक संस्थाए अपने अपने एजेंडे, सुविधाएं व विशेषताओं के अनुरूप अपने अपने क्षेत्र में सराहनीय काम कर रहे है | किसी ना किसी को समाज में यह जिम्मेदारी भी अब लेनी होगी जो नैतिकता की शिक्षा प्रदान करें | ऐसा कोई स्थाई कार्यक्रम बने जो इंसानियत का पाठ पढाए | पश्चिमी संस्कृति की पीछे भागते भागते इस फ़र्ज़ी वक़्त में हमारे समाज में रहने वाले कुछ लोग इंसानियत भूल गए है | ना केवल सामाजिक संस्थाएं बल्कि शिक्षण संस्थानों को भी गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए कुछ कार्यशालाओ के माध्यम से नैतिकता का ज्ञान छात्रों को देना चाहिए |

यह संपादकीय असम के दैनिक पूर्वोदय में भी 9 दिसंबर 2017 को प्रकाशित हो चुका है 

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