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सिर्फ नेता नहीं, मानवीय नेता कि मध्यस्थता


प्रवेश मिश्र











सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद आपसी सहमति से सुलझाने की बात कहने के बाद अटकलों का बाज़ार गर्म हो गया था कि कौन सुलझाने के लिए आगे आयेगा| अध्यात्मिक गुरु व शांति के राजदूत श्रीश्री रविशंकर ने इस पुरे मामले की मध्यस्थता करने का बीड़ा उठाया है| वह 16 नवंबर को अयोध्या पहुंच रहे हैं। अयोध्या में वह हिंदू और मुस्लिम, दोनों ही पक्षकारों से मुलाकात करेंगे। राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात या मध्यस्थता के कई मायने भी निकाले जा रहे होंगे पर में राइज प्लस के मूल सिद्धांतो को जीवित रखते हुए इस मामले के राजनीतिक पक्ष पर कुछ नहीं लिखना ही बेहतर समझूंगा| राम मंदिर और बाबरी मस्जिद असल में सांस्कृतिक और सामाजिक मुद्दा है कोई राजनीतिक अवसर नहीं, इसको सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार सभी पक्षों को सौहार्दपूर्ण बैठको के द्वारा नतीजे तक लाना चाहिए| 
श्रीश्री का क्या फार्मूला होगा यह फिलहाल तो किसी को पता नहीं है पर सभी पक्षों से मिलने के बाद शायद अपनी रणनीति को वह लोगो के समक्ष रखें| अंग्रेजी शब्द "कोम्प्रोमाईज़" कहा जा रहा है इस दौर के प्रयोग को, जिसका हिंदी में सटीक मतलब है समझौता| हर पक्ष को कुछ पाना है और कुछ क्षेत्रों में सामने वाले खेमे को समझना है| श्रीश्री के इस पहल से अयोध्या विवाद को कोर्ट से बाहर सुलझाने की कोशिश की में सराहना करता हूँ और यह देश के दोनों समुदायों की कृतज्ञता में बदल जाएगी जब इसका निष्कर्ष सकारात्मक होगा| मध्यस्थता कोई भी कर सकता था पर श्रीश्री रविशंकर के बारे में मुझे व्यक्तिगत तौर पर लगता है की उनकी बातों को सभी पक्ष सुनेगा एवं मौजूदा सरकारी तंत्र भी उनके निष्कर्ष पर गंभीरता से संज्ञान लेगा|
मैंने इतिहास के कुछ पन्नों को पलटकर कुछ ऐसे बुनियादी तथ्यों की जानकारी लेने की कोशिश कि जो इस पुरे प्रकरण को समझने में थोड़ी मदद करेगा | दरअसल ये विवाद दो नहीं बल्कि तीन पक्षों के बीच है निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड| गर्भगृह में विराजमान रामलला की पूजा और व्यवस्था निर्मोही अखाड़ा शुरू से करता रहा है। लिहाजा, वह स्थान उसे सौंप दिया जाए ऐसा उनका दावा है| रामलला विराजमान का दावा है कि वह रामलला के करीबी मित्र हैं। चूंकि भगवान राम अभी बाल रूप में हैं, इसलिए उनकी सेवा करने के लिए वह स्थान रामलला विराजमान पक्ष को दिया जाए, जहां रामलला विराजमान हैं। सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड का दावा है कि वहां बाबरी मस्जिद थी। मुस्लिम वहां नमाज पढ़ते रहे हैं। इसलिए वह स्थान मस्जिद होने के नाते उनको सौंप दिया जाए। 
विवाद पुराना है और वार्ता के दौर से ही सुलझेगा| दोनों समुदायों को संवेदनशील रहकर इसको सुलझाना चाहिए| संवेदनशील शब्द से मुझे एक आपना व्यक्तिगत अनुभव याद आ रहा है | बात सितम्बर 2010 की है जब मै जयपुर से नॉएडा नया नया आया था| राष्ट्रीय राजधानी और आस पास के क्षेत्र का, जिसे NCR कहा जाता है वहा का पहला पहला अनुभव था| इलाहाबाद हाई कोर्ट का बाबरी मस्जिद प्रकरण पर फैसला भी तभी आना था| माहौल आस पास में ऐसा बना हुआ था की अब कुछ नकारात्मक घटित होगा| हर तरफ लोगो को यही कहता हुआ सुनने को मिलता था की हाई कोर्ट का फैसला आ रहा है और जिस समुदाय के विपरीत फैसला जाएगा उनके द्वारा उपद्रव मचाया जाएगा| फैसले के दिन अथवा एक दो दिन आसपास से ही लोगों ने अपने सभी यात्रा कार्यक्रमों को रद्द कर दिया था| आम नागरिको के अन्दर भय का माहौल था| दरअसल ऐसा होना नहीं चाहिए, न्यायपालिका पर सबको विश्वास होना चाहिए और जो भी फैसला हो उसको मनना चाहिए| अगर फैसले पर असहमति है तो उसे न्यायपालिका की प्रक्रिया के तहत व्यक्त करना ही समाजहित एवं राष्ट्रहित में है|
अपने शीर्षक पर लौटते हुए, मानवीय नेता श्रीश्री रविशंकर अपनी कोशिश में सफल हो और मित्रतापूर्ण भाव से सभी पक्षों में आम सहमती बना कर वह इस मामले को इतिहास में तब्दील करे यह मेरी कामना रहेगी|

यह संपादकीय असम के दैनिक पूर्वोदय में भी 16 नवम्बर 2017 को प्रकाशित हो चुका है

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