"एक अंधी बस्ती है,
अँधेरे में भटकता, एक अधमरा समाज है
ऐसा ये अन्धविश्वास है"
ऊपर लिखी पंक्तियाँ किसी ने एक दम सटीक लिखीं है। अंधविश्वास के अंधेरे में भटक रहा है हमारा अधमरा समाज। यह आधा इसके पीछे भटकते-भटकते मर गया और रोका न गया तो शायद लुप्त हो जाएगा। इस लेख के शीर्षक में लिखे तीनों शब्द हाल ही में दिल्ली के बुराड़ी में हुई घटना से सम्पूर्ण रूप से मिलते दिख रहें है। एक ही परिवार के 11 लोगों ने दिल्ली में कथित रूप से मोक्ष प्राप्ति के लिए मौत को गले लगा लिया। पुलिस की तहक़ीक़ात जारी है और अभी तक सारे एंगल धार्मिक अंधविश्वास की और ही जा रहे हैं। परिवार के आध्यात्मिक प्रवृति का होने की बातें सामने आ रही हैं।
क्या है अंधविश्वास ?
अंधविश्वास एक ऐसी जटिल आपदा है जिसका समाधान बहुत पास भी है और कोसो दूर भी। विश्वास जैसे जैसे गिरता है, अंधविश्वास मजबूती से खड़ा होता है। अगर किसी भी बात को उसके पीछे के तर्क को लेकर सवाल उठाए बिना माना जाता है, तो उसे अंधविश्वास कहते हैं। विश्वास और अंधविश्वास के बीच का अंतर सिर्फ समझ का है। अंधविश्वास एक ऐसा विश्वास है जो तार्किक तौर पर खरा नहीं उतरता। अंधविश्वासियों का कुनबा इतना बढ़ गया है की उन्होंने तो अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में अगस्त 2013 में गोली मारकर हत्या कर दी थी। डॉ दाभोलकर की हत्या का मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बनकर उभरा। कई विद्वानों का मानना हैं कि यह दुख की बात है कि एक ऐसा देश, जहां विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है और अंतरिक्ष में सैटेलाइट तक भेजे जा रहे हैं, वहां इंसानों की बलि दी जाती है और बेमतलब के रीति-रिवाज माने जाते हैं। पुरे विश्वभर में मेरे हिसाब से भारत में ही सबसे ज्यादा अंधविश्वास को माना जाता होगा। इसका एक कारण यह भी होगा की यहाँ भगवान को सबसे ज्यादा माना जाता है। जीवन के मार्गदर्शन के लिए भगवान में आस्था बहुत जरुरी है पर भगवान के प्रति बिश्वास अंधविश्वास में न बदल जाए इसका सबको खयाल रखना चाहिए। धन, दौलत, सफलता इत्यादी के पीछे भागते भागते लोग अनेकों टोटके अपना लेते है। मेरे हिसाब से इस जीवन पथ पर नियंत्रण के साथ चलने का इकलौता टोटका मेहनत है। भगवान के प्रती विश्वास के साथ मेहनत होनी चाहिए, सफलता तो बहुत छोटी वस्तु है।
क्या आत्महत्या से मोक्ष कि प्राप्ति हो सकती है ?
शास्त्रों और पुराणों के अनुसार जीव का जन्म और मरण के बंधन से छूट जाना ही मोक्ष है। अभी तक की पुलिस की शुरुआती जांच में यह ही सामने आया है कि दिल्ली के भाटिया परिवार ने सुनियोजित ढंग से मोक्ष प्राप्ति के लिए मौत को अपने गले लगाया, लेकिन अब सवाल उठता है कि क्या सनातन धर्म में ऐसे मोक्ष मिल सकता है? मेरे सिमित ज्ञान से मै दावे के साथ कह सकता हूँ की आत्महत्या से कभी भी मोक्ष नहीं मिल सकता अपितु अपने खाते में पाप जरुर जोड़ सकते हो। कानूनी तौर पर ही नहीं बल्की धर्मं के लिहाज से भी आत्महत्या अपराध है।
क्या अंधविश्वास था पुरे परिवार को ?
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ रही है रोज ही नए और अजीबों गरीब खुलासे हो रहे हैं। 11 लोगों की मौत के रहस्य की जांच करते हुए पुलिस के हाथ दो रजिस्टर व कुछ नोट्स लगे हैं। रजिस्टर से पता चलता है कि भाटिया परिवार बुरी तरह अंधविश्वास के फेर में फंसा था। भाटिया परिवार पिछले काफी दिनों से मोक्ष प्राप्ति की तैयारी कर रहा था। इसके लिए सही समय का इंतजार किया जा रहा था। पुरे परिवार का मानना था कि यह क्रिया को करने से उनकी जान नहीं जाएगी। ‘जब हम फंदे पर लटकेंगे तो भगवान के दर्शन होंगे और भगवान हम सबको बचा लेंगे...।’ अब तक की पुलिस की जांच की मानें तो कुछ इसी अंधविश्वास ने पूरे भाटिया परिवार को मौत के मुंह में धकेल दिया। रजिस्टर में लिखी क्रिया के अनुसार, पूजा के लिए मंगलवार, बृहस्पतिवार के अलावा शनिवार या रविवार का दिन ही चुना जाना चाहिए। क्रिया करने से पूर्व लगातार सात दिन तक पूजा करना भी जरूरी है। क्रिया रात 12 से एक बजे के बीच ही होनी चाहिए। जिस दिन घर में क्रिया हो, उस दिन घर में कुछ नहीं बनाना चाहिए। क्रिया के लिए जरूरी है कि सबकी सोच उस समय एक जैसी हो। पूजा के लिए मध्यम रोशनी होनी चाहिए। क्रिया को दृढ़ता के साथ करना है। मन शून्य में चला जाना चाहिए। किसी भी तरह की अड़चन से बचने के लिए कानों का बंद होना भी जरूरी है। इसलिए कानों में रुई डालकर बंद किया जाना चाहिए। आंखों को अच्छी तरह से पट्टियां बांधना है। सूती रस्सियों के साथ सूती चुन्नियों या साड़ी का ही प्रयोग किया जाना चाहिए। पट्टियां अच्छी तरह से बंधी होनी चाहिए। पट्टियां यदि बच जाएं तो उन्हें आंखों पर डबल कर लेना है। मुंह को भी पट्टियों के अलावा रुमाल से बांध लेना है। जितनी श्रद्धा दिखाओगे, उतना ही अचित फल मिलेगा।
कैसे बचे अंधविश्वास से ?
अंधविश्वास अंधकार है और अंधकार का अंत प्रकाश ही कर सकता है। यहां प्रकाश का मतलब है ज्ञानरूपी प्रकाश। हम सब को तार्किक होना पड़ेगा। सही दिशा में तर्क करके सवालों का जवाब पाइए, समझिए और फिर अपनाइए। भारत आस्था का देश है और इस बात का अपने तर्क के दौरान विशेष ध्यान रखना चाहिए कि किसी की भावना आहत ना हो। कर्मठता और कर्तव्य शीलता को जीवन का आधार बनाइए। मानव को सर्वश्रेष्ठ जीव माना जाता है इसलिए क्योंकि हम में सोचने की और समझने की क्षमता है। सभी को व्यक्तिगत तौर पर अपनी सोच, समझ और सूझ बुझ का इस्तेमाल करते हुए अंधविश्वास मुक्त जीवन शैली को अपनाना चाहिए। अंधविश्वास, आडंबर के चक्कर में लोग जीवन की तमन्नाओं के बजह से भी पड़ जाते है । अति महत्वकांक्षी और सब कुछ पा लेने का भाव लोगों को संतोष से कोसों दूर कर दे रहा है। हमें इस बात पर विश्वास रखना चाहिए कि भगवान ने हमें जो भी दिया है उसी के साथ हम संपूर्ण हैं। सब कुछ पा लेने की चाहत हमें अंधविश्वास और आडंबर की ओर धकेल देता है। इस बात पर मुझे पिताजी, संपत मिश्र द्वारा लिखी गई कविता 'तमन्ना' की दो पंक्तियां याद आ रही है:
तेरी तमन्ना, मेरी तमन्ना, उसकी तमन्ना, तमन्ना का कोई छोर नहीं,
तमन्नाओं के साये में ढल गई रात, हुई कभी भोर नहीं।
लेखक युवा पत्रकार व राइज प्लस के कार्यकारी संपादक हैं
प्रवेश मिश्र
कार्यकारी संपादक, राइज प्लस
8882276606, 9971516086
यह लेख असम के दैनिक पूर्वोदय में भी 6 जुलाई 2018 को प्रकाशित हो चुका है









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