कजली तीज मनाई गई - Rise Plus

NEWS

Rise Plus

असम का सबसे सक्रिय हिंदी डिजिटल मीडिया


Post Top Ad

कजली तीज मनाई गई


गुवाहाटी - भाद्र कृष्ण तृतीया को आज नव विवाहित महिलाओं ने कजली तीज का आयोजन विभिन्न तरीकों से किया। इस अवसर पर प्रतीकात्मक रूप से दूध की तलैया का निर्माण कर उसमें नीम के पेड़ को लगाया जाता है। चने की सत्तू से लड्डू बनाकर के भोग लगाया जाता है। शाम को चंद्रोदय होते ही चंद्रमा को अर्घ देकर के महिलाएं आरती उतारती है। कथा, कहानी और भजनों से कजली तीज मैया को रिझाती है। नव विवाहित महिलाएं इस व्रत को बड़े रूप में विधिवत रूप से आयोजित करती है ताकि उनका सुहाग अमर रहे। गौरतलब है कि यह त्यौहार विशेष रूप से दाधीच ब्राह्मण  समाज व माहेश्वरी समाज में प्रचलित है।

हमारी सांस्कृतिक विरासत का पर्व सातूङी(कजली) तीज

हिन्दू पंचांग प्रणाली के अनुसार साल के छठे महीने को भाद्रपद कहा जाता है। भाद्रपद अर्थात भादों का पूरा माह विष्णु के कृष्ण आभि लिए हुए अवतारों को संबोधित है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी अर्थात कजली तीज के नाम से जाना जाता है। इस दिन आसमान में घुमड़ती काली घटाओं के कारण इस पर्व को कजली अथवा कजरी तीज के नाम से पुकारते हैं। इस पर्व में परविद्धा तृतीया ग्राह्य है। यदि इस तिथि को पूर्वाभाद्रपद या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र हो तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। भाद्रपद के दो नक्षत्रों में से उत्तराभाद्रपद शनि का नक्षत्र है। इस नक्षत्र में भगवान विष्णु के श्याम वर्ण लिए विग्रह का पूजन करने का विधान है। किसी भी भाद्रपद नक्षत्र में शनिदेव व भगवान श्रीकृष्ण के पूजन का विधान है। शब्द कजली का अर्थ है काले रंग से। शास्त्रों में शनिदेव का स्थान काले मेघों के बीच माना जाता है तथा शब्द भाद्रपद से ही शनि की बहन भद्रा उत्तपन हुई थी। शब्द भाद्रपद का अर्थ है जिनके श्री चरण सुंदर हों अर्थात श्रीकृष्ण व शनिदेव।
क्योंकि कजरी अर्थात कजली तीज पर भगवान विष्णु के शामल वर्ण लिए विग्रह का पूजन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। कजरी तीज पर सुहागने तथा कंवारी कन्याएं पार्वती के भवानी स्वरूप का पूजन भी करती हैं। कजरी तीज पर तीन बातें त्याज्य मानी जाती हैं पहला पति से छल कपट, दूसरा मिथ्याचार एवं दुर्व्यावहार तथा तीसरा परनिंदा। सुहागने कजरी तीज को अपने पीहर अथवा अपने मामा के घर मनाती हैं। इस दिन विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर सुहागने अपनी सास के पांव छूकर उन्हें भेंट करती हैं। यदि सास न हो तो जेठानी या किसी वयोवृद्धा को देना शुभ होता है। कजरी तीज पर पैरीं में मेहंदी लगाने का विशेष महत्व है। लोक मान्यता के अनुसार, इसी दिन गौरा अर्थात पार्वती विरहाग्नि में तपकर काली हो गई थी तथा इसी दिन उन्होंने अपना काल रंग त्यागकर पुनः शिव से मिलन किया था। इस दिन मां पार्वतीजी की सवारी बड़ी धूम-धाम से निकाली जाती है। पीपल, कदंब और बरगद के पत्ते मां भवानी, श्री राधा-कृष्ण और शनिदेव का पूजन कर चढ़ाएं जाते हैं।



विडियो देखने के लिए निचे क्लिक या टेप करें

राइज प्लस में खबर भेजने के लिए risepluslive@gmail.com पर ईमेल करें

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

नियमित रूप से WhatsApp पर हमारी खबर प्राप्त करने के लिए दिए गए 'SUBSCRIBE' बटन पर क्लिक करें