डॉ. राकेश राणा
स्वास्थ्य को सामान्यतः शरीर से जोड़ा जाता है। पूर्ण और वास्तविक स्वास्थ्य के लिए शरीर के साथ मन का शांत होना आवश्यक है। तभी मानसिक शांति भी मिलती है। जो एक अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की मनःस्थिति है। हमारे मनोभावों में निर्मलता हमें मानसिक स्वास्थ्य की ओर बढ़ाती है। शरीर और मन दोनों का स्वस्थ होना एक-दूसरे के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। तभी मनुष्य पूर्ण स्वास्थ्य की तरफ बढ़ता है। इस पूर्णता की प्राप्ति का होना हमारे मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत हद तक निर्भर करता है। शरीर, मन और बुद्धि का संतुलन ही आदर्श स्वास्थ की स्थिति है।
भारतीय चिंतन दृष्टि प्रकृति के दिशा-निर्देशों एवं संकेतों की छाया में शनैःशनैः विकसित हुई जीवन-दृष्टि है। भारतीय-बोध प्रकृति के समानान्तर विकसित ज्ञान और जीवन अनुभव से बनी व्यवहारिक समझ है। इसलिए हम जीवन के सभी पक्षों पर पूर्णता में विचार करते हैं और विकास को चक्रीय दिशा में देखने व समझने वाली चिंतन धारा के साथ जीवन अवस्थाओं को जोड़ते रहे हैं। भारतीय समाज में जीवन-चक्र, ऋतु-चक्र, फसल चक्र जैसी जीवन-दृष्टि, प्रकृति प्रेरित जीवनानुभवों से ही विकसित हुई दृष्टि है। जिसे योग और आध्यात्म के सिद्धांतों के सहारे भारतीय जीवन-दर्शन का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सका। यही हमारी पुरातन भारतीय सभ्यता का नियामक आधार रहे हैं। भारतीय जीवन-दर्शन की मान्यता है कि जीवन का अस्तित्व है, फिर वह शनैःशनैः विकसित होता है और अपने को अभिव्यक्त करता है तथा अंत में पूर्णता को प्राप्त करता है। यह चक्रीय प्रक्रम प्रकृति में सभी के जीवन की सामान्य विशेषता है।
भारतीय जीवन दृष्टि में योग, आध्यात्म और मानसिक शांति ही एक समग्र, संतुलित, समृद्ध और सुन्दर तथा सुखद जीवन के आधार है। शरीर और मन के बीच सम्यक् संतुलन के प्रमुख आधार ये ही है। स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ मन और स्वस्थ मन के लिए स्वस्थ शरीर आवश्यक है। जैसे मानव शरीर में हर संतुलन के लिए दो-दो आधार है। दो हाथ, दो पैर इत्यादि। इसी तरह मानसिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य की आधारभूत शर्त है। योग व आध्यात्म और मानसिक स्वास्थ्य की इस त्रिवेणी में प्रवाहमान जीवन की पूर्णता का प्रयास हमें एक समुचित, सार्थक और सम्यक् जीवन दृष्टि देने वाला हो सकता है। इसे समझना जरूरी है।
योग भारतीय सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है। योग, संयोग और सहयोग हमारे जीवन के तीन मुख्य पैरोकार है। योग का आशय युग्मन से है, चीजों को जोड़ने से है। खंड में अखंड का विराट दर्शन ही भारतीय-दर्शन का मूल है। संयोग भारतीय जनमानस के आस्थावादी जीवन दृष्टिकोण का आधार है तो सहयोग हमारी सामाजिक व्यवस्था का मूल है। जिस पर पूरा भारतीय सामाजिक जीवन टिका हुआ है। मनुष्य का अति-मानस योग से निर्मित होता है और समाज का आम-मानस संयोग से संचालित होता है तथा मानवता के विकास का मानस सहयोग से सृजित होता है। इसीलिए हम आध्यात्मिकता, लौकिकता और विश्व कल्याण में समान रूप से रत रहने वाले समाज रहे हैं। सर्वोत्तम योग सहयोग ही है क्योंकि यह समाज का आधार है। योग सहनशीलता, समाजशीलता और संयम के द्वारा शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक, बौद्धिक और नैतिक विकास की सामूहिक उपस्थिति माना गया है। योग व्यक्ति से लेकर समाज और सृष्टि तक सबको जोड़ता है। व्यक्ति का संस्कार, परिष्कार, समाजीकरण और एक सबल व सफल व्यक्तित्व का निर्माण योग विद्या ही करती है। समाज में संबंध-श्रृंखला हम सबको इसी योगाभ्यास से जोड़ती जाती है।
योग एक खास विद्या है जो मनुष्य के अन्तःकरण को इस योग्य बनाती कि वह उच्च स्फुरणों से अनुकूलन करता हुआ संसार में चारों ओर जो असीम संज्ञान व्यवहार हो रहा है, उनको बिना किसी की मदद के ग्रहण करें। योग शरीर, मन व आत्मा का अथवा आत्मा व परमात्मा का जुड़ना या मन-वचन-कर्म का जुड़ना ही है। भोग में लिप्त रहना दुनियावी भावों से जूझते रहना शरीर को बर्बाद करना है। बेवजह अनेक रोगों को आमंत्रण देना है। मनुष्य सुख-समृद्धि चाहता है, एक सुन्दर जीवन चाहता है ओैर अंततः जीवन में सफल होना चाहता है। जिसके लिए चाहत, इच्छा व अच्छे विचार परम आवश्यक हैं और अटूट लगन तथा मेहनत भी। जब यह क्रमबद्धता हमें बनाना आ जाए तो जीवन जीने की कला आ जाती है। तभी योग जिन्दगी को सुन्दर बनाने की एक विधि के रूप में हमारे काम आ पाता है। जब तक जीवन में शालीनता, उदारता, दयाभाव, करुणा, प्रेम, परोपकार, ईमानदारी, सच्चाई और अहिंसा के अंकुर नहीं फूटेगें, तब तक महानता दूर की कौड़ी ही रहेगी। योग प्रकृति के, आत्मा के, ईश्वर के गुणों को उत्पन्न करता है। मनुष्य को मानसिक तनाव से दूर रखता है। चिन्ता व भय से मुक्ति में मददगार बनता है। मनुष्य को ईर्ष्या, द्वेष, घृणा करने से बचाता है। योग की खूबसूरती यह है कि हमारे संपूर्ण व्यक्तित्व शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक पक्षों की देखरेख करता है, बराबर उनकी मरम्मत करता है। मानव शरीर के भाग लयबद्ध योग आसन द्वारा प्रशिक्षित व स्वस्थ किये जाते हैं तो मानसिक पहलुओं को ध्यान एवं प्राणायाम द्वारा। इन सबसे ऊपर है हमारी आध्यात्मिक आवश्यकताएं, जिसकी देखभाल और पूर्ति दिव्यता पर एकाग्रता के जरिए योग ही करता है।
मनुष्य पैदा ही योगी होता है। मानव का स्वभाव है योग। जुड़ना और जोड़ना जीवन का व्यवहार है, यही काम योग का है। योग व्यक्ति का व्यवहार संतुलित बनाता है। व्यवहार व्यक्ति के तनाव के स्तर से सीधे संबंधित है और तनाव हमारे मानसिक स्वास्थ्य से। योग हमारे अंदर कौशल विकास को बढ़ाता है। किसी विशेष परिस्थिति में दक्षता के साथ कार्य करना भी योग ही है। नवीनता, पूर्वाभास, कौशल और बेहतर संवाद यह सब योग के ही प्रतिफल हैं। समग्रता का सम्यक् प्रस्तुतीकरण योगाभ्यास है। शरीर, मन और भावनाओं को सार्वभौमिक ऊर्जा के साथ जोड़ने के अभ्यास की जीवन-कला जो समस्त तत्वों को विधिवत जोड़ दे, यही असली योग साधना है।
योग का अहम् योगदान यह है कि इससे व्यक्ति आध्यात्मिक बनता है। प्राचीन समय से ही योग हमारी जीवन शैली का अहम हिस्सा रहा है जो हमारे अंतःकरण को निर्मल और मजबूत बनाने में सहायक रहा है। जिस कारण हमारा आध्यात्मिक विकास तो हुआ ही, इससे हमारा भावनात्मक स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहा। जिसका लाभ हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ बने रहने में मिला।








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