गुवाहाटी। मनुष्य अपने विवेक के कारण संसार में समस्त जीवों में श्रेष्ठ माना जाता है। जो व्यक्ति अपने विवेक और बुद्धि के द्वारा समाज में अपनी प्रतिष्ठा कायम करने में सफल हो जाता है, उसे हम पुरुषोत्तम कहते है। यही बात श्री पुरुषोत्तम अजितसरिया पर लागू होती है। उनका जन्म गुवाहाटी में २० दिसम्बर १९४३ को हुवा था। उनके पिता स्वर्गीय कुंदंनमल अजितसरिया के एक समाज सेवी होने के नाते, उन्होंने भी अल्प आयु में ही समाज सेवा करनी शुरू कर दी थी। जब उनका विवाह १९ फ़रवरी 1965 को हुवा, तब उनकी उम्र २२ वर्ष की थी। उनकी जीवन संगिनी द्रौपदी देवी ने इस पचास वर्ष की खुशहाल वैवाहिक जीवन में हर समय उनका साथ दिया। चूँकि समाज सेवा के कार्यों में वे गहन रूप से जुड़े हुवे थे, अपनी पत्नी को समय कम देते थे। इसके बावजूद भी उनकी पत्नी ने उनका इस अब तक के सफ़र में भरपूर साथ दिया है। असम टेक्सटाइल मर्चेंट एसोसियेशन में सन १९५४ से जुड़े। चूँकि उनके पिता इस संस्था के संस्थापक अध्यक्ष थे, उन्होंने भी एसोसिएशन के कार्यों में गहन रूचि लेनी शुरू कर दी थी। बाद में उन्होंने गुवाहाटी में कांग्रेस के झालुकबाड़ी अधिवेशन में और बाद बाद में हुवे जवाहरनगर अधिवेशन में सक्रिय रूप से भाग लिया। १९६० सन में वे बद्रीदास हिंदी स्कूल से भी जुड़े। १९७४ से वे श्री हनुमान जयंती महोत्सव समिति जुड़े हुवे है, और तब से आज तक विभिन्न पदों पर भी वे बने रहे है। अपनी शारीरिक अस्वस्थता की वजह से बाद में ऊन्होने हनुमान जयंती का सक्रिय कार्य छोड़ दिया। मित्र परिषद् नमक संस्था के वे मुख्य संयोजक थे। यह वही संस्था है, जिसने गुवाहाटी के लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने में सफल रही है। इस संस्था का साप्ताहिक कीर्तन होता था, जिसके चलते गुवाहटी समाज के लोग एक छत के नीचे एकत्र होते थे, और करीब दो घंटे जम का कीर्तन करते थे, और कीर्तन के बाद विचार विर्मश करते थे। यह एक ऐसा दौर था, जब मारवाड़ी समाज एक नयी करवट ले रहा था, और मित्र परिषद् इस करवट का साक्षी था। वे आज भी मित्र परिषद् के अपने साथियों को याद करते है , जिनमे मुख्यत: रहे स्वर्गीय श्यामसुंदर गोयनका, स्वर्गीय बनवारीलाल पोद्दार, स्वर्गीय कशी कुंतल, आदि थे। मित्र परिषद् मात्र एक संस्था मात्र नहीं थी, उनके लिए मित्रता करने वाली संस्था थी। मारवाड़ी पंचायत और श्री अग्रवाल सेवा समिति, श्री भूतनाथ सेवा ट्रस्ट, श्री गौहाटी गोशाला, श्री मारवाड़ी दातव्य औषधालय जैसी बड़ी सामाजिक संस्थाओं से अभी तक वे सक्रियता से जुड़े हुवे है ।l भूतनाथ स्थित शिव मंदिर के निर्माण में उन्होंने एक अहम् भूमिका निभाई थी। अभी भी वे इस मंदिर की देख-रेख में अपना काफी समय देते है। श्री मारवाड़ी पंचायत का वस्तु भण्डार का कार्य उन्होंने गत २८ वर्षों तक संभाला है। पूर्वोत्तर मारवाड़ी सम्मेलन और श्री चुन्गाजान ट्रस्ट के आजीवन सदस्य है। उनके दौ पुत्र संजय और सुनील और एक पुत्री सीमा है। l उनकी जीवन संगिनी द्रौपदी देवी एक धर्म-परायण स्त्री है। l रोजाना नित्कर्म के पश्चात रोजाना करीब दौ घंटे का प्रभु स्मरण में जाता है। आडम्बर और पाखंड से दूर रह कर,एक सादा जीवन यापन करने का संकल्प के साथ उन्होंने अपने बच्चों को भी कर्म करते रहने की शिक्षा दी है। आध्यात्म और व्यवहार दोने के साथ सामंजस्य मिला कर चलने वाले इस महँ आत्मा ने अपने पुरे जीवन में सादगी को अपनाया। उनके गमन से समाज में एक महान व्यक्ति की क्षति हुई है।








कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें