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असम में गोरक्षा कानून से गोवंश तस्करी के बड़े कारोबार पर लगेगी रोक

 


गुवाहाटी। अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे असम में गोवंश तस्करी की समस्या लंबे समय से एक बड़े तबके की भावनाओं को चोट पहुंचा रही थी। अब तक की जितनी भी सरकारें बनीं किसी ने भी इस समस्या की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। गो तस्कर बेहद क्रूर तरीके से पशुओं को पड़ोसी देश बांग्लादेश में तस्करी करते रहे हैं। लेकिन, वर्तमान भाजपा नेतृत्वाधीन राज्य सरकार गो तस्करी के इस गोरखधंधे पर पूरी तरह से रोक लगाने की कोशिशों में जुट गयी है। इसके लिए आगामी विधानसभा के बजट सत्र में एक विधेयक पेश होने जा रहा है। इसकी तैयारी राज्य सरकार ने पूरी कर ली है। राज्य से होकर प्रति वर्ष अरबों रुपये की गोवंश तस्करी का धंधा जारी है। नये कानून के बन जाने से गोवंश तस्करी के बड़े कारोबार पर रोक लग जाएगी।


सात जुलाई को असम कैबिनेट की बैठक में असम गोरक्षा कानून को जल्द लागू करने के लिए विधानसभा में विधेयक पेश करने संबंधी अहम निर्णय लिया गया। राज्य सरकार के इस कदम से असम में लंबे समय से गोरक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों में खुशी की लहर देखी जा रही है।


उल्लेखनीय है कि असम में भारतीय गोवंश रक्षण संवर्धन परिषद की असम इकाई ने राज्य में गोवंश के संरक्षण के लिए पहल की। काफी समय तक इसको लेकर राज्य के लोगों को जागरूक करने के साथ ही समय-समय पर राज्य सरकार को इस बारे में अवगत कराया गया।


भारतीय गोवंश रक्षण संवर्धन परिषद के केंद्रीय मंत्री उमेश चंद्र पोरवाल ने हिन्दुस्थान समाचार को असम गोरक्षा कानून के संबंध बताया कि उनका संगठन भारतीय गोवंश के संरक्षण के लिए लंबे समय से काम कर रहा है। राज्य में पशुओं की हो रही बड़े पैमाने पर तस्करी की जानकारी मिलने पर इसको रोकने के लिए अनेक तरह से प्रयास किये गये जिसमें काफी सफलता भी मिली। लेकिन, इस पर स्थायी तौर पर रोक लगाने के लिए कानूनी प्रावधान की नितांत आवश्यकता थी। राज्य सरकार ने इसको लेकर जो पहल की है, वह स्वागत योग्य कदम है। इससे भारतीय गोवंश की सुरक्षा सुनिश्चित होगी।


उन्होंने बताया कि असम में भारतीय गोवंश रक्षण संवर्धन परिषद ने इसको लेकर पहल शुरू की तो अन्य गोवंश के संरक्षण में जुटी संस्थाएं भी आगे आईं जिसके बाद एक माहौल बना कि भारतीय गोवंश की सुरक्षा होनी चाहिए। उन्होंने बताया कि किस तरह से गोवंश का संरक्षण हो तथा स्थानीय गोवंश का कैसे विकास हो इसको लेकर परिषद की ओर से एक ज्ञापन तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को सौंपा गया था। पोरवाल का मानना है कि राज्य सरकार जो कानून बनाने जा रही है, उसमें परिषद की काफी बातों को संभवतः शामिल किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमने जो सुझाव सरकार को दिए हैं, उस पर सरकार कैसे अमल करती है, यह कानून बनने के बाद ही पता चल पाएगा।


उन्होंने बताया कि इस संबंध में राज्यपाल प्रो. जगदीश मुखी से भी परिषद का प्रतिनिधिमंडल दो बार मिलकर ज्ञापन सौंप चुका है। यही कारण है कि प्रो मुखी राज्य के सीमाई जिलों के अपने दौरे के दौरान गोवंश की तस्करी को लेकर चिंता जतायी थी। साथ ही पिछले दिनों नयी सरकार के शपथ ग्रहण के लिए आहूत विधानसभा सत्र में भी राज्यपाल ने गोवंश तस्करी को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी।


पोरवाल ने बताया कि हमने सरकार से मांग किया है कि स्थानीय गायों का वैज्ञानिक तरीके से विकास कर एक से पांच लीटर तक दूध देने लायक तैयार करने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि राज्य सरकार ने स्थानीय नस्ल को “लखी” गाय के रूप में संबोधित किया है। राज्य की सीमा को पूरी तरह से सील कर बाहरी राज्यों से आने वाले पशुओं पर पूरी तरह से रोक लगाने, तस्करी करने वालों के विरुद्ध कड़े दंड का प्रावधान करने समेत अन्य सुझाव राज्य सरकार को दिए गए हैं।


उन्होंने बताया कि गोवंश संरक्षण के लिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, कर्नाट, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू, झारखंड, उत्तराखण्ड,बिहार आदि राज्यों में कानून हैं। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत, कर्ज मुक्त किसान के लिए, रोजगार युक्त नौजवान के लिए गोवंश युक्त खेती को बढ़ावा देना होगा। उन्होंने कहा कि गोवंश के जरिए विभिन्न प्रकार के अनेक गो उत्पाद आज बनाए जा रहे हैं। सबसे बड़ा उत्पाद खाद है। आज महंगे रसायनिक खाद के प्रयोग खेती की उर्वरा शक्ति क्षीण होती जा रही है। ऐसे में गोवंश से मिलने वाले खाद से खेती की दशा एवं दिशा दोनों में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थ व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कही जाने वाली गोवंश के जरिए ग्रामीण विकास मार्ग प्रशस्त होगा। गोवंश के जरिए ही रोजगार युक्त नौजवान, दुग्ध युक्त भारत का निर्माण होगा।


असम से बांग्लादेश को लगने वाली अंतरराष्ट्रीय सीमा धुबरी, दक्षिण सालमारा-मानकचार, करीमगंज, कछार जिले की सीमाएं लगती हैं। जबकि पड़ोसी राज्य मेघालय की सीमा भी बांग्लादेश से लगती है। बांग्लादेश से लगने वाली ये सीमाएं नदी, मैदानी और पहाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरती है। तस्कर इसका फायदा उठाते हुए गोवंश की तस्करी करते हैं। सीमा पर बीएसएफ की कड़ी पहरेदारी होती है, बावजूद तस्कर अपने मंसूबों को अंजाम देने में जुटे रहते हैं।


उल्लेखनीय है कि असम में गोवंश को उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से लाया जाता है। असम तक पहुंचने से पहले कई राज्यों से होकर गोवंश को लेकर वाहन गुजरते हैं। इन राज्यों में तस्कर स्थानीय पुलिस प्रशासन को मैनेज कर पहुंच जाते हैं। गोवंश तस्करी के कारोबार के तार पूरे देश में फैला हुआ है। आए दिन सीमावर्ती इलाकों में बीएसएफ के जवान गोवंश को पकड़ते हैं। इसके बावजूद सीमा पर बसे गांव तस्करी के इस खेल के मुख्य सूत्रधार के रूप में सामने नजर आते हैं।


गोवंश को बांग्लादेश भेजने के लिए नावों, ट्रक, पैदल, कार, टेंपों के साथ ही जिन इलाकों में कंटीले बाड़ लगाये गये हैं वहां पर पशुओं के गर्दन में रस्सी बांधकर बेहद क्रूर तरीके से बाड़ को पार किया जाता है। इस आमनवीय कार्य को रोकने के लिए असम सरकार ने जो पहल की है, उसका गोवंश संरक्षण को लेकर राज्य में काम कर रही विभिन्न संस्थाओं ने स्वागत किया है।

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