रायपुर। जनजातीय बहुल जशपुर जिले की दिवाली में कई सांस्कृतिक परंपराएं यहां आज भी जिले के निवासी उसी आस्था और विश्वास के साथ मनाते हैं।जनजातीय समुदाय में दिवाली पर्व का विशेष महत्व है। इस दिन जिले में निवासरत बंजारा समाज के लोग पूजा अर्चना और दीप प्रज्जवलन के बाद घर-घर भ्रमण करते है और वर्ष भर में हुई किसी भी प्रकार की गलती के लिए एक दूसरे से माफी मांगते हैं।
वनों से अच्छादित जशपुर जिले के तीन राज्यों से लगे जशपुर में बंजारा समाज के लोग इस रात छोटे बड़ों का पैर छूकर आर्शीवाद लेते हैं और दुश्मनों से भी सारे गिले- शिकवे दूर कर लेते हैं। जनजातीय समाज लोग इस पर्व पर मुर्गे की बलि देते हैं। यह पूजा गोपनीय होती है और केवल परिवार के सदस्य ही शामिल होते हैं। जनजातीय समाज के द्वारा अपने गोत्र के अनुसार अलग-अलग रंग के मुर्गे की बलि देते हैं। मान्यता के अनुसार दीवाली के दूसरे दिन सुबह यह पूजा की जाती है। इस पूजा को सोहराई कहा जाता है। जनजातीय समाज के बजरंग राम नगेसिया ने बताया कि पूजा के क्रम में सबसे पहले मुर्गे की बलि चढ़ाई जाती है, फिर मवेशियों की पूजा करके महिलाओं के द्वारा उन्हें परीछा जाता है।
मवेशियों के लिए हड़िया शराब
दीवाली के दूसरे दिन जनजातीय समाज के लोग मवेशियों का श्रृंगार कर पूजा करते हैं तो विशेष पकवान के साथ उन्हें हड़िया शराब पिलाते हैं। इस दिन मवेशियों का उपयोग कृषि कार्य में नहीं किया जाता है। मवेशियों को शराब पिलाने से पहले शराब से ही मवेशियों के पैर धोए जाते हैं। मक्का, उड़द सहित अन्य विशेष भोजन दिए जाते हैं। मवेशियों को चढ़ाए गए पकवान से बचे भाग को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
दीवाली के एक दिन पूर्व से अरंडी का पत्ता घरों के छप्पर पर लगाया जाता है। मान्यता है कि घरों में इस पत्ते को लगाने पर जहां बुरी आत्माओ का प्रवेश घर पर नहीं होता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि इस पत्ते से रोग मुक्ति मिलती हैं।
अन्नपूर्णा देवी की पूजा
नगर के बालाजी मंदिर में दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट पूजा की जाती है। इस पूजा में अन्नपूर्णा देवी की पूजा कर धर्मावलंबी वर्ष भर घरों में अनाज के कमी नहीं होने की कामना करते हैं। मंदिरों के साथ कई घरों में भी इस पूजा को उत्साह के साथ किया जाता है। पं मनोज रमाकांत मिश्र ने बताया कि इस पूजा में नए अनाज से बने भोजन का भोग लगाया जाता है।
रात जलाए जाते हैं 11 दीप
दीपावली की देर रात गुप्त रूप से पूजा के बाद देर रात 11 दीप जलाए जाते हैं। मान्यता है कि इस रात माता लक्ष्मी भ्रमण के लिए निकलती हैं और 11 दीप देखकर प्रसन्न होती हैं। यह अनुष्ठान स्थाई धन प्राप्ति के लिए किया जाता है।
पितरों की पूजा
दीवाली के दूसरे दिन सुबह स्नान करके जलाशयों के पास गोबर की लड्डूनुमा प्रतिमा स्थापित कर उसमें सिक्का, दूब घास रखा जाता है। इसमें पानी तर्पण किया जाता है। यह तर्पण पितरों के नाम किया जाता है। इस दौरान कच्चे कपड़े में पूजा की जाती है और पुरुष वर्ग ही इसमें शामिल होते हैं। तर्पण के दौरान पूर्वजों का नाम लिया जाता है। महिलाएं घर में नए पात्र में मिष्ठान बनाती हैं। मिष्ठान सभी को प्रसाद बांटा जाता है। शाम के समय महिलांए गोर्वधन गीत गाते हुए घर-घर संपर्क कर दीप पर्व की शुभकामनाएं देती हैं। समाज में जिन पितरों के नाम याद हैं, उनके नाम से अलग-अलग दीप जलाने की प्रथा भी है।







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