मदन सिंघल
बाल अवस्था में ही जय भवानी कीर्तन मंडल का सक्रिय सदस्य तथा सबसे कम उम्र का बालकवि होने के कारण जहाँ प्रशंसा उत्साह मिलता था वही हमारे वरिष्ठ लोग मेरे सामने चुनौती वाले फिल्मी गीत पर भजन बनाने का दबाव बनाते थे। इस सत्संग से जहाँ मेरी पढाई में बाधा आती थी वहीँ तनाव भी रहता था कि क्या मैं नियत समय पर कर पांउगा तथा बाहर की मंडलियों के सामने एज इट इज गा पांउगा। खैर मैंने सैंकड़ों भजन फिल्मी तर्जो पर बनाये। उस समय मनुष्य को संदेश देने के लिए माया तथा काया पर ही जोर दिया जाता था। रामायण तथा श्रीमद्भागवत के प्रसंगों पर भी भजन बनाये। गजल कव्वाली गीत शादी के सेहरे बेटी की बिदाई तथा समयोचित काव्य रचना करता रहा लेकिन 1977 में असम में आने के बाद गोहाटी, जोरहाट, डिबरुगढ, तिनसुकिया, गोलाघाट, शिवसागर, बंगाइगांव, नगांव, शिलचर, करीमगंज, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा जाना पङता था इसलिए मैं काफी व्यस्तता के बावजूद होटलों, डाकखाना में जहाँ भी समय मिल गया लिखता रहता था। लेकिन कहीं भी भजन कीर्तन मंडली तथा साहित्य संस्था नहीं मिली जिससे मैं जुङ सकता था। काफी प्रयासों के बाद कीर्तन मंडल तथा साहित्य संस्था बनाने का अवसर मिला। इतना सब धनधाम छोड़ कर कहाँ सेठजी चल पङे, रोए सब परिवार तुम्हारा बच्चे बुड्ढे मचल पङे, यह बहुत ही सारगर्भित एवं मनन करने वाला भजन था।
जो मोहमाया में फंस कर अनैतिक रूप से कोङी कोङी जोड़ कर इतना धन संग्रह करने के बावजूद अपने परिवार को भी तरासता रहता है भला ऐसा व्यक्ति समाज एवं देश के लिए सोचेगा यह तो सोचना ही व्यर्थ है जैसे दुनिया में आया वैसे ही चला गया। ना किसी के काम आया ना दुखदर्द में कहीं शरीक हुआ। इतना संग्रह किया कि सात पिढियों का निक्कमा बना गया। यदि सत्संग के कार्यक्रम में जाता तो कुछ सीखने को मिलता लेकिन गया तो वहाँ भी कुछ लेने की जगह कुछ उल्टा पुल्टा कर आया।
साहित्य पढने से बहुत कुछ सीखने को मिलता है जो आधुनिक युग में इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। आजकल व्हाट्सएप पर भी कभी कभी ज्ञानवर्धक सामग्री एवं विडियो मिल जाते हैं उनके सुनने अथवा पढने से काफी कुछ सीखने को मिल सकता है।
मदन सिंघल पत्रकार एवं साहित्यकार
शिलचर असम








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