मदन सिंघल
भारत में बिमार व्यक्ति को देखने उनकी सहायता करने के लिए बहुत ही कम लोग सामने आते हैं।लेकिन मृत्यु के तुरंत बाद तीसरे दिन बैठक में तथा श्राद्ध के दिन हवाई जहाज एवं कारों से रैला लगने लगता है जो अनावश्यक है। दुख मे शामिल होने की परंपरा शदियों से चली आ रही है लेकिन दुःख की गहराई को भी समझना होगा कि अगले की माली हालत कैसी है क्या चार चार बार आने वाले अतिथि को रखने खाने पीने का प्रबंध करने में सक्षम है। लेकिन घीसीपिटी लकीरों पर चलने की हम सब की आदत बन गयी है। मृत्यु भोज का नाम सुनते ही पढा लिखा इंसान विचलित हो जाता है कि क्या मृत्यु के बाद भी सामूहिक भोज हो सकता हैं। लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधें??? खैर कोविद 2019 ने दो सालों में मनुष्य को इंसान बनने का अवसर दिया कि बङे हो अथवा छोटे गरीब अमीर पूंजीपति हो अथवा दिहाड़ी मजदूर सबके लिए अग्निपरीक्षा का एक जैसा समय आया। मनुष्य से मनुष्य को अलग कर दिया। दयनीय स्थिति तब आ गयी जब बिमार को देख नहीं सकते। मृत्यु के बाद कंधा देने वाला कोई नहीं तो मुखाग्नि की जगह बारी आने के बाद अनामी लोगों द्वारा अंतिम संस्कार अस्थि एवं भस्मी को लेना ही खतरनाक था। सकुन मिलता लोगों को कि हमारे प्रियजन का अंतिम संस्कार तो हो गया। अज्ञात लोगों के शवों को जलाने के समय अस्पताल अथवा किसी सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्था द्वारा विडियो बनाया जाता था। किसी तरह सामान्य रूप से सुविधा मिलने से कुछ श्राद्ध की लिपापोती की गई। जन्म मरण विवाह शादी सब हुए लेकिन लक्ष्मण रेखा निर्धारित थी कोई भी उपाय किसी के पास नहीं था क्योंकि कोराना महामारी का तांडव तो दुसरी तरफ सरकारी सख्त निर्देश के चलते चाहकर भी मनुष्य अपनी सिमित सुविधा मे सहन किया। क्या हम उसी मापदंड के अनुसार सामान्य जीवन नहीं जी सकते??? क्या हम विवाह शादी जन्म दिन सालगिरह पर अधिक ना सही कुछांस अपने समाज के लिए देश की खातिर खर्च नहीं कर सकते??? यह यक्ष प्रश्न उसी मनुष्य के सामने है लेकिन निर्णय उसका स्वयं का ही होना चाहिए क्योंकि यह उनके लिए एक प्रेरणा बना अथवा मजबूरी यह उन पर ही निर्भर है।
मदन सिंघल
पत्रकार एवं साहित्यकार
शिलचर असम








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