सिलचर से मदन सिंघल
ताजुब तब होता है जब बंद संस्थानों के पदाधिकारियों द्वारा संस्था का गुलदस्ता नेताओं को आला अधिकारियों को थमाने चले जाते हैं लेकिन संस्था के लिए कुछ नहीं करते.संस्थानों पर व्यक्तिगत अथवा परिवार द्वारा आधिपत्य स्थापित करना भी उचित नहीं.एक संस्था पर एक बार रहना पर्याप्त है यदि आप के अंदर चमत्कार अथवा करिश्मा करने की क्षमता होगी तो निवेदन के साथ आप ससम्मान कुर्सी पर सुसुशोभित हो सकतें है. लेकिन लोगो को भ्रमित करके, लोगों की इच्छा के विरुद्ध ऐसा करके बने तो कुर्सी विहिन समयोचित अधिकारी के कोप भाजन का शिकार बनने से कोई नहीं बचा सकता. भुगत भोगी अलग थलग पङे लोगों से पुछा जा सकता हैं लेकिन उनकी राय से ऐसी भूल ना करें., जब तक युवाओं एवं महिलाओं को समयानुसार उचित अवसर एवं स्थान नहीं मिलेगा तब तक समाज का उत्थान संभव नहीं. मैंने 24 साल पहले,, साहित्य मित्र,, संस्था अपने परिवार के किसी आत्मीय सदस्य की यादगार में बनाई वैसे ही आप भी बना सकते हैं उसमें सिर्फ परिवार के पदाधिकारियों के साथ समाज के अच्छे कार्यकर्ताओं को शामिल कर सकते हैं जो हम लगातार कर रहे हैं. हालांकि इस संस्था में पद की कोई जरूरत नहीं है लेकिन सरकारी कामों के लिए जरूरत पङती है . सालभर हम काफी काम करते हैं तथा बिना मांगे ही सहयोग लोग करते हैं.इस संस्था में सेवा को ही स्थान दिया गया जो आज भी जनता के सामने आन बान शान के साथ अपनी क्षमता एवं भक्ति के अनुसार सेवा रत है. धार्मिक एवं सामाजिक संस्थानों में सेवा करने के लिए योजना बनानी चाहिए . उन संस्थानों में सेवा के ही काम होने चाहिए ना कि लोग लुभावन सस्ती लोकप्रियता वाले प्रदर्शन. संस्थानों को लेखा जोखा सदस्य सूची शुरुआत से आज तक का रिकॉर्ड नगद एवं अपडेट पासबुक पंजीकरण संस्था के सभी दस्तावेज समान का स्टाक भी होना चाहिए लेकिन जब भी नयी कार्यकारिणी बनती है नया रजिस्टर बना लेते हैं उन्हें पिछले रिकॉर्ड से कुछ भी लेना देना नहीं होता. जो समाज अवसर दिया अथवा किसी तरह पा लिया उसका सम्मान करना चाहिए.जब समाज सम्मान दे सकता है तो छिनने में भी देर नहीं लगाता इसलिए पद की लालसा छोड़ कर समाजहित के लिए काम करने से सदैव याद रखें जायेंगे.
मदन सिंघल
पत्रकार एवं साहित्यकार
सिलचर, असम




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