गुवाहाटी: असम की धरा पर परम पूज्य गणिनी आर्यिका गुरु मां 105 विंध्यश्री माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में श्री श्री 1008 अभिनव कल्पद्रुम महामंडल विधान के अंतर्गत गुरु मां ने बताया कि जिस प्रकार नमक के बिना नमकीन बेकार होता है ,शक्कर के बिना मिठाई बेकार होती है, प्राण के बिना देह बेकार होती है, अतिथि के बिना घर आंगन बेकार होता है ,स्नेह के बिना परिवार संबंध बेकार होता है , पानी के बिना नदी बेकार होती है उसी प्रकार प्रभु भक्ति और गुरु भक्ति के बिना सारा जीवन बेकार होता है। आप सभी इस समय शरण में बैठकर प्रभु भक्ति करके अपने जीवन को कुंदन बना रहे हैं। प्रभु भक्ति किंकर से तीर्थंकर की यात्रा करा देती है, प्रभु भक्ति दानव से मानव बना देती है, प्रभु भक्ति पतित से पावन बना देती है , प्रभु भक्ति शव से शिव की यात्रा करा देती है , प्रभु भक्ति नर से नारायण बना देती है, प्रभु भक्ति कंस से परमहंस बना देती है। प्रभु भक्ति ऐसी नौका है इस में बैठने से अथाह प्राणी अथाह संसार से पार हो जाते हैं। भक्ति रूपी नीर का रसपान करके भक्त स्वत: ही आनंदित हो जाता है। प्रमुदित मन से भक्ति करने से जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल जाती है । आप जितने खुश होकर भक्ति करेंगे आपका जीवन उतना ही खुशमय और सुखमय हो जाएगा।
" श्रद्धा से देखो, हर चीज नजर आएगी ।
पत्थर के अंदर, प्रभु की तस्वीर नजर आएगी।
इससे पूर्व सुबह से बाहर से पधारे विद्वान पंडित कमलांकुर द्वारा संगीतमय पूजा अर्चना की गई। शाम को आरती के बाद विराग विंध्य कला मंच द्वारा जयपुर राजस्थान से आमंत्रित शांतनु नाटक मंडली के कलाकारों द्वारा आर्यिका विंध्यश्री माताजी के जीवन पर आधारित "गुड्डी अनिता बनी विंध्यश्री " नाटिका का मंचन किया गया। इस आशय की जानकारी प्रचार प्रसार संयोजक ओमप्रकाश सेठी व किशोर काला ने दी।







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