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वरिष्ठ समाजसेवी प्रभुदयाल जालान का निधन

गुवाहाटी। नगर के वरिष्ठ समाजसेवी प्रभु दयाल जालान का वृद्धावस्था जनित बीमारियों के चलते उनके गुवाहाटी आवास में निधन हो गया । उनकी अंतिम यात्रा शुक्रवार को दोपहर 11:00 बजे उनके फैंसी बाजार निवास भूतनाथ मुक्तिधाम के लिए निकलेगी। स्वर्गीय प्रभु दयाल जालान अपने पीछे दो पुत्र, तीन पुत्रियों को छोड़कर गए हैं। उन्होंने अपना जीवन समाज सेवा में ही व्यतीत कर दिया था।  गुवाहाटी गौशाला, मारवाड़ी हिंदी पुस्तकालय, मारवाड़ी सम्मेलन, मारवाड़ी पंचायत में वह काफी सक्रिय रहकर काम करते थे। इसके अलावा अन्य सामाजिक संस्था मारवाड़ी युवा मंच, मारवाड़ी सम्मेलन एवं कई धार्मिक समितियों में भी यह अपना निरंतर सहयोग देते रहते थे। यह मानव सेवा के साथ-साथ पशु सेवा में भी लीन रहते थे। लॉकडाउन के दौरान इनकी पशु सेवा कार्य की काफी सराहना भी हुई थी। असम साहित्य सभा से भी उनका काफी लगाव रहा था। उनके निधन से असम साहित्य सभा ने शोक संवेदना प्रकट की है। इसके अलावा मारवाड़ी सम्मेलन की गुवाहाटी शाखा और कामरूप शाखा ने भी शोक संवेदना प्रकट की है। श्री गुवाहाटी गोशाला, मारवाड़ी दाताब्य मारवाड़ी पुस्तकालय ने भी इनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए संवेदना प्रकट की।
 ब्रह्मपुत्र साहित्य सभा के अध्यक्ष किशोर जैन ने शोकाकुल होते हुए  कहा कि प्रभुदयाल जालान एक सज्जन, सरल, मित्तभाषी, मिलनसार, कर्मठ, सेवाभावी स्वभाव के अग्रणीय व्यक्ति थे। समाज के विभिन्न संस्थाओं में उन्होंने नि:स्वार्थ भावना से सक्रिय रहकर कार्य किया। सादा जीवन उच्च विचार की भावना से ओतप्रोत आदरणीय प्रभु जालान से अब कभी मुलाकात नहीं होगी सोचकर ही दिल भर आया। लेकिन उनके साथ हुई मुलाकातें, उनकी क्रियाशील गतिविधियां हमेशा मेरे मन में मौजूद रहेंगी। इसमें कोई शक नहीं की उनकी स्मृति हृदय में हमेशा बसी रहेगीं। लगभग २०१८ में हमने असम साहित्य सभा की तरफ से ब्रह्मपुत्र साहित्य सभा द्वारा बिहू के उपलक्ष में सम्मानित किया था। तब उन्होंने दुख भरी अवस्था में समाज के अंदर बढ़ रही विश्रृंखलता की और ध्यान दिलाते हुए दुख प्रकट किया था। धार्मिक आयोजनों में बढ़ते आडम्बरों को देखकर वे विचलित रहने लगे थे। शादी विवाह में भी हो रहे अपव्यय के लिए भी उनकी बातों में विवशता झलकती थी।
जमाना बदल चुका है इस बात को लेकर समाज में आ रहे परिवर्तनों को वे सहजता से स्वीकार नहीं कर पा‌ रहे थे। अपने आक्रोश को व्यक्त न कर पाना भी उनकी विवशता थी। समाज की संस्थाओं को जीवित रखने कि उन्होंने भरसक प्रयास किया। न जाने उन्होंने कितनी ही आलोचना सहन की होगी फिर भी अपने कर्तव्य पथ से डिगे नहीं। मानों कर्म ही धर्म हो। ऐसे व्यक्ति का चले जाना मन को विचलित करता है लेकिन नियति पर किसी का वस नहीं है।

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