गुवाहाटी। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य के निजी अस्पतालों के रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक ऐतिहासिक और सख्त चेतावनी जारी की है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राज्य में किसी भी मरीज को केवल आर्थिक तंगी के कारण इलाज से वंचित नहीं किया जा सकता। यदि कोई निजी अस्पताल इलाज से इनकार करता है और उस कारण मरीज की मृत्यु हो जाती है, तो उस अस्पताल के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत मुकदमा दर्ज किया जाएगा।
स्वास्थ्य को व्यापार नहीं, अधिकार समझें – मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री ने यह बयान असम में तेजी से बढ़ती उन घटनाओं की पृष्ठभूमि में दिया है, जिनमें निजी अस्पताल गंभीर या आपातकालीन स्थिति वाले मरीजों को पैसे की मांग के बिना इलाज देने से मना कर देते हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा,
> "यदि किसी गरीब की मौत इसलिए हो जाती है क्योंकि वह इलाज का खर्च नहीं उठा पाया, तो मैं खुद उस अस्पताल के खिलाफ हत्या का केस दर्ज करवाऊंगा। अस्पतालों को यह समझना होगा कि स्वास्थ्य सेवा व्यापार नहीं, जिम्मेदारी है।"
डॉ. सरमा ने कहा कि राज्य सरकार इस बात के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है कि हर नागरिक को बिना किसी भेदभाव के इलाज की सुविधा मिले, और स्वास्थ्य सेवाएं केवल संपन्न वर्ग तक सीमित न रहें।
आपातकाल में जान बचाना पहली प्राथमिकता
मुख्यमंत्री ने कहा कि सभी निजी अस्पतालों को निर्देश दिए जा रहे हैं कि किसी भी आपात स्थिति में मरीज का इलाज तुरंत शुरू किया जाए, चाहे मरीज के पास पैसा हो या नहीं। उन्होंने कहा,
> "सबसे पहले जान बचाना जरूरी है। इलाज के बाद भुगतान की प्रक्रिया देखी जा सकती है। लेकिन पैसे के अभाव में इलाज से इनकार करना अब असम में एक अपराध होगा।"
उन्होंने यह भी कहा कि अस्पतालों को नैतिक और संवेदनशील रवैया अपनाना होगा। किसी आत्महत्या के प्रयास के बाद अगर मरीज को लाया जाए और अस्पताल पैसे के बिना इलाज से इनकार कर दे, तो ऐसे मामलों में भी अस्पताल कानूनी दायरे से नहीं बच पाएंगे।
पंजीकरण रद्द और कानूनी कार्रवाई
मुख्यमंत्री सरमा ने कहा कि ऐसे अस्पतालों का पंजीकरण भी रद्द किया जाएगा जो इस आदेश का पालन नहीं करेंगे।
> "यह सरकार की जिम्मेदारी है कि हर नागरिक को उचित इलाज मिले, और इसके लिए अस्पतालों को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। जो अस्पताल इस नैतिकता को नहीं समझेंगे, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई तय है।"
राज्य सरकार लाएगी स्पष्ट नीति
मुख्यमंत्री ने संकेत दिया कि आने वाले दिनों में राज्य सरकार इस दिशा में एक स्पष्ट और कठोर नीति लेकर आएगी, ताकि निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय की जा सके। इस नीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी मरीज की जान केवल इसलिए न जाए कि वह इलाज का खर्च वहन नहीं कर सका।
राष्ट्रीय स्तर पर संदेश
मुख्यमंत्री सरमा का यह बयान न केवल असम, बल्कि पूरे देश के स्वास्थ्य तंत्र के लिए एक नैतिक और संवैधानिक संदेश है। यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य अब केवल सेवा नहीं, नागरिक अधिकार है, और इसके उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई होगी।
निष्कर्ष
डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा लिया गया यह निर्णय असम में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक संवेदनशील, उत्तरदायी और समावेशी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह कदम उन हजारों गरीब और असहाय मरीजों के लिए राहत की सांस है जो अक्सर इलाज से सिर्फ इसलिए वंचित रह जाते हैं क्योंकि वे अस्पताल की पहली शर्त – "पहले पैसे दो" – पूरी नहीं कर पाते।
यह सख्त लेकिन जरूरी चेतावनी भारत के हर राज्य में लागू होने योग्य है, जहाँ स्वास्थ्य को अभी भी वाणिज्यिक नजरिए से देखा जाता है। यदि अन्य राज्य भी इस पहल को अपनाते हैं, तो निश्चित ही देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में एक नई संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण विकसित होगा।




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