वास्तु शास्त्र के अनुसार किसी भी भवन का मुख्य प्रवेश द्वार केवल आने-जाने का मार्ग नहीं होता, बल्कि यह ऊर्जा के प्रवेश का मुख्य द्वार होता है। राजवल्लभ और 45 देवता जैसे ग्रंथों में इसे अत्यधिक महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि इसी मार्ग से सकारात्मक या नकारात्मक ऊर्जा घर में प्रवेश करती है।
शुभ दिशा में हो द्वार, तभी प्रवेश हो प्रगति का
राजवल्लभ ग्रंथ के अनुसार, किसी भी भवन में प्रवेश या निर्माण शुभ मुहूर्त और उचित दिशा में होना चाहिए। यदि मुख्य द्वार अशुभ दिशा में हो या गलत समय पर प्रवेश किया गया हो, तो घर में मानसिक अशांति, आर्थिक रुकावट और अस्थिरता बनी रह सकती है।
देवताओं के अनुसार निर्धारित होती है द्वार की गुणवत्ता
45 देवता ग्रंथ के अनुसार, वास्तु पुरुष मंडल को 45 भागों में विभाजित किया गया है और हर भाग पर एक विशेष देवता का अधिकार होता है। मुख्य द्वार यदि शुभ देवता की दिशा में हो तो घर में धन, शांति और अवसर आते हैं, वहीं अशुभ देवता की दिशा में हो, ने पर बाधाएं, रोग और विघ्न उत्पन्न हो सकते हैं।
टिक किए गए पद मुख्य प्रवेश द्वार के लिए उपयुक्त हैं।
मुख्य द्वार के लिए वास्तु सुझाव
● द्वार के सामने क्लटर, गंदगी या जूते-चप्पल न रखें। इससे ऊर्जा रुकती है।
● द्वार को हमेशा साफ, रोशन और सुगंधित रखें।
निष्कर्ष
वास्तु शास्त्र में मुख्य द्वार को घर की ‘प्रवेश ऊर्जा का द्वार’ माना गया है। सही दिशा, समय और स्थान का चयन करके ही घर में धन, स्वास्थ्य और सुख-शांति सुनिश्चित की जा सकती है। राजवल्लभ और 2–45 देवता ग्रंथ इस बात की पुष्टि करते हैं कि द्वार का स्थान ही तय करता है – आपके घर में किस देवता का प्रभाव रहेगा।
रिपोर्ट: देवकी नंदन देवड़ा
मो. 9377607101








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