गुवाहाटी। हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित 56वीं जीएसटी परिषद की बैठक में जीएसटी दर संरचना में किए गए बदलावों के बाद, कागज व्यापारियों और उद्योग जगत में गहरी चिंता फैल गई है। परिषद द्वारा 12% और 28% की दरों को हटाकर एक सरलीकृत त्रि-स्तरीय संरचना – 5%, 18% और 40% – लागू करने की घोषणा की गई है, जो 22 सितंबर 2025 से प्रभाव में आएगी।गुवाहाटी स्थित कागज व्यापारियों के एक प्रमुख संघ गुवाहाटी पेपर ट्रेडर्स एसोसिएशन ने इस निर्णय के विरोध में एक आधिकारिक ज्ञापन जारी किया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष अनिल सिंह ने कहा कि अध्याय 48 के अंतर्गत आने वाले कागज व कागजबोर्ड उत्पादों पर जीएसटी दर 12% से बढ़ाकर 18% कर देना उद्योग के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।व्यापारी संघ ने चेताया है कि इस निर्णय से शिक्षा क्षेत्र पर सीधा असर पड़ेगा, क्योंकि अनकोटेड लेखन और मुद्रण कागज की कीमतों में वृद्धि के चलते पाठ्यपुस्तकों की लागत 10-15% तक बढ़ सकती है। इसका बोझ सीधे तौर पर छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ेगा, जो पहले से ही शिक्षा की बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं।इसके अतिरिक्त, क्राफ्ट पेपर और कोटेड बोर्ड पर दर वृद्धि से पैकेजिंग क्षेत्र में भी लागत बढ़ेगी। नालीदार पैकेजिंग का व्यापक उपयोग फार्मास्यूटिकल, पैकेज्ड फूड और ई-कॉमर्स क्षेत्रों में होता है, जिससे इन उद्योगों में भी लागत दबाव बढ़ेगा।कागज व्यापारी समुदाय ने केंद्र सरकार और जीएसटी परिषद से अपील की है कि वे इस निर्णय पर पुनर्विचार करें और कागज से संबंधित बुनियादी इनपुट्स – विशेष रूप से बेस पेपर और पेपरबोर्ड – को फिर से 12% के स्लैब में लाया जाए। उनका तर्क है कि जबकि कुछ डाउनस्ट्रीम उत्पादों पर 5% या शून्य जीएसटी दर लागू रहेगी, इनपुट्स पर 18% टैक्स लगाने से इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर उत्पन्न होगा, जो छोटे व्यापारियों और निर्माताओं के लिए असमान और हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
जीएसटी दरों की नई संरचना को सरकार द्वारा कर प्रणाली के सरलीकरण के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इससे प्रभावित उद्योगों और व्यापारिक समुदायों ने इसके दुष्प्रभावों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है और क्या कागज उद्योग को किसी तरह की राहत दी जाती है।







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