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भूमि को सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित करने का वैदिक विज्ञान

  


प्राचीन ग्रंथों और वास्तु शास्त्र में भूमि को पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से आवेशित करने की विशेष विधियाँ बताई गई हैं। माना जाता है कि जिस भूमि पर घर, भवन या प्रतिष्ठान निर्मित होना है, वह पहले शुद्ध और ऊर्जावान की जाए तो वहां रहने वालों के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है।

भूमि की प्रारंभिक शुद्धि

 सबसे पहले भूखण्ड को पूरी तरह से साफ किया जाए। गंदगी, कांटे, खरपतवार और अनावश्यक वस्तुओं को हटा कर भूमि को समतल एवं सुखद बनाया जाए। यदि प्लॉट बड़ा है, तो उस हिस्से को विशेष रूप से तैयार करना चाहिए जिस पर निर्माण होना है।

गोवंश का महत्व

 शास्त्रों में कहा गया है कि गाय, बैल और बछड़े के पैरों से रौंदी हुई भूमि पवित्र हो जाती है। उनकी सांस की सुगंध, बैलों की ध्वनि और उनके जुगाली से निकलने वाले झाग भूमि को दिव्यता प्रदान करते हैं। भूमि पर गोबर से लीपाई, स्वच्छ जल से सिंचन और गौ-गंध का प्रभाव उसे और भी पवित्र बनाता है।

परंपरा के अनुसार, भूमि पर 7 दिन तक गाय, सांड और बछड़े को रखा जाए। उनके लिए उचित चारा, पानी और रहने की व्यवस्था हो। वे स्वतंत्र रूप से भूमि पर घूम सकें। इस प्रक्रिया से भूमि पर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। विकल्प रूप से, ग्वाला प्रतिदिन 3, 5 या 7 गायों को भूमि पर लाकर दिनभर रखे और शाम को वापस ले जाए।

पंचगव्य और पंचामृत से भूमि संस्कार

 भूमि की ऊर्जात्मक शुद्धि के लिए पंचगव्य, पंचामृत और सर्वौषधि का प्रयोग किया जाता है।

● पंचगव्य – गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर।

● पंचामृत – दूध, दही, घी, शहद और शक्कर।

● सर्वौषधि – वच, कूट, चंदन, जटामांसी, सौंठ, नागरमोथा, अंबा हल्दी और हल्दी।

इन सभी को स्वच्छ जल में मिलाकर भूमि पर छिड़काव किया जाता है। परंपरा यह भी है कि जल में सोना और रत्न डालकर रखा जाए और अगले दिन उस जल को भूमि पर छिड़का जाए।

100 वर्गफीट भूमि के लिए आवश्यक सामग्री

● पानी – 40 लीटर

● गोबर – 2 किलो

● गोमूत्र – 100 मिलीलीटर

● दूध – 100 मिलीलीटर

● दही – 50 ग्राम

● घी – 10 ग्राम

● शक्कर – 10 ग्राम

● शहद – 5 ग्राम

● सर्वौषधि पाउडर – 2 किलो

पवित्र मंत्रों का उच्चारण

 भूमि संस्कार के समय वेद मंत्रों और पुण्याहवाचन का विशेष महत्व है। यह भूमि को न केवल ऊर्जा प्रदान करता है बल्कि वातावरण को भी शुद्ध करता है।

निष्कर्ष

 आधुनिक युग में भले ही निर्माण प्रक्रिया तेज और तकनीकी हो गई हो, लेकिन प्राचीन परंपराओं का विज्ञान आज भी प्रासंगिक है। भूमि को पवित्र और ऊर्जावान बनाने की यह विधि न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि मानसिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी शुभकारी मानी जाती है।

🖋️ रिपोर्ट: देवकी नंदन देवड़ा

मो. 9377607101


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