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लखीमपुर की बेटी बिनिका महेश्वरी युद्ध के साये से निकलकर सकुशल घर लौटी, परिवार में खुशी का माहौल



लखीमपुर से राजेश राठी की रिपोर्ट 


लखीमपुर, अंतरराष्ट्रीय तनाव और युद्ध जैसे भयावह माहौल के बीच असम के लखीमपुर जिले की एक बेटी ने अद्भुत साहस और धैर्य का परिचय देते हुए मौत के साये से निकलकर अपने वतन भारत में सुरक्षित वापसी की है। लखीमपुर निवासी चंद्र प्रकाश माहेश्वरी एवं तारा माहेश्वरी की 31 वर्षीय पुत्री बिनिका महेश्वरी कतर की राजधानी दोहा से कठिन और जोखिम भरी यात्रा तय कर अंततः अपने माता-पिता के पास लखीमपुर सकुशल पहुंच गई हैं। उनकी सुरक्षित वापसी से परिवार, रिश्तेदारों और परिचितों में खुशी और राहत का माहौल व्याप्त है। प्राप्त जानकारी के अनुसार बिनिका महेश्वरी (31 वर्ष) अपने विवाह के उपरांत पिछले लगभग चार वर्षों से कतर में कार्यरत थीं। वह वहां यूडीसी नामक एक सरकारी निर्माण कंपनी के फाइनेंस विभाग में फाइनेंशियल एनालिस्ट के पद पर अपनी सेवाएं दे रही थीं। गत 28 फरवरी को क्षेत्र में युद्ध जैसे हालात बनने और लगातार मिसाइल हमलों की खबरों के बाद वहां रहने वाले लोगों के बीच भय और अनिश्चितता का वातावरण बन गया था। इन परिस्थितियों ने बिनिका को भी अंदर तक झकझोर दिया। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने साहस जुटाया और 9 मार्च को कतर से निकलने का निर्णय लिया। हवाई अड्डों को हुए नुकसान और उड़ानों के बाधित होने के कारण उनके पास सड़क मार्ग ही एकमात्र विकल्प बचा था। ऐसे में बिनिका अपने तीन साथियों के साथ एक वाहन किराए पर लेकर कतर से सऊदी अरब की राजधानी रियाद के लिए रवाना हुईं। यह लगभग सात घंटे का लंबा और अत्यंत जोखिम भरा सफर था, जिसे उन्होंने युद्ध के बीच आसमान में मंडराते खतरे और लगातार हो रही मिसाइल गतिविधियों के बीच पूरा किया। बताया जाता है कि कतर के आसपास के कई हवाई अड्डे हमलों से क्षतिग्रस्त हो चुके थे, जिससे हवाई मार्ग से निकलना लगभग असंभव हो गया था। इस यात्रा के दौरान उनके सामने एक और बड़ी चुनौती सऊदी अरब में प्रवेश के लिए वीजा प्राप्त करना था। सामान्यतः सऊदी अरब जाने के लिए पूर्व अनुमति स्वरूप वीजा आवश्यक होता है। बिनिका के अनुसार उस समय अन्य देशों के नागरिकों को वीजा अपेक्षाकृत जल्दी मिल रहा था, लेकिन भारतीय मूल के लोगों को वीजा मिलने में देरी हो रही थी। उनका वीजा प्रारंभ में सऊदी सरकार की ओर से रद्द भी कर दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार प्रयास करते हुए एक एजेंट के माध्यम से पुनः वीजा के लिए आवेदन किया। अंततः उन्हें वीजा मिल गया और उनके लिए आगे की राह खुल गई। रियाद पहुंचने के बाद उन्होंने हवाई यात्रा के माध्यम से भारत के लिए प्रस्थान किया। 10 मार्च को वह अपने अन्य साथियों के साथ नई दिल्ली पहुंचीं और वहां से आगे की यात्रा करते हुए असम के लखीमपुर स्थित अपने घर पहुंचकर आखिरकार राहत की सांस ली। कई दिनों तक भय और अनिश्चितता के बीच गुजारने के बाद जब वह अपने माता-पिता के आंगन में पहुंचीं तो परिवार की आंखों में खुशी और भावुकता दोनों साफ दिखाई दे रहे थे। अपने अनुभव साझा करते हुए बिनिका ने बताया कि कतर में स्थित भारतीय दूतावास से जिस स्तर के सहयोग की उम्मीद वहां रह रहे भारतीय कर रहे थे, वैसा सहयोग सभी को नहीं मिल पा रहा था। इसके बावजूद वहां फंसे भारतीयों का भरोसा अपने देश और सरकार पर अटूट है। उन्होंने कहा कि कतर में रह रहे भारतीयों को विश्वास है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार हर भारतीय को सुरक्षित अपने वतन वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। उल्लेखनीय है कि बिनिका के पति गौरव डागा अभी भी दुबई में इस संकट के कारण फंसे हुए हैं और भारत लौटने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। गौरव दुबई में कॉर्पोरेट क्षेत्र की एक कंपनी में कार्यरत हैं। परिवार को उम्मीद है कि वह भी जल्द ही सुरक्षित भारत लौट आएंगे। बहरहाल, युद्ध और भय के बीच से निकलकर लखीमपुर की इस बेटी की सुरक्षित घर वापसी पूरे क्षेत्र के लिए राहत और गर्व का विषय बन गई है। बिनिका का साहस यह दर्शाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी हिम्मत, धैर्य और दृढ़ संकल्प इंसान को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचा सकता है।

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