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वास्तु की शुरुआत घर के अंदर नहीं, ज़मीन के चुनाव से होती है



आजकल जब भी वास्तु की बात होती है, तो ज़्यादातर लोग फर्नीचर बदलने, शीशा इधर-उधर करने या छोटे-छोटे उपायों में लग जाते हैं। लेकिन वास्तु शास्त्र के मूल ग्रंथों में सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण भूमि या स्थल का चयन बताया गया है। यदि यही आधार गलत हो जाए, तो बाद में किए गए सुधार सीमित प्रभाव ही दे पाते हैं।

वास्तु शास्त्र स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी निर्माण का पहला तत्व “भूमि” है और उसी पर पूरा परिणाम निर्भर करता है । इसलिए घर लेने से पहले या प्लॉट चुनते समय कुछ मूल नियमों को समझना आवश्यक है।


प्लॉट का संरेखण (Directional Alignment)

वास्तु शास्त्र में बताया गया है कि प्लॉट का ज्यामितीय अक्ष (geometrical axis) पृथ्वी के चुंबकीय अक्ष (magnetic axis) के साथ मेल खाना चाहिए। इसे समझने का सबसे आसान तरीका है — X और Y axis।



मान लीजिए:

● एक सीधी खड़ी रेखा (Vertical line) = उत्तर–दक्षिण दिशा (North–South) → इसे आप Y-axis समझें

● एक सीधी आड़ी रेखा (Horizontal line) = पूर्व–पश्चिम दिशा (East–West) → इसे आप X-axis समझें

अब एक आदर्श प्लॉट में:

● प्लॉट की दो सीमाएं (boundaries) Y-axis के समानांतर होंगी → यानी उत्तर–दक्षिण में सीधी

● और बाकी दो सीमाएं X-axis के समानांतर होंगी → यानी पूर्व–पश्चिम में सीधी

यही स्थिति वास्तु के अनुसार संतुलित मानी गई है।

● जब प्लॉट इन दोनों axis के साथ सीधा बैठता है →

 ऊर्जा का प्रवाह भी सीधा और व्यवस्थित रहता है

● जब प्लॉट इन axis से तिरछा हो जाता है →

 ऊर्जा का प्रवाह दिशा बदलता है और असंतुलित हो सकता है

इसीलिए ग्रंथों में यह बताया गया है कि प्लॉट की सीमाएं उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम के समानांतर होना चाहिए

 

ज़मीन का ढलान (Slope)

वास्तु में ज़मीन का ढलान बहुत महत्वपूर्ण माना गया है, जिसे लोग अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।

ग्रंथों के अनुसार आदर्श स्थिति यह है:

● दक्षिण और पश्चिम भाग ऊँचा (higher) होना चाहिए

● उत्तर और पूर्व भाग नीचा (lower) होना चाहिए

इसका कारण यह बताया गया है कि इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह सही दिशा में होता है और जीवन में संतुलन बना रहता है।

ग्रंथों के अनुसार भूमि के ढलान के परिणाम

वास्तु ग्रंथों में बताया गया है कि भूमि का ऊँचा-नीचा होना जीवन के विभिन्न पक्षों को प्रभावित करता है

1. उत्तर या पूर्व दिशा ऊँची हो

● धन की हानि होती है

● पुत्र या संतान की उन्नति प्रभावित हो सकती है

2. दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) दिशा नीची हो

● आर्थिक नुकसान

● स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ

● अग्नि से संबंधित कष्ट

3. दक्षिण दिशा नीची हो

● बीमारी

● आयु में कमी (कमज़ोरी और अस्थिरता का संकेत)

4. दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) दिशा नीची हो

● चोरी या अनचाहे खर्च

● बीमारी

● जीवन में अस्थिरता

5. पश्चिम दिशा नीची हो

● दुख और असंतोष

● आर्थिक नुकसान

● बदनामी या पारिवारिक समस्याएँ

● पुत्र के स्वास्थ्य या विकास पर प्रभाव

6. उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा नीची हो

● मानसिक अशांति

● अस्थिर मनस्थिति

7. भूमि का मध्य भाग नीचा हो

● जीवन में विभिन्न प्रकार की परेशानियाँ


क्यों ज़रूरी है यह समझना?

वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर सिर्फ दीवारों का ढांचा नहीं है, बल्कि एक ऊर्जा-प्रणाली (energy system) है।

और इस ऊर्जा का सबसे पहला स्रोत है — भूमि।

समरांगण सूत्रधार में भी कहा गया है कि व्यक्ति को ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जिसमें “शुभ लक्षण” हों, क्योंकि वही सुख, धन और समृद्धि का कारण बनते हैं ।

घर या प्लॉट लेते समय इन 3 चीजों को ज़रूर देखें:

● प्लॉट सीधा है या तिरछा?

● रोड किस दिशा में है?

● ज़मीन का ढलान किस तरफ जा रहा है?

अगर ये तीनों चीजें सही हैं, तो आप आधा वास्तु पहले ही सही कर चुके हैं।


निष्कर्ष

वास्तु एक विज्ञान की तरह काम करता है, जहाँ नींव (foundation) सबसे महत्वपूर्ण होती है।

अगर जमीन सही है, तो घर अपने आप सही दिशा में काम करता है।

और अगर जमीन ही गलत है, तो अंदर किए गए बदलाव सिर्फ अस्थायी राहत देते हैं।

इसलिए अगली बार जब आप घर खरीदने जाएं, तो सबसे पहले यह याद रखें:

“वास्तु की शुरुआत ज़मीन से होती है।”


रिपोर्ट: देवकी नंदन देवड़ा

मो. 9377607101


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