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लखीमपुर में गूंजी धर्म, भक्ति और सनातन चेतना की अमृतधारा

 


राजेश राठी और ओमप्रकाश तिवारी की रिपोर्ट


परम पूज्य स्वामी श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य जी महाराज के दिव्य प्रवचन से भक्त हुए भावविभोर


लखीमपुर, सोमवती अमावस्या एवं पुरुषोत्तम मास के पावन संयोग पर स्थानीय श्री श्री सीतारामजी ठाकुरवाड़ी मंदिर परिसर आध्यात्म, भक्ति और सनातन संस्कृति की दिव्य ऊर्जा से आलोकित हो उठा। श्री श्री सीतारामजी ठाकुरवाड़ी समिति के तत्वावधान में आयोजित विशाल धार्मिक सभा में अनन्त श्रीविभूषित, श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य, श्रीमलूकपीठाधीश्वर एवं श्रीअग्रपीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य जी महाराज ने अपने ओजस्वी एवं प्रेरणादायी प्रवचन से श्रद्धालुओं को धर्म, सेवा और सनातन जीवन मूल्यों का संदेश दिया।


मंदिर परिसर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। “जय श्रीराम”, “राधे-राधे” और हरिनाम संकीर्तन के जयघोष से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। कार्यक्रम का शुभारंभ पूज्य स्वामी शुद्धानंद जी महाराज के मंगलमय आशीर्वचनों से हुआ। उन्होंने श्रीमद्भागवत के संदर्भ में कहा कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप ईश्वर से जुड़ा हुआ है और जीवन में आने वाली कठिनाइयों से घबराने के बजाय उनका साहसपूर्वक सामना करना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने संघर्ष को सफलता का मूल मंत्र बताया।


इसके उपरांत परम पूज्य स्वामी श्री राजेन्द्र दास देवाचार्य जी महाराज ने हरिनाम संकीर्तन के माध्यम से भक्तों को भक्ति-रस में सराबोर करते हुए अपने दिव्य उद्बोधन में सनातन धर्म, मानव सेवा, गौ-संरक्षण, ज्योतिषीय एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा आध्यात्मिक जीवन की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि लगभग डेढ़ सौ वर्ष से अधिक प्राचीन श्री श्री सीतारामजी ठाकुरवाड़ी मंदिर में विराजमान प्रभु श्रीराम-जानकी तथा पावन पीपल और वट वृक्ष के दर्शन कर वे स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली अनुभव कर रहे हैं।


महाराजश्री ने कहा कि जीवन की अनुकूल और प्रतिकूल दोनों परिस्थितियों में ईश्वर का स्मरण मनुष्य को मानसिक, आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति प्रदान करता है। उन्होंने पुरुषोत्तम मास की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि इस अवधि में किए गए दान, तप, जप और सेवा के कार्य अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से स्थानीय देवालयों में जाकर पूजा-अर्चना करने तथा धर्म और भक्ति के मार्ग पर चलने का आह्वान किया।


अपने प्रवचन में उन्होंने सूर्य और चंद्रमा की उपासना के महत्व को शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि चंद्रमा का मानव जीवन, स्वास्थ्य और प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। योगशास्त्र के संदर्भ में उन्होंने चंद्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी के महत्व का भी उल्लेख किया तथा संतुलित जीवन शैली अपनाने का संदेश दिया।


सनातन सामाजिक व्यवस्था की व्याख्या करते हुए महाराजश्री ने कहा कि धर्म और ज्ञान समाज की आधारशिला हैं। उन्होंने गौमाता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए महाभारत एवं शास्त्रों के अनेक प्रसंगों का उल्लेख किया और कहा कि गोसेवा एवं गोदान भारतीय संस्कृति की महान परंपराएं हैं। उन्होंने कहा कि गौमाता सम्पूर्ण हिन्दू समाज को एक सूत्र में जोड़ने की क्षमता रखती हैं।


मानव सेवा को सर्वोच्च धर्म बताते हुए उन्होंने कहा कि निस्वार्थ भाव से पीड़ित मानवता की सेवा ही सच्ची ईश्वर भक्ति है। सेवा, करुणा और परोपकार मनुष्य को परमात्मा के निकट ले जाने का सबसे श्रेष्ठ माध्यम हैं।


कार्यक्रम के दौरान ठाकुरवाड़ी समिति ने असम की गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप परम पूज्य महाराजश्री का असमिया फुलाम गमछा, सेलेंग चादर, हूपुरा एवं पारंपरिक जापी भेंट कर भव्य अभिनंदन किया। उनके साथ पधारे संत-महात्माओं का भी सम्मान किया गया। विभिन्न सामाजिक संगठनों, गणमान्य नागरिकों एवं बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभाव से संत समाज का अभिनंदन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।


पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर रहा। श्रद्धालुओं ने इसे अपने जीवन का अविस्मरणीय और सौभाग्यपूर्ण अवसर बताते हुए धर्म, सेवा और सनातन संस्कृति के प्रति अपनी आस्था को और अधिक सुदृढ़ करने का संकल्प व्यक्त किया।

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