आवारा पशुओं के प्रबंधन, उपचार और निस्तारण को लेकर उठे गंभीर सवाल
लखीमपुर से राजेश राठी की रिपोर्ट
लखीमपुर, लखीमपुर की एक सड़क पर घायल अवस्था में पड़ी एक गाय शायद यह नहीं जानती थी कि उसकी पीड़ा और मृत्यु स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था के अनेक ऐसे प्रश्नों को उजागर कर देगी, जिनका उत्तर वर्षों से अनुत्तरित है। वह एक साधारण आवारा गाय थी, लेकिन उसकी मौत ने पशु कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़े उन मुद्दों को सामने ला खड़ा किया है, जिन पर अब गंभीर चिंतन और ठोस कार्रवाई की आवश्यकता महसूस की जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार लगभग चार-पांच दिन पूर्व यह गाय एक सड़क दुर्घटना का शिकार हुई थी। घायल अवस्था में वह सड़क किनारे पड़ी रही, लेकिन उसके उपचार के लिए कोई सरकारी तंत्र सक्रिय होता दिखाई नहीं दिया। अंततः गोपीनगरी कॉलोनी स्थित "आश्रय केयर एंड वेलफेयर फाउंडेशन (पशुपति जीव आश्रय)" के स्वयंसेवकों ने मानवीय संवेदनाओं का परिचय देते हुए उसे अपने आश्रय स्थल पर ले गए और उपचार प्रारंभ कराया। कई दिनों तक संघर्ष चलता रहा, लेकिन जीवन और मृत्यु की इस लड़ाई में अंततः गाय हार गई। आज गाय की मृत्यु के बाद संस्था ने तत्काल उत्तर लखीमपुर नगर पालिका बोर्ड के कार्यपालक अधिकारी, अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष को इसकी सूचना दी। अपेक्षा थी कि संबंधित विभाग तत्काल सक्रिय होगा और मृत पशु के वैज्ञानिक एवं सुरक्षित निस्तारण की व्यवस्था करेगा। लेकिन घंटों दर घंटों बीत गए, फिर दिन ढल गया, और मृत गाय का शव वहीं पड़ा रहा। धीरे-धीरे दुर्गंध फैलने लगी। आश्रय स्थल में मौजूद अन्य घायल और उपचाराधीन पशुओं पर संक्रमण का खतरा मंडराने लगा। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह था कि आखिर उस मृत गाय को दफनाया कहां जाए? यह प्रश्न केवल एक संस्था का नहीं था। यह प्रश्न पूरे प्रशासनिक ढांचे से था। आखिर सड़कों पर घूम रहे आवारा पशुओं की जिम्मेदारी किसकी है? जब कोई पशु दुर्घटना का शिकार होता है तो उसके उपचार की व्यवस्था कौन करेगा? यदि उसकी मृत्यु हो जाती है तो उसके सम्मानजनक और सुरक्षित निस्तारण का दायित्व किस विभाग पर है? और यदि जिम्मेदार विभाग मौजूद हैं, तो वे अपने दायित्वों का निर्वहन कितनी गंभीरता से कर रहे हैं? नगर पालिका बोर्ड के कार्यपालक अधिकारी ने अपने जवाब में स्वीकार किया कि सड़कों पर मृत पाए जाने वाले आवारा पशुओं के निस्तारण की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय की होती है। उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान में नगर पालिका के पास कोई अधिकृत डंपिंग ग्राउंड उपलब्ध नहीं है और विभाग के द्वारा मृत पशुओं के निस्तारण के लिए निजी सफाईकर्मियों की सेवाएं ली जाती हैं। यहीं से कई नए प्रश्न जन्म लेते हैं। यदि नगर पालिका के पास वर्तमान में कोई डंपिंग ग्राउंड नहीं है, तो उनके द्वारा मृत पशुओं का निस्तारण कहां पर और किस प्रकार से किया जा रहा है? क्या इसके लिए कोई अधिकृत स्थल निर्धारित है? अगर है, तो क्या उस स्थल के लिए पर्यावरणीय स्वीकृतियां प्राप्त हैं? क्या निजी सफाईकर्मी जो मृत पशुओं का निस्तारण करते हैं क्या वो निर्धारित स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों का पालन करते हैं? यदि नहीं, तो इससे होने वाले पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी दुष्परिणामों की जिम्मेदारी कौन लेगा? ये प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष या संस्था विशेष के विरुद्ध नहीं हैं। ये प्रश्न उस व्यवस्था से हैं जो नागरिकों से कर वसूलती है और बदले में सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा पशु प्रबंधन जैसी मूलभूत सेवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी निभाती है। मामले का एक और महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि "आश्रय केयर एंड वेलफेयर फाउंडेशन" पिछले कई वर्षों से बिना किसी सरकारी आर्थिक सहायता के सड़क दुर्घटनाओं में घायल, परित्यक्त और बेसहारा पशुओं का उपचार कर रहा है। संस्था के अनुसार सैकड़ों पशुओं को अब तक बचाया जा चुका है। केवल एक दिन पहले ही एक अन्य दुर्घटनाग्रस्त गाय के पैर में शल्य चिकित्सा कर धातु की प्लेट लगवाई गई थी। प्रश्न यह है कि जब स्वयंसेवकों का एक छोटा समूह सीमित संसाधनों के बावजूद यह जिम्मेदारी निभा सकता है, तो कानूनी अधिकारों और सरकारी संसाधनों से लैस संस्थाएं क्यों नहीं? प्राप्त जानकारी के अनुसार इस संदर्भ में स्पष्ट रूप से कानून भी "कैटल ट्रेसपास एक्ट, 1871" कांजी हाउसों की स्थापना का प्रावधान करता है। वहीं संविधान का अनुच्छेद 243W और बारहवीं अनुसूची स्थानीय निकायों को आवारा पशुओं और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर जिम्मेदारी सौंपती है। ऐसे में यह जानना जनता का अधिकार है कि लखीमपुर में अधिकृत कांजी हाउस कहां पर है, उसका संचालन कौन कर रहा है, और यदि ऐसी कोई व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है तो उसकी अनुपस्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? सबसे दुखद विडंबना यह है कि हम गाय को "गौ माता" कहकर सम्मान देते हैं, गौ संरक्षण की बड़ी बड़ी बातें करते हैं, धार्मिक आयोजनों में गौ सेवा का महत्त्व बताते हैं, लेकिन जब वही गाय सड़क पर घायल होकर तड़पती है या उपचार के अभाव में दम तोड़ देती है, तब उसकी जिम्मेदारी लेने वाला शायद ही कोई दिखाई देता है। उस समय नारे नहीं, व्यवस्था की आवश्यकता होती है; घोषणाएं नहीं, कार्रवाई की जरूरत होती है। ज्ञात रहे कि यह केवल पशु कल्याण का विषय नहीं है। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य का प्रश्न है। यह पर्यावरण संरक्षण का प्रश्न है। यह प्रशासनिक उत्तरदायित्व का प्रश्न है। और सबसे बढ़कर यह हमारी सामूहिक संवेदनशीलता की परीक्षा है। लखीमपुर की इस एक मृत गाय ने कई ऐसे प्रश्न छोड़ दिए हैं जिनका उत्तर प्रशासन को देना ही होगा। क्योंकि यदि आज इन प्रश्नों की अनदेखी की गई, तो कल किसी अन्य सड़क पर कोई और पशु इसी पीड़ा का शिकार होगा, और तब जिम्मेदारी तय करना और भी कठिन हो जाएगा। समय आ गया है कि आवारा पशुओं के उपचार, पुनर्वास, संरक्षण और मृत्यु के बाद वैज्ञानिक निस्तारण के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी और स्थायी व्यवस्था विकसित की जाए। अन्यथा हर नई दुर्घटना के साथ यही प्रश्न फिर उठेंगे—क्या हमारी व्यवस्था केवल कागजों पर मौजूद है, या वास्तव में जीवित प्राणियों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए भी तैयार है?








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