करोड़ों की स्वास्थ्य योजनाओं के बीच मृतकों की गरिमा पर सवाल, परिजनों की पीड़ा और प्रशासनिक लापरवाही पर उठी उंगलियां
लखीमपुर से राजेश राठी और ओमप्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट
लखीमपुर, एक ओर सरकार प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को आधुनिक और सुदृढ़ बनाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की भव्य इमारतें खड़ी करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर लखीमपुर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का मुर्दाघर (मॉर्च्युरी) स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता दिखाई दे रहा है। विडंबना यह है कि जिस स्थान पर मृतकों के शवों को सम्मानपूर्वक और सुरक्षित रखा जाना चाहिए, वहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव देखने को मिल रहा है। ऐसी स्थिति न केवल स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं और मृतकों की गरिमा के प्रति प्रशासनिक उदासीनता का भी प्रतीक बनती जा रही है। स्थानीय लोगों, अस्पताल आने वाले परिजनों तथा कई सामाजिक संगठनों का आरोप है कि मेडिकल कॉलेज परिसर में स्थित मुर्दाघर की हालत अत्यंत दयनीय और जर्जर बनी हुई है। यहां पर्याप्त प्रकाश व्यवस्था तक उपलब्ध नहीं है, जिससे रात के समय आने वाले परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कई स्थानों पर साफ-सफाई की स्थिति चिंताजनक बताई जा रही है, जबकि शवों के संरक्षण के लिए अपेक्षित आधुनिक सुविधाओं की कमी स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है। लोगों का कहना है कि जहां इंसान की अंतिम यात्रा की औपचारिकताएं पूरी होती हैं, वहां कम से कम स्वच्छ वातावरण, सम्मानजनक व्यवस्था और आवश्यक तकनीकी सुविधाएं होना अत्यंत आवश्यक है, किंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत दिखाई देती है। गौरतलब है कि पुलिस द्वारा बरामद किए गए लावारिस शवों को पहचान और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने तक सामान्यतः 72 घंटे अथवा उससे अधिक समय तक मुर्दाघर में रखा जाता है। इसके अलावा सड़क दुर्घटनाओं, अप्राकृतिक मौतों तथा अन्य आपराधिक मामलों में मृत व्यक्तियों के शव भी पोस्टमार्टम के लिए यहीं लाए जाते हैं। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि मुर्दाघर की स्थिति इतनी बदहाल है, तो वहां शवों का वैज्ञानिक संरक्षण और सम्मानजनक रखरखाव आखिर किस प्रकार किया जाता होगा। क्या करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित मेडिकल कॉलेज में मृतकों के लिए गरिमापूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करना प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी आधुनिक मेडिकल कॉलेज या अस्पताल के मुर्दाघर में अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज प्रणाली, निर्बाध विद्युत आपूर्ति, समुचित प्रकाश व्यवस्था, स्वच्छ एवं कीटाणुरहित वातावरण, आधुनिक पोस्टमार्टम उपकरण, परिजनों के बैठने की समुचित व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था होना अनिवार्य माना जाता है। इन सुविधाओं का उद्देश्य केवल शवों का संरक्षण भर नहीं, बल्कि मृतकों के प्रति सम्मान और उनके परिजनों को कठिन समय में न्यूनतम मानवीय सहूलियत प्रदान करना भी होता है। हाल के दिनों में जिले में हुई कई सड़क दुर्घटनाओं और अन्य घटनाओं के बाद बड़ी संख्या में शव इसी मुर्दाघर में पोस्टमार्टम के लिए लाए गए। ऐसे संवेदनशील क्षणों में अपने प्रियजनों को खो चुके परिवार पहले ही गहरे मानसिक आघात से गुजर रहे होते हैं, ऊपर से यदि उन्हें अव्यवस्था, अंधेरे, गंदगी और असुविधाओं का सामना करना पड़े तो यह पीड़ा और अधिक असहनीय बन जाती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यह केवल एक भवन की समस्या नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना है। लोगों का आरोप है कि यदि स्वास्थ्य विभाग केवल बड़ी इमारतों और घोषणाओं तक सीमित रह जाए, जबकि जमीनी स्तर पर बुनियादी व्यवस्थाएं ही चरमराई रहें, तो ऐसी विकास योजनाओं की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। मेडिकल कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में यदि मृतकों के लिए सम्मानजनक और सुविधायुक्त मुर्दाघर तक उपलब्ध नहीं है, तो यह स्वास्थ्य प्रशासन के लिए किसी तमाचे से कम नहीं माना जाएगा। आखिर जिस व्यवस्था का उद्देश्य जीवन बचाना और मानवीय गरिमा की रक्षा करना हो, वहां मृत्यु के बाद भी सम्मान सुनिश्चित क्यों नहीं हो पा रहा है? स्थानीय नागरिकों और विभिन्न वर्गों के लोगों ने राज्य सरकार तथा स्वास्थ्य विभाग से मांग की है कि लखीमपुर मेडिकल कॉलेज के मुर्दाघर का तत्काल निरीक्षण कर उसकी वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाए और अविलंब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू की जाए। लोगों का स्पष्ट कहना है कि इंसान की गरिमा केवल जीवन तक सीमित नहीं होती, बल्कि मृत्यु के बाद भी उसका सम्मान बनाए रखना एक सभ्य समाज और संवेदनशील प्रशासन की पहली जिम्मेदारी है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग इस गंभीर मुद्दे को कितनी गंभीरता से लेता है और बदहाल मुर्दाघर की स्थिति सुधारने के लिए कब तक ठोस कदम उठाए जाते हैं।








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