कथा वाचक सुश्री मोनिका पारीक की अमृतमयी वाणी सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु, देर रात तक गूंजता रहा “राधे-राधे” और “जय श्रीकृष्ण”
लखीमपुर से राजेश राठी और ओमप्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट
लखीमपुर, स्थानीय श्री श्री सीतारामजी ठाकुरवाड़ी मंदिर प्रांगण में शुक्रवार से चार दिवसीय अमृतमयी श्रीकृष्ण कथा एवं धार्मिक अनुष्ठान का भव्य शुभारंभ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लासपूर्ण वातावरण के बीच हुआ। आयोजन के प्रथम दिन सुबह से ही नगर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति, भक्ति संगीत, जयघोष, मंगल गीतों एवं धार्मिक उत्साह के बीच निकली विशाल कलश यात्रा ने पूरे शहर को कृष्णमय बना दिया। मारवाड़ी सम्मेलन महिला शाखा के तत्वावधान में आयोजित इस भव्य धार्मिक आयोजन को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह एवं आस्था देखने को मिली। कार्यक्रम के प्रथम चरण में सुबह स्थानीय श्री श्री हनुमान मंदिर से कथा स्थल श्री श्री सीतारामजी ठाकुरवाड़ी मंदिर तक विशाल एवं आकर्षक कलश यात्रा निकाली गई। यह भव्य यात्रा नगर के प्रमुख मार्गों से होकर निकली, जहां श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण के जयघोष, भजन-कीर्तन एवं मंगल गीतों के साथ धर्ममय वातावरण का निर्माण करते हुए आगे बढ़ रहे थे। बड़ी संख्या में महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सिर पर कलश धारण किए शामिल हुईं, जिनकी श्रद्धा एवं भक्ति ने यात्रा को अत्यंत दिव्य स्वरूप प्रदान किया। यात्रा के दौरान संपूर्ण नगर क्षेत्र भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। आज के इस पावन धार्मिक अनुष्ठान के मुख्य यजमान विनोद कुमार हरलालका एवं उनकी धर्मपत्नी कमला देवी हरलालका रहे। वैदिक मंत्रोच्चार एवं धार्मिक विधि-विधान के साथ आचार्य धनराज जी ने पूजा-अर्चना संपन्न कराई । इसके पश्चात सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया। आरती के समय मंदिर परिसर में उपस्थित श्रद्धालुओं की आस्था एवं भक्ति देखते ही बन रही थी। वहीं रात्रि 8 बजे दीप प्रज्वलन एवं आरती के साथ चार दिवसीय श्रीकृष्ण कथा का विधिवत शुभारंभ हुआ। कथा प्रारंभ होने से पूर्व मारवाड़ी सम्मेलन महिला शाखा की सदस्यों द्वारा अत्यंत मधुर एवं भावपूर्ण स्वागत गीत प्रस्तुत किया गया, जिसने उपस्थित श्रद्धालुओं को भक्ति रस में सराबोर कर दिया। इसके उपरांत राजस्थान के नोखा से पधारी सुप्रसिद्ध कथा वाचक सुश्री मोनिका पारीक व्यासपीठ पर विराजमान हुईं और अपनी अमृतमयी, ओजस्वी एवं भावपूर्ण वाणी से श्रीकृष्ण कथा का शुभारंभ किया। उनकी मधुर शैली, सरल भाषा एवं भावपूर्ण व्याख्यान ने श्रद्धालुओं को देर रात तक मंत्रमुग्ध बनाए रखा। कृष्ण कथा के दौरान सुश्री मोनिका पारीक ने कहा कि परमात्मा की कथा सुनने का सौभाग्य केवल उन्हीं लोगों को प्राप्त होता है जिन पर प्रभु की असीम कृपा बनी रहती है। बिना ईश्वर की कृपा के मनुष्य प्रभु का नाम स्मरण तक नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि “कलियुग केवल नाम आधार” अर्थात इस युग में यदि कोई श्रद्धा एवं प्रेम से भगवान के नाम का स्मरण कर ले तो प्रभु उसकी नैया पार लगा देते हैं। उन्होंने कहा कि भक्त जिस रूप में भगवान को पुकारते हैं, भगवान उसी रूप में अपने भक्तों को दर्शन देते हैं।महाभारत के प्रसंगों का अत्यंत भावपूर्ण एवं मार्मिक वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि महाभारत के युद्ध में कौरवों का विनाश हो गया, लेकिन पांचों पांडवों का बाल भी बांका नहीं हुआ क्योंकि उनके रक्षक स्वयं भगवान श्रीकृष्ण थे। उन्होंने “जाको राखे साइयां मार सके न कोय” की व्याख्या करते हुए भगवान की कृपा एवं संरक्षण की महिमा को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने उत्तरा एवं उसके गर्भ की रक्षा का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा द्वारा चलाए गए ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भस्थ शिशु की रक्षा की थी। कथा के दौरान जब उन्होंने माता कुंती द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से सुख के स्थान पर दुख मांगने का प्रसंग सुनाया तो श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। उन्होंने कहा कि दुख आने पर मनुष्य भगवान को याद करता है, जबकि सुख आने पर अक्सर प्रभु को भूल जाता है। इसी प्रकार द्रौपदी चीरहरण एवं भीष्म पितामह से जुड़े प्रसंग का अत्यंत मार्मिक वर्णन करते हुए उन्होंने नारी सम्मान, धर्म एवं कर्तव्य की गहन व्याख्या की। उन्होंने लाक्षागृह षड्यंत्र, धृतराष्ट्र के पुत्र मोह, विदुर की नीति एवं भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दुर्योधन के छप्पन भोग छोड़कर महात्मा विदुर के घर प्रेमपूर्वक केले के छिलके खाने की कथा को अत्यंत भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया। विदुरानी के प्रेम एवं भक्ति की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि सच्चा प्रेम दिखावे या व्यापार से नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण एवं भाव से किया जाता है। कथा का यह प्रसंग सुनकर पूरा पंडाल भावनाओं से भर उठा। इसके पश्चात उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का अत्यंत विस्तृत एवं मनोहारी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार अत्याचारी कंस ने अपनी मृत्यु के भय से देवकी की छह संतानों का वध कर दिया तथा भगवान श्रीकृष्ण ने दुष्टों के संहार एवं धर्म की स्थापना के लिए भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि के बुधवार के दिन को देवकी के गर्भ से अवतार लिया। कथा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, पूतना वध, गोकुल गमन एवं नंदबाबा के घर योगमाया के प्रकट होने के प्रसंगों का भी अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया। पूरे कथा स्थल को आकर्षक फूलों, भव्य सजावट एवं प्रकाश व्यवस्था से सुसज्जित किया गया था। कथा के दौरान “राधे-राधे”, “जय श्रीकृष्ण” एवं भजन-कीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने कथा श्रवण कर आध्यात्मिक आनंद एवं शांति की अनुभूति प्राप्त की।मारवाड़ी सम्मेलन महिला शाखा की अध्यक्षा सुषमा लखोटिया के अलावा पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने समस्त श्रद्धालुओं एवं नगरवासियों से आगामी दिनों में भी अधिकाधिक संख्या में उपस्थित होकर धर्मलाभ प्राप्त करने का आग्रह किया है। समिति के अनुसार आगामी दिनों में भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं, महारास, गोवर्धन लीला एवं सुदामा चरित्र सहित अनेक आध्यात्मिक प्रसंगों का रसपान कराया जाएगा। कथा के मध्य राजस्थान के झांकी कलाकारों द्वारा बनाई गई मनमोहक झांकियां प्रस्तुत की गई। पहले दिन की कथा समापन के पश्चात सामूहिक आरती की गई तथा श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरण किया गया।








कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें