रोहा, सोयल खेतान
असम के पारंपरिक लोकजीवन और हस्तशिल्प से जुड़े चार महत्वपूर्ण उत्पादों—बिहु पेंपा, बांस शिल्प, कार्वी हस्तशिल्प तथा देवरी हस्तशिल्प—को भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग प्रदान किए जाने पर पूरे राज्य में खुशी का माहौल है। इस उपलब्धि पर रोहा बारपुजिया निवासी विशिष्ट बांस एवं बेंत शिल्पी, मास्टर क्राफ्ट्समैन, प्रशिक्षक तथा वेम्बोमेन मुकेश सैकिया ने प्रसन्नता व्यक्त की है।
दैनिक पूर्वोदय से बातचीत में मुकेश सैकिया ने कहा कि बिहु पेंपा सहित असम की चार पारंपरिक सामग्रियों को जीआई टैग मिलना राज्य के लिए गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि इससे न केवल असम की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती मिलेगी, बल्कि बांस-बेंत शिल्प, पेंपा निर्माण तथा अन्य पारंपरिक हस्तशिल्पों से जुड़े कारीगरों को भी संरक्षण और प्रोत्साहन मिलेगा।
पिछले लगभग 20 वर्षों से बांस एवं बेंत शिल्प से जुड़े मुकेश सैकिया ने भारत सरकार और असम सरकार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि जीआई टैग मिलने से स्थानीय शिल्पकला को बढ़ावा मिलेगा तथा इससे जुड़े शिल्पियों के लिए बाजार और प्रचार-प्रसार के नए अवसर खुलेंगे। उन्होंने विश्वास जताया कि यह मान्यता असम की पारंपरिक कला और शिल्प को वैश्विक पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी।
उल्लेखनीय है कि मुकेश सैकिया ने अपने नवाचारी कार्यों और सृजनशीलता के माध्यम से स्थानीय बांस शिल्प को नई दिशा दी है। उनके कार्यों को विभिन्न मंचों पर सराहना मिली है तथा उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वे राजस्थान के उदयपुर स्थित शिल्पग्राम उत्सव सहित असम और पूर्वोत्तर भारत के अनेक सरकारी एवं गैर-सरकारी हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दक्ष प्रशिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं।
इसके अलावा, वे क्षेत्र के बेरोजगार युवक-युवतियों को बांस एवं बेंत शिल्प का प्रशिक्षण देकर स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मुकेश सैकिया का मानना है कि स्थानीय संसाधनों का कम लागत में उपयोग कर सफल उद्योग स्थापित किया जा सकता है। उनका जीवन और कार्य इस सोच का एक प्रेरणादायक उदाहरण है।








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