राजेश राठी
लखीमपुर, जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है, तब केवल एक प्रश्नपत्र नहीं लीक होता, बल्कि लाखों युवाओं की वर्षों की मेहनत, उनके माता-पिता के त्याग, उनके सपने, उनकी उम्मीदें और देश की पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता भी तार-तार हो जाती है। आज देश का युवा सड़कों पर है। वह अपने भविष्य की सुरक्षा, निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और जवाबदेह शासन की मांग कर रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जैसे-जैसे छात्र आंदोलन तेज होता जा रहा है, वैसे-वैसे उसके मूल उद्देश्य पर राजनीति की परतें चढ़ती जा रही हैं। सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियों और कानून-व्यवस्था का पक्ष रख रहा है, विपक्ष सरकार से इस्तीफे की मांग कर रहा है, विभिन्न संगठन आंदोलन का नेतृत्व करने की होड़ में दिखाई दे रहे हैं, मीडिया का बड़ा हिस्सा आरोप-प्रत्यारोप की बहसों में उलझा है, और इन सबके बीच वह छात्र, जिसकी मेहनत इस पूरे विवाद का केंद्र है, कहीं पीछे छूटता जा रहा है। ऐसे में कुछ असहज लेकिन आवश्यक प्रश्न पूरे देश के सामने खड़े होते हैं। पहला प्रश्न सरकार से—यदि प्रश्नपत्र लीक जैसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं तो आखिर व्यवस्था की वह कमजोर कड़ी कौन-सी है जिसे अब तक स्थायी रूप से क्यों नहीं सुधारा गया? क्या हर बार जांच समिति, निलंबन और आश्वासन ही पर्याप्त हैं, या अब ऐसी अभेद्य परीक्षा प्रणाली बनाने का समय आ गया है जिसमें प्रश्नपत्र लीक करना लगभग असंभव हो जाए? दूसरा प्रश्न विपक्ष से—क्या हर समस्या का समाधान केवल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री या किसी अधिकारी का इस्तीफा मांगना है? यदि आज इस्तीफा हो भी जाए, तो क्या कल से प्रश्नपत्र लीक होना बंद हो जाएगा? क्या विपक्ष के पास केवल विरोध है, या वह भी ऐसा ठोस कानून बनाने का प्रस्ताव देगा जो किसी भी सरकार के रहते इस अपराध पर प्रभावी रोक लगा सके? तीसरा प्रश्न आंदोलनकारियों से—क्या आपका संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन के लिए है या व्यवस्था परिवर्तन के लिए? यदि उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को बचाना है, तो क्या आंदोलन को राजनीतिक मंच बनने से बचाया जाएगा? क्योंकि जिस दिन किसी छात्र आंदोलन की पहचान किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से होने लगेगी, उसी दिन उसके नैतिक बल पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगेंगे। चौथा प्रश्न मीडिया से—क्या कैमरे छात्रों की पीड़ा दिखा रहे हैं या केवल राजनीतिक बयान? क्या बहस का विषय प्रश्नपत्र लीक है या केवल यह कि किसने किस पर क्या आरोप लगाया? और सबसे बड़ा प्रश्न समाज से—क्या हम हर बार कुछ दिनों तक आक्रोश व्यक्त करके फिर अगली परीक्षा तक सब कुछ भूल जाने वाले समाज बन चुके हैं? यदि ऐसा है, तो दोष केवल सरकार या विपक्ष का नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चुप्पी का भी है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में इस्तीफा ही समाधान है? लोकतंत्र में इस्तीफा नैतिक उत्तरदायित्व का प्रतीक हो सकता है, लेकिन वह स्थायी समाधान नहीं है। यदि केवल इस्तीफों से व्यवस्थाएं सुधरतीं, तो देश में बार-बार वही समस्याएं दोहराई न जातीं। देश को आज व्यक्तियों के परिवर्तन से अधिक व्यवस्था के परिवर्तन की आवश्यकता है। आवश्यकता ऐसे कठोर और सर्वमान्य कानून की है जिसमें प्रश्नपत्र लीक को राष्ट्र के भविष्य के साथ विश्वासघात मानते हुए गंभीर संगठित अपराध की श्रेणी में रखा जाए; दोषी चाहे अधिकारी हो, कर्मचारी, निजी एजेंसी, कोचिंग संस्थान, तकनीकी विशेषज्ञ या कोई प्रभावशाली राजनेता या आम व्यक्ति—किसी के लिए भी कानून अलग न हो; प्रत्येक मामले की जांच निर्धारित समय-सीमा में पूरी करना कानूनी रूप से अनिवार्य हो; विशेष न्यायालय निश्चित अवधि के भीतर निर्णय दें; दोष सिद्ध होने पर कठोर कारावास, भारी आर्थिक दंड, सरकारी सेवा से आजीवन प्रतिबंध और भविष्य में किसी भी परीक्षा प्रक्रिया से स्थायी निष्कासन जैसे प्रावधान हों; परीक्षा प्रणाली में आधुनिक तकनीक, बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी तंत्र और पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए। कानून तभी प्रभावी माना जाएगा जब उसका उल्लंघन करने वाले को यह स्पष्ट संदेश मिले कि न तो राजनीतिक संरक्षण उसे बचा पाएगा और न ही वर्षों तक चलने वाली न्यायिक प्रक्रिया। लोकतंत्र का उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाना है। इसलिए सरकार को आत्ममंथन करना होगा, विपक्ष को केवल विरोध नहीं बल्कि ठोस वैकल्पिक नीति प्रस्तुत करनी होगी, आंदोलनकारियों को अपने संघर्ष की निष्पक्षता बनाए रखनी होगी, मीडिया को सनसनी से ऊपर उठकर समाधान-केंद्रित पत्रकारिता करनी होगी और समाज को भी यह तय करना होगा कि वह युवाओं के भविष्य के प्रश्न पर राजनीतिक दर्शक बना रहेगा या सक्रिय नागरिक की भूमिका निभाएगा। आज आवश्यकता किसी की राजनीतिक जीत या हार तय करने की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को मजबूत करने की है जिस पर करोड़ों युवाओं का भविष्य टिका है। यदि इस बार भी बहस केवल इस्तीफों, आरोपों और प्रत्यारोपों तक सीमित रह गई, तो संभव है कि अगली परीक्षा में फिर कोई नया प्रश्नपत्र लीक होगा, फिर छात्र सड़कों पर होंगे, फिर राजनीति होगी, फिर जांच होगी और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। देश का युवा अब भाषण नहीं, भरोसा चाहता है; आश्वासन नहीं, उत्तरदायित्व चाहता है; और सबसे बढ़कर वह ऐसी व्यवस्था चाहता है जिसमें उसकी मेहनत का मूल्य किसी लीक हुए प्रश्नपत्र से कम न आंका जाए। क्योंकि अंततः सरकारें बदलना लोकतंत्र की प्रक्रिया है, लेकिन व्यवस्था बदलना राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।








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