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जिस पानी में बप्पा को विदा किया, क्या हम उसे बचा पाएंगे?


ऋचा मिश्र

कल गणपति विसर्जन के दिन मैं एक सवाल लेकर घर लौटी। ऐसा सवाल, जिसका जवाब शायद सिर्फ मेरा नहीं, हम सबका होना चाहिए।


मेरे लिए कल का दिन वैसे भी खास था। इसी दिन मैंने राइज प्लस के कार्यकारी संपादक के रूप में अपनी नई जिम्मेदारी संभाली। किसी नई यात्रा की शुरुआत के लिए इससे खूबसूरत संयोग और क्या हो सकता था कि उसी दिन गणपति बप्पा की विदाई भी थी। एक तरफ एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत और दूसरी तरफ बप्पा को विदा करने का भावुक पल। लेकिन दिन खत्म होते-होते मेरे मन में उत्सव से ज्यादा प्रकृति को लेकर एक चिंता रह गई।


पुणे में गणपति विसर्जन का दृश्य अपने आप में बहुत खास होता है। ढोल-ताशे, गुलाल, बप्पा के जयकारे और हजारों लोगों की आस्था। लेकिन इस पूरे उत्सव के बीच एक ऐसी तस्वीर भी है, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।


पुणे शहर के बीच से बहने वाली छोटी नदी और उसकी धाराओं में वर्षों से गणपति विसर्जन होता आया है। आज भी बड़ी संख्या में पुणेकर इन्हीं जलधाराओं में बप्पा को विदा करते हैं। लेकिन आज इन जगहों की हालत देखकर मन में सवाल उठता है कि जिस पानी को हम अपने आराध्य की अंतिम यात्रा का हिस्सा बना रहे हैं, क्या वह पानी खुद उस स्थिति में है?


कई जगहों पर पानी इतना प्रदूषित दिखाई देता है कि नदी और काले पानी के नाले के बीच फर्क करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन फिर दूसरा सवाल सामने आता है कि लोग जाएं तो जाएं कहां? शहर में रहने वाले हर परिवार के पास कोई साफ प्राकृतिक जलस्रोत उपलब्ध नहीं है। ऐसे में पास की जलधारा ही सबसे आसान और व्यावहारिक विकल्प बन जाती है। इसलिए इस पूरी स्थिति को सिर्फ लोगों की लापरवाही कह देना भी शायद सही नहीं होगा। जब विकल्प सीमित हों, तो मजबूरी भी बहुत कुछ तय करती है।


लगभग पांच वर्ष पहले कुछ गणपति भक्तों ने इसी सवाल का एक अलग जवाब तलाशने की कोशिश की। सचिन खांडके के नेतृत्व में एक समूह ने पुणे से दूर एक ऐसी जगह खोजी, जिसके बारे में उस समय बहुत कम लोग जानते थे। वहां पहुंचकर उन्हें बेहद साफ और निर्मल पानी मिला। इतना साफ कि देखकर लगता था कि प्रकृति ने इस जगह को अब तक बहुत संभालकर रखा है।


समूह ने तय किया कि हर वर्ष गणपति विसर्जन के लिए वे इसी जगह जाएंगे। दूरी थी, आने-जाने में समय लगता था, लेकिन शायद उनके लिए यह परेशानी नहीं थी। उनके लिए महत्वपूर्ण था कि बप्पा को ऐसे पानी में विदा किया जाए, जिसे देखकर मन को संतोष मिले।


पांच साल पहले वह जगह लगभग अनजान थी। फिर धीरे-धीरे लोगों को उसके बारे में पता चलने लगा। कुछ और लोग वहां जाने लगे। एक ऐसी जगह, जिसे कुछ गणपति भक्तों ने स्वच्छ पानी की तलाश में खोजा था, धीरे-धीरे और लोगों की पहुंच में आने लगी। और कल, करीब पांच साल बाद, मैं भी उसी जगह खड़ी थी। सामने वही पानी था। लेकिन तस्वीर कुछ बदली हुई थी।


पानी का स्तर कम था। उसका रंग भी पहले जैसा साफ नहीं था। आसपास प्लास्टिक और दूसरे कचरे के निशान दिखाई दे रहे थे। जिस जगह के पानी की साफ-सफाई कभी उसकी सबसे बड़ी पहचान रही होगी, वहां अब बदलाव साफ महसूस किया जा सकता था। वहां खड़े होकर मेरे मन में बस एक सवाल आया कि क्या हम प्रकृति की खूबसूरत जगहों को भी खोजते-खोजते एक दिन उसी स्थिति में पहुंचा देते हैं, जिससे बचने के लिए हमने उन्हें खोजा था?


पांच साल पहले लोग प्रदूषित पानी से बचने के लिए एक साफ जलस्रोत तक पहुंचे थे। आज पांच साल बाद वही साफ जलस्रोत भी धीरे-धीरे हमारी गतिविधियों का असर झेलता दिखाई दे रहा है।


शायद यही इस पूरे अनुभव की सबसे बड़ी सीख है। मुद्दा सिर्फ गणपति विसर्जन का नहीं है। मुद्दा हमारी उस आदत का है, जिसमें हम प्रकृति से कुछ अच्छा मिलते ही उसे इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं, लेकिन उसे बचाने की जिम्मेदारी उतनी गंभीरता से नहीं लेते।


हम किसी खूबसूरत जगह को खोजते हैं। वहां जाते हैं। उसकी सुंदरता का आनंद लेते हैं। लेकिन जाते समय क्या हम उसे वैसा ही छोड़कर आते हैं, जैसा हमने पाया था? गणपति हमें बुद्धि और विवेक का संदेश देते हैं। शायद बप्पा की विदाई के साथ हमें इस बार इस संदेश को अपने जीवन में उतारने की भी जरूरत है।


बड़ा गणपति हमारी श्रद्धा का हिस्सा हो सकता है। भव्य सजावट और बड़ा उत्सव भी हमारी परंपरा का हिस्सा हैं। लेकिन क्या अब समय नहीं है कि हम अपनी आस्था के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ें? अगले वर्ष हम एक छोटा-सा बदलाव कर सकते हैं। पर्यावरण-अनुकूल गणपति की प्रतिमा चुन सकते हैं, जिसका घर पर ही सुरक्षित रूप से विसर्जन किया जा सके। इससे हमारी आस्था भी बनी रहेगी और हमारे पहले से ही दबाव में मौजूद जलस्रोतों पर अतिरिक्त बोझ भी नहीं पड़ेगा। क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बप्पा का विसर्जन कहां हुआ। सवाल यह भी है कि बप्पा को विदा करने के बाद हमने पीछे क्या छोड़ा। अगर हम पीछे स्वच्छता, संवेदनशीलता और प्रकृति की थोड़ी-सी चिंता छोड़ सकें, तो शायद यही बप्पा के लिए हमारी सबसे खूबसूरत विदाई होगी।


राइज प्लस के कार्यकारी संपादक के रूप में मेरी नई यात्रा का यह पहला दिन था। संयोग से गणपति विसर्जन का दिन भी। इसलिए इस यात्रा की पहली बात बप्पा के नाम होना मेरे लिए स्वाभाविक ही है। बप्पा, अगली बार जब आप आएं, तो हम आपका स्वागत सिर्फ बड़े उत्सव के साथ नहीं, बल्कि थोड़ी अधिक समझदारी और थोड़ी अधिक जिम्मेदारी के साथ कर सकें।

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