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वास्तु का आधार हैं हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियां

 


वास्तु का मूल उद्देश्य केवल दिशाओं को ठीक करना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना है जहां हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां अनुकूलता का अनुभव करें और मनुष्य अपनी स्वाभाविक क्षमता के साथ जीवन जी सके


हमारा पूरा जीवन आखिर हमारे अनुभवों का ही तो संग्रह है। कोई स्थान हमें अच्छा लगता है, कोई बेचैन करता है। कहीं पहुंचते ही मन प्रसन्न हो जाता है, तो कहीं बिना किसी स्पष्ट कारण के अधिक देर बैठने का मन नहीं करता। लेकिन यह अनुभव हमारे भीतर आता कहां से है?


इसका उत्तर हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियों में छिपा है।

आंख, नाक, कान, जीभ और त्वचा—यही वे पांच माध्यम हैं जिनसे हम अपने आसपास के संसार को ग्रहण करते हैं। आंख से हम आकार और रंग देखते हैं, कान से सुनते हैं, त्वचा से स्पर्श और ठंडा-गर्म अनुभव करते हैं, जीभ से स्वाद और नाक से गंध ग्रहण करते हैं। यानी हमारे बाहर का संसार हमारे भीतर पहुंचता ही इन पांच द्वारों से है।

और यहीं से वास्तु को समझने का एक अत्यंत सरल दृष्टिकोण सामने आता है—वास्तु का संबंध केवल मकान से नहीं, उस मकान में रहने वाले मनुष्य के अनुभव से है।


आंखें हमारे अनुभव का बड़ा हिस्सा ग्रहण करती हैं

पांचों ज्ञानेन्द्रियों की अपनी भूमिका है, लेकिन प्रस्तुत पाठ में विशेष रूप से आंखों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि मनुष्य द्वारा ग्रहण किए जाने वाले ज्ञान का लगभग 80 से 85 प्रतिशत भाग आंखों के माध्यम से प्राप्त होता है।

इसका अर्थ समझना कठिन नहीं है। जिस स्थान पर हम प्रतिदिन कई घंटे रहते हैं, वहां हमें क्या दिखाई देता है—उस स्थान का आकार कैसा है, रंग कैसे हैं, आंतरिक सज्जा कैसी है—ये बातें लगातार हमारे मन तक पहुंच रही होती हैं।

यदि दृश्य मन के अनुकूल है तो नेत्र इन्द्रिय संतुष्ट होती है। इसी प्रकार यदि ध्वनि अनुकूल है तो कान, सुगंध अनुकूल है तो नाक और स्थान का तापमान तथा बैठने की व्यवस्था शरीर के अनुकूल है तो त्वचा सहज अनुभव करती है।

यानी अच्छा वातावरण केवल वह नहीं जो दिखने में सुंदर हो। वह ऐसा होना चाहिए जिसे हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियां सहज रूप से स्वीकार कर सकें।


ज्ञानेन्द्रियों से मन और मन से जीवन

इस विचार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी इसके बाद आती है।

जब हमारी ज्ञानेन्द्रियां संतुष्ट होती हैं तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता है। मन प्रसन्न और संतुष्ट हो तो व्यक्ति अपने कार्यों को अधिक सहजता से कर सकता है। लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छा और उत्साह बढ़ता है। परिवार के सदस्यों के साथ व्यवहार में भी सहजता आती है।

इसी प्रकार निर्णय लेने की क्षमता भी केवल बुद्धि का विषय नहीं है। सही निर्णय के लिए शांत, स्थिर और प्रसन्नचित्त मन आवश्यक माना गया है। इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं कि “मेरा घर वास्तु के अनुसार है या नहीं?” अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—इस स्थान में रहने वाला व्यक्ति क्या अनुभव कर रहा है?


यही वास्तु का व्यावहारिक उद्देश्य है

वास्तुशास्त्र का विचार इसी अनुभव को व्यवस्थित करने का प्रयास करता है। व्यक्ति जिस परिवेश और मकान में रहता है, वह उसकी दिनचर्या के अनुकूल हो; वहां का आकार, रंग, आंतरिक सज्जा, ध्वनि, गंध, तापमान और बैठने की व्यवस्था ऐसी हो कि उसकी ज्ञानेन्द्रियां अधिकतम अनुकूलता अनुभव कर सकें।

सरल शब्दों में—वास्तु स्थान को मनुष्य के अनुकूल बनाने की कला है, ताकि स्थान मनुष्य की इन्द्रियों के विरुद्ध नहीं, उनके साथ काम करे।

इसका अर्थ यह नहीं कि केवल घर बदल देने से जीवन बदल जाएगा। व्यक्ति का कर्म, प्रयास और निर्णय अपनी जगह आवश्यक हैं। लेकिन जिस वातावरण में हम प्रतिदिन सोचते, काम करते, आराम करते और निर्णय लेते हैं, वह हमारे अनुभव का हिस्सा अवश्य है।

इसलिए अगली बार अपने घर को केवल यह देखकर न परखें कि वह कितना सुंदर है। यह भी अनुभव करें—वहां आपकी आंखें क्या देखती हैं, कान क्या सुनते हैं, नाक क्या महसूस करती है और त्वचा क्या अनुभव करती है।

जब स्थान हमारी पांचों ज्ञानेन्द्रियों के अनुकूल होता है, तो मन को सहज और प्रसन्न रहने के लिए बेहतर वातावरण मिलता है। और शायद वास्तु का सबसे सरल उद्देश्य भी यही है—ऐसा स्थान बनाना जहां मनुष्य अपने सर्वोत्तम स्वरूप में रह सके और अपना श्रेष्ठ जीवन जी सके।


रिपोर्ट: देवकी नंदन देवड़ा

मो. 9377607101


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