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बीजू दा की भरपाई असंभव



प्रवेश मिश्र












असमिया फिल्म जगत के सुप्रसिद्ध अभिनेता, सुपरस्टार, बीजू फुकन का बुधवार को दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया| वह कुछ दिनों से बीमार थे और अपना उपचार करा रहे थे। असम के लिए एक सुनहरे युग का अंत हो गया| निधन के बाद अस्पताल में चाहने वालो का तांता लग गया| सब बीजू दा को एक बार देखना चाहते थे| शोक की लेहर चारो तरफ दौड़ उठी| असमिया फिल्म के वह अबतक के सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं में से एक रहे है| सोशल मीडिया द्वारा तेज़ी से फैलती खबरों के इस भारत में आजकल कौनसी खबर कहा रुकती है| खबर पहुचते ही बड़ा दुख हुआ| उनके जाने से सभी असमवासियों के दिल में एक खालीपन आया है जिसकी भरपाई नहीं कि जा सकती| उनके इस व्यवहारिक दुनिया से जाने के कुछ ही देर में सूबे के राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत कई महत्वपूर्ण हस्तियों ने अपना शोक व्यक्त किया और करना भी चाहिए था क्यूंकि बीजू दा का असम के प्रति अपनी कला के माध्यम से योगदान हमेशा याद किया जाएगा|
वह बहुत विनम्र एवं व्यावहारिक स्वभाव के थे| उनके साथ एक व्यक्तिगत अनुभव याद आ रहा है| बात लगभग 1997-1998 की है| पिताजी, श्री संपत मिश्र का गुवाहाटी के अनेको सामाजिक संस्थाओं से नाता रहा है| उनमे से एक मारवाड़ी युवा मंच है| उस वक़्त वे मायुमं की गुवाहाटी शाखा के लिए सक्रिय तौर से काम कर रहे थे और अपने साथ परिवार के सभी सदस्यों को अपने कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए ले जाते थे| उस समय गुवाहाटी के फाटासील आमबाड़ी स्थित के.आर.बी. गर्ल्स स्कूल में मायुमं गुवाहाटी शाखा द्वारा रक्तदान शिविर लगाया गया था| इस कार्यक्रम में बीजू फुकन मुख्य अतिथि के तौर पे पधारे थे| बड़ी ही सादगी के साथ वे विद्यालय के प्रांगण में अपनी धर्मपत्नी के साथ पधारे और शाखा सदस्यों से बहुत रूचि के साथ जानकारी लेने में लग गए| में कुछ दूर खड़ा उन्हें देख रहा था| सब उनके साथ फोटो खिचवाने में व्यस्त थे| थोड़ी देर बाद जब भीड़ हट गयी तो मैं उनके पास गया, मेरे हाथ में ब्लड ग्रुप प्रमाण के बाद एक कार्ड मिला था वो था| उन्होंने हस्ते हुए मेरा कार्ड देखा जिसमे मेरी फोटो थी और जन्म तिथि लिखी हुई थी| मेरा जन्मदिन 18 फरवरी को आता है, और इसको मात्र एक संयोग कहा जाएगा की बीजू दा का जन्मदिन भी 18 फरवरी को ही है| उन्होंने मेरा कार्ड देखा और हंस पड़े और कहा मेरा भी जन्मदिन 18 फरवरी है| बड़े ही खुश हो के उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा और मुस्कुराने लगे| मुझे बड़ा अच्छा लगा| उन्होंने जिस तरह का वर्ताब मेरे साथ किया वह मेरे दिल को छु गया| एक सामाजिक संस्था के छोटे से कार्यक्रम जिसमे ना कोई लाइट हो ना कोई साउंड हो या किसी और बड़ी हस्ती की सिरकत हो, उसमे इतनी सादगी से आ के सभी लोगो से बात करके, एक छोटे से समय में घुल मिल जाना ही सायद उनके सरल स्वभाव को दर्शाता है| मेरी उम्र बहुत कम थी उस समय| कुछ दिन पहले मै एक मोटिवेशन स्पीकर को सुन रहा था और कुछ बिषय पर चर्चा करते समय उन्होंने एक बात कही थी की हमारे दिमाग में एक भाग ऐसा भी होता है जिसको अनकोन्सिअस माइंड कहते है| यह वो भाग होता है जहां सबकुछ रिकॉर्ड होता रहता है अपने आप| जब कभी भी आपसे कोई पुरानी बात की जाती है तो आपके अनकोन्सिअस माइंड से कई बार आपको कुछ ऐसी बाते याद आ जाती है जो घटनाक्रम के समय आप गौर नहीं फरमाते| कुछ बाते ऐसी होती है जो आपको याद रहती है और वह अनुभूती आप कभी नहीं भूलते है| ऐसा ही कुछ अनुभव मेरा बीजू दा के साथ रहा है| मैंने उनकी कोई भी फिल्म आज तक नहीं देखी परन्तु उनका वह 2 मिनट का बर्ताव मुझे मेरे जीवन में हमेशा याद रहेगा| इस जीवंत उदहरण से एक और खीख भी मिलती है की आप कितने भी बड़े पद पर हो या किसी भी क्षेत्र में किसी भी शिखर को छु चुके हो, आपके व्यवहार में सादगी रहनी चाहिए| मैंने अपने अभी तक के जीवन में कई ऐसे व्यक्तीओं को देखा है जो कुछ हासील करते ही घमंड की पराकाष्टा को पार कर देते है| ऐसे में मुझे मेरे शुभचिंतक, मेरे पिताजी के मित्र व सुनहरा राजस्थान के प्रधान संपादक श्री अनिल जी लोढ़ा की लिखी कविता की पंक्तियाँ याद आ रही है | उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा है -
रोको, इसे ढेहने से रोको
यह ईमारत नहीं इंसान है, इसे रोको
इमारतों से इंसानों जैसा लगाव
इंसानों से इमारतों जैसा बर्ताव 
यह संस्कृति नहीं, विकृति है... इसे रोको
सफलता का स्वाद जब सर चढ़ कर बोलता है तो कई बार इंसानों से इमारतों जैसा बर्ताव कर लिया करते है सफल लोग| कुछ लोग उच्चाई को पा कर और ऊंचा उड़ने के ख्वाबो तले यह भूल जाते है की अगर उन्होंने ऊँचाई को प्राप्त किया है तो सिर्फ उनके साथ या उनके समर्थन में खड़े लोगो की बजह से| यह समर्थन या साथ किसी भी प्रकार का और किसी अनजाने का भी हो सकता है| इस संज्ञान में बीजू फुकन एक आदर्श है| असम के लोगो के लिए उनकी अभिनीत फिल्मे और लोगो के प्रति उनका आचरण उनकी यादों को हमेशा ताज़ा रखने के लिए काफी है| उनके परिवार और उनके चाहने वालो को इस दुख की घड़ी में परमात्मा इस सांसारिक सच को सहने की शक्ति दे|में तब्दील करे यह मेरी कामना रहेगी|

यह संपादकीय असम के दैनिक पूर्वोदय में भी 25 नवम्बर 2017 को प्रकाशित हो चुका है

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