प्रवेश मिश्र, कार्यकारी संपादक, राइज प्लस
श्री भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग मंदिर महाराष्ट्र में पुणे से करीब 110 किलोमीटर दूर सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। इसी मंदिर के पास से भीमा नामक एक नदी भी बहती है जो कृष्णा नदी में जाकर मिलती है। 3,250 फीट की ऊंचाई पर यह मंदिर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का वर्णन शिवपुराण में मिलता है। भीम नाम का एक राक्षस था। कहां जाता है कि यहां इसी भीम राक्षस का वध कर महादेव भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हुए। हाल ही में मुझे भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग जाने का अवसर प्राप्त हुआ और देवाधिदेव महादेव के दर्शन का सौभाग्य भी। दर्शन कर मन संतुष्ट हुआ पर आस-पास हो रहे बहुत कुछ ने मन विचलित कर दिया। व्यवस्थाओं की भारी कमी महसूस हुई। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, भीमाशंकर जैसे प्रसिद्ध मंदिर में श्रद्धालुओं को हो रही दिक्कतों को देख रहा नहीं गया। मैंने पुलिस, प्रशासन व प्रबंध कमेटी से संपर्क साधा। सब अपने रटे रटाए जवाब से रत्ती भर भी आगे नहीं बढ़े। जो देखा उसमे अधिकतम चीजों में लगा की मेरी आस्था को कमजोरी समझा जा रहा है।
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की लिखी यह दो पंक्तियां मैं अपने जीवन में लगातार अपनाता हूँ। इसका अर्थ यह है कि पाप का भागीदार केवल पाप करने वाला ही नहीं बल्कि वह भी है जो इसे होते हुए देखकर अपना विरोध व्यक्त नहीं करते। मैंने भी कुछ ऐसा ही महसूस किया। पाप का भागीदार भला कोई क्यों बनना चाहेगा। चलिए आपको एक एक करके सब बातें बताते हैं।
1. प्राइवेट कन्वेंस के नाम पर वसूली
बात एकदम ताजा ही है, जब मैं अपनी गाड़ी से भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पहुंचा। मंदिर परिसर से लगभग 1-1.5 किलोमीटर पहले 3-4 पुलिस की टोली मंदिर की तरफ जाते हुए वाहनों को रोकते नजर आए। पूछने पर पता चला कि वह चाह रहे हैं कि सभी वाहनों को वही बगल में पार्किंग में खड़ा कर दिया जाए और आगे का रास्ता प्राइवेट बसों के द्वारा तय किया जाए। मैंने पुलिस वालों से कहां की 1 किलोमीटर आगे मंदिर परिसर के ठीक सामने एक विशाल पार्किंग स्पेस है। क्यों ना हम गाड़ियां अंदर ले जाकर वही लगा दे। यह सुनकर सभी पुलिसवाले मेरे ऊपर चढ़ गए और पुलिस वालों की भाषा और बर्ताव से भला कौन अवगत नहीं है। वह किसी भी हालत में गाड़ियों को अंदर जाने नहीं देना चाहते थे। उप-निरीक्षक संदीप आनंदराव बोरकर ने तो जवाब देना भी अपनी प्रतिष्ठा के खिलाफ समझा। सभी को अपनी-अपनी गाड़ियां वही बगल में खड़ी करके वहां मौजूद प्राइवेट बसों के द्वारा मंदिर तक जाना पड़ा। अमूमन हर बस में 40 से ज्यादा लोगों को ले जाया जा रहा था, और हर एक सवारी से ₹20 किराया एकतरफा का वसूला जा रहा था। इस हिसाब से 40 लोगों को 1 किलोमीटर दूर छोड़ने पर बस वाले को ₹800 की आमदनी होती थी। अंदर जाने पर पता चला कि जो विशाल पार्किंग स्पेस की में बात कर रहा था, वह खाली पड़ा था। पता चला कि पुलिस और बस चालकों की मिलीभगत की वजह से लोग पैसे देने को मजबूर हैं। इस तरह से एक गाड़ी वाला आराम से दिन भर में ₹25000 से ₹30000 की रकम जमा कर लेता है। सभी गाड़ियों में श्री क्षेत्र भिमाशंकर संस्थान का नाम लिखा हुआ था। इसके पीछे असली बड़ा हाथ कौनसा है यह तो पड़ताल का विषय है।
कुछ जवाब नहीं देते पुलिसकर्मी
खाली पड़ी अन्दर की पार्किंग
खाली पड़ी अन्दर की पार्किंग
2. स्थानीय गाड़ियों पर ताला; बहार से आई प्राइवेट बसें
कुछ लोगों ने अपनी आपबीती सुनाई। वह स्थानीय लोग थे जो किराए में गाड़ियां चलाकर अपना भरण पोषण करते हैं। उनका कहना था कि सभी स्थानीय वाहनों पर रोक लगा दी गई है और विशेष तौर पर बाहर से प्राइवेट बसो को श्रीक्षेत्र भीमाशंकर में मंगवाया गया है जो 1 महीने से लगातार 1 किलोमीटर से श्रद्धालुओं को लाने ले जाने के नाम पर हजारों रुपए की कमाई कर रहे हैं। स्थानीय लोगों पर रोक और बाहरी लोगों को आकर अंदर गाड़ी चलाने का निर्देश अगर कोई दे सकता है तो वह कोई पहुंच वाला व्यक्ति ही होगा। जिन लोगों ने यह बात बताई वह काफी परेशान थे और चाहते थे कि इन बातों को कोई उजागर करें।
प्राइवेट बस में संस्थान का नाम
3. घुस खिलाओ, दर्शन पाओ
जैसे ही हम आगे बढ़े और मंदिर दर्शन की लाइन को पकड़ा, कुछ लोग पीछे पीछे आकर हम से लगातार संपर्क साधने की कोशिश कर रहे थे। ऐसा सिर्फ हमारे साथ ही नहीं हो रहा था बल्कि सबके साथ हो रहा था। वह लोग शीघ्र दर्शन के नाम पर ₹300 प्रति व्यक्ति मांग रहे थे। उनका कहना था की अगर एक नंबर तरीके से सीघ्र दर्शन टिकट लोगे तो ₹500 संस्थान के नाम पर देने पड़ेंगे पर वह यहीं कार्य ₹300 प्रति व्यक्ति बिना पर्ची के कर देंगे। पता नहीं किस रास्ते से और किस तरह यह संभव है। मेरा मानना है की धार्मिक जगहों को व्यवसायिक अड्डा नहीं बनाना चाहिए। व्यवसाय करने के 375 और दूसरे तरीके भी है।
श्रद्धालुओं की लगी लाइन (बांए)
4. बुनियादी सुविधाओं की कमी
पहाड़ के ऊपर भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग एक ऐसे स्थान पर मौजूद है जहां ऊपर पहुंचकर सीढ़ियों से नीचे की ओर जाना होता है। यह सीढ़ियों का फासला अच्छा खासा है। मंदिर प्रबंधन द्वारा वृद्ध श्रद्धालुओं के लिए नीचे जाने की व्हीलचेयर या कोई और सुविधा मौजूद नहीं है। अगर कोई वृद्ध श्रद्धालु ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना चाहते हैं तो उनके पास दो विकल्प। पहला, सीढ़ियों से चल कर जाए व दूसरा पालकी वालों को ₹1500 से ₹2000 तक देकर नीचे जाए। नीचे पहुंचने के बाद भी वृद्ध श्रद्धालुओं के लिए कोई विशेष दर्शन का प्रवेशद्वार नहीं है। उन्हें सामान्य लंबी लाइन में लगकर ही जाना होगा अगर उन्होंने संस्था की ₹500 की पर्ची ना कटवाई हो तो। मंदिर की ओर जाने वाली सीढ़ियों में लोहे की रेलिंग लगाई हुई है जिसके बीच बीच में कट है ताकि कोई निकल या अंदर आ पाए। श्रद्धालुओं को इन कट से बहुत दिक्कतों का सामना करना होता है। जहां पर भी रेलिंग में कट आता है वहां अनेकों श्रद्धालु अपना बल प्रयोग कर चलती लाइन में बीच में ही घुस जाते हैं। सीढ़ियों के बगल बगल में बनी इन रेलिंग पर लगभग 10 से 15 कट है। हर जगह कुछ लोग अंदर घुसने का प्रयास कर भगदड़ मचाते हैं। प्रबंध कमेटी द्वारा इस पर रोक लगाने की कोई व्यवस्था नहीं है। महादेव का धाम संपूर्ण तौर पर राम भरोसे है।
पिछले दो हफ्तों में मैंने कुल 3 ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के अलावा, नासिक के त्रंबकेश्वर और उज्जैन के महाकालेश्वर। त्रंबकेश्वर और महाकालेश्वर में प्रबंध कमेटी द्वारा व्यवस्थाओं का आभाव नजर नहीं आ रहा था। महाकालेश्वर में वृद्ध श्रधालुओं के लिए व्हीलचेयर की बहुत ही बेहतरीन सुविधा है। त्रंबकेश्वर में भी वृद्ध श्रद्धालुओं के लिए सीधे दर्शन करने की सुविधा है। जब भीमाशंकर में यह सब घटित होता मैंने अपने आसपास देखा तो रहा नहीं गया। पूछताछ करने पर मुझे श्री क्षेत्र भिमाशंकर संस्थान के अध्यक्ष के बारे में पता चला। उनको ढूंढ कर मैंने सारी बातें बताई। श्रीमान सुरेश कौदारे, जो श्री क्षेत्र भिमाशंकर संस्थान के अध्यक्ष हैं, बड़ी ही शालीनता से मेरी सारी बातें सुनी व सब पर सुधार की कार्रवाई करवाने का आश्वासन भी दिया। इसके पश्चात ज्योतिर्लिंग के समीप ले जाकर मेरा सपरिवार श्री क्षेत्र भिमाशंकर संस्थान के दुपट्टे से अभिनंदन किया। वापस लौटते समय कुछ लोग मुझे देख मेरे पास आ कर कहने लगे की यह कार्य सराहनीय था और इसमें संस्थान द्वारा जल्द से जल्द कार्रवाई होनी चाहिए। मेरी किसी से व्यक्तिगत तौर पर परेशानी नहीं है, बल्कि हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का सवाल है। आशा करता हूं कि इस लेख से श्रद्धालुओं की परेशानियां कम होगी।














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