गुवाहाटी, 31 अक्टूबर । असम में फिर से भात्तृघाती संघर्ष की सृष्टि ना हो इसके लिए सभी पक्षों को संयम बरतने की जरूरत है। गत कई दिनों से नागरिक संशोधन विधेयक को लेकर वार्ता समर्थक और आत्मसमर्पणकारी अल्फा (स्वाधीन) के अलावा उग्र जातीयतावाद से ग्रसित कुछ संगठन और कुछ बंगाली संगठन अपना अलग अलग राग अलाप रहे हैं। जिसके चलते भातृघाती संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। यह राज्य के लिए अशुभ संकेत है। यह बातें हिंदू युवा छात्र परिषद के अध्यक्ष बलिन बैशय ने गुवाहाटी प्रेस क्लब में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में कही। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे जातीयतावादी नेताओं के चलते असम को भविष्य में 20 वर्ष तक विदेशियों का बोझ ढोना पड़ेगा। इस परिस्थिति को अल्फा (स्वाधीन) को गंभीरता से सोचना चाहिए था। वैश्य ने आगे कहा नागरिक संशोधन विधेयक को लेकर किसी भी हिंदू बांग्लादेशी को डरने की जरूरत नहीं है। कारण यह लोग धार्मिक कारणों से पलायन कर नए जीवन की तलाश में भारत आए हैं। नेहरू-लियाकत समझौता ओर इंदिरा-मुजीब समझौता के तहत इनको इस देश में आश्रय मिलना चाहिए। किंतु अकेला असम इस बोझ को धारण नहीं करेगा। जरूरत पड़ी तो हिंदू युवा छात्र परिषद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर भारत के विभिन्न प्रांतों में समान रूप से इन्हें बसाने का मौका दिया जाने की मांग करेंगे। असम समझौता के बारे में बोलते हुए वैश्य ने कहा असम समझौता गीता या पत्थर की लकीर नहीं है। असमिया जाति की रक्षा के लिए इसे किया गया है। अतः इसे क्रियान्वयन करना चाहिए। 1951 को आधार वर्ष मान के आगे के कदम उठाए जाएं। हिंदू बांग्लादेशियों को चिन्हित करना ही होगा। जिन को सिर्फ असम में ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र, गुजरात व अन्य प्रांतों में बसाना होगा। उन्हें जिस राज्य में भेजा जाए वहां की संस्कृति भाषा को भी ग्रहण करना होगा।








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