गुवाहाटी, 19 नवम्बर । सन 2012 से तवांग तिब्बत यात्रा शुरू हुई थी। जो आज भी निरंतर जारी है एवम इसके अच्छे संकेत भी मिलने लगे हैं। सभी प्रांतों से 450 से अधिक संख्या में लोग इस वर्ष यह यात्रा करेंगे जो आगामी कल शुरू होने वाली है। यह बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भारत तिब्बत सहयोग मंच एवं हिमालय परिवार के मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार ने गुवाहाटी प्रेस क्लब में आयोजित पत्रकार सम्मेलन में पत्रकारों को बताई। इंद्रेश जी ने आगे बताया कि चीन को यह आभास हो गया है कि तवांग पर उसका कब्जा अवैध है। चीन ने उत्तर पूर्व के लोगों को यह संदेश दे दिया कि वे हिंदुस्तान के साथ नहीं रहना चाहते हैं अतः उनको हिंदुस्तान के कब्जे से मुक्त कराने में चीन रुचि ले रहा है। किंतु किसी भारतीय ने चीन की इस बात पर ध्यान नहीं दिया एवं लोग देश की मुख्य धारा के साथ जुड़कर इसकी सर्वांगीण उन्नति के लिए काम करने लगे। इन बातों को पूरे राष्ट्र की 125 करोड़ जनता को समझाने के लिए भारत तिब्बत सहयोग मंच ने 2012 से तवांग बुमेला यात्रा शुरू की।
बुमेला चीन की सीमा पर लगा हुआ वह स्थान है जो सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इस यात्रा के लिए सारे देश के लोग किसी भी मार्ग से गुवाहाटी आकर तवांग और फिर बुमला की यात्रा करके स्थिति को समझते हैं एवं बुमला के प्रति लोगों की जानकारी समझ में आती है। 50 लोगों से शुरू हुई यह यात्रा 8 वर्ष बाद 450 तक पहुंच गई है। जबकि सामरिक दृष्टि से 200 से अधिक लोगों को ले जाने की इजाजत नहीं रहती है। रास्ता काफी दुर्गम होते हुए भी लोग इस यात्रा से जुड़ रहे हैं। यात्रा की वापसी के दौरान हर यात्री बुमला की स्थिति को अन्य लोगों के साथ साझा करता है। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए भी वह अन्य लोगों तक सही स्थिति को पहुंचाता है। इंद्रेश कुमार ने आगे बताया कि 200 वर्ष पहले का इतिहास उठाकर देख लीजिए तो पता चलेगा की चीन किसी का अच्छा पड़ोसी देश नहीं बना है। विवेकानंद ,बिपिन चंद्र पाल ने कहा था कि चीन सोया हुआ अजगर है, जो धीरे-धीरे जाग रहा है। जब यह पूरा जागेगा तो पूरे विश्व को निगल जाएगा। तब भारत भी नहीं बच पाएगा। आजादी के बाद आचार्य कृपलानी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे बुद्धिजीवियों ने भी चीन को विश्वासघाती देश बताया था। फिर भी 1954 में पंचशील समझौता नेहरू जी के साथ हुआ। यह समझौता 8 साल तक के लिए हुआ था। 8 साल पूरे होते ही चीन ने पूर्वोत्तर भारत पर हमला कर दिया। 1965 में तिब्बत को कब्जा कर दलाई लामा को निष्कासित कर दिया था। चीन के इस विस्तार बाद नीति की क्रूरता को किसी ने भी नहीं समझा था। नेहरू ने चीन को अच्छा दोस्त बनाकर उसकी क्रूरता को दबाने की चेष्टा की थी मगर हिंदी चीनी भाई भाई का नारा विफल साबित हुआ। 2014 से लेकर आज तक केंद्र सरकार ने 62 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक चीन सीमा के विकास के लिए खर्च किए हैं। ताकि जरूरत पड़ने पर यह विकास कार्य चीन के साथ मुकाबला करने में काम आ सके। वर्तमान की सरकार ने दलाई लामा पर चीन की प्रतिबंधता व भारत के राष्ट्रपति का लद्दाख व तवांग का दौरा नहीं करने की धमकी इन बातों को विफल कर दिया था। भूटान के डोकलाम विवाद को कूटनीतिक स्तर पर विफल कर दिया था। आज सरकार और सेना सतर्क है और चीन के किसी भी युद्ध के मुकाबले के लिए तैयार है। चीन की इस नीति और सही स्थिति को भारत की जनता तक पहुंचाने का उद्देश्य ही भारत तिब्बत सीमा सहयोग मंच का मुख्य उद्देश्य है। प्रेस वार्ता में भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हरजीत ग्रेवाल, महामंत्री पंकज गोयल, असम प्रांत अध्यक्ष घनश्याम लडिया, हिमालय परिवार के प्रांतीय अध्यक्ष मनोज सराफ भी उपस्थित थे।
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बुमेला चीन की सीमा पर लगा हुआ वह स्थान है जो सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है। इस यात्रा के लिए सारे देश के लोग किसी भी मार्ग से गुवाहाटी आकर तवांग और फिर बुमला की यात्रा करके स्थिति को समझते हैं एवं बुमला के प्रति लोगों की जानकारी समझ में आती है। 50 लोगों से शुरू हुई यह यात्रा 8 वर्ष बाद 450 तक पहुंच गई है। जबकि सामरिक दृष्टि से 200 से अधिक लोगों को ले जाने की इजाजत नहीं रहती है। रास्ता काफी दुर्गम होते हुए भी लोग इस यात्रा से जुड़ रहे हैं। यात्रा की वापसी के दौरान हर यात्री बुमला की स्थिति को अन्य लोगों के साथ साझा करता है। सोशल मीडिया, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए भी वह अन्य लोगों तक सही स्थिति को पहुंचाता है। इंद्रेश कुमार ने आगे बताया कि 200 वर्ष पहले का इतिहास उठाकर देख लीजिए तो पता चलेगा की चीन किसी का अच्छा पड़ोसी देश नहीं बना है। विवेकानंद ,बिपिन चंद्र पाल ने कहा था कि चीन सोया हुआ अजगर है, जो धीरे-धीरे जाग रहा है। जब यह पूरा जागेगा तो पूरे विश्व को निगल जाएगा। तब भारत भी नहीं बच पाएगा। आजादी के बाद आचार्य कृपलानी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे बुद्धिजीवियों ने भी चीन को विश्वासघाती देश बताया था। फिर भी 1954 में पंचशील समझौता नेहरू जी के साथ हुआ। यह समझौता 8 साल तक के लिए हुआ था। 8 साल पूरे होते ही चीन ने पूर्वोत्तर भारत पर हमला कर दिया। 1965 में तिब्बत को कब्जा कर दलाई लामा को निष्कासित कर दिया था। चीन के इस विस्तार बाद नीति की क्रूरता को किसी ने भी नहीं समझा था। नेहरू ने चीन को अच्छा दोस्त बनाकर उसकी क्रूरता को दबाने की चेष्टा की थी मगर हिंदी चीनी भाई भाई का नारा विफल साबित हुआ। 2014 से लेकर आज तक केंद्र सरकार ने 62 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक चीन सीमा के विकास के लिए खर्च किए हैं। ताकि जरूरत पड़ने पर यह विकास कार्य चीन के साथ मुकाबला करने में काम आ सके। वर्तमान की सरकार ने दलाई लामा पर चीन की प्रतिबंधता व भारत के राष्ट्रपति का लद्दाख व तवांग का दौरा नहीं करने की धमकी इन बातों को विफल कर दिया था। भूटान के डोकलाम विवाद को कूटनीतिक स्तर पर विफल कर दिया था। आज सरकार और सेना सतर्क है और चीन के किसी भी युद्ध के मुकाबले के लिए तैयार है। चीन की इस नीति और सही स्थिति को भारत की जनता तक पहुंचाने का उद्देश्य ही भारत तिब्बत सीमा सहयोग मंच का मुख्य उद्देश्य है। प्रेस वार्ता में भारत तिब्बत सहयोग मंच के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष हरजीत ग्रेवाल, महामंत्री पंकज गोयल, असम प्रांत अध्यक्ष घनश्याम लडिया, हिमालय परिवार के प्रांतीय अध्यक्ष मनोज सराफ भी उपस्थित थे।








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