पूजा माहेश्वरी
साढ़े तीन दशक में एक लाख लोगों की पोस्टमार्टम के लिए चीर-फाड़ की
बच्चों के ऊपर सर्जिकल ब्लेड चलते समय हाथ कांप उठते हैं
नगांव। कहते हैं कि मानव का कर्म जीवन का फैसला विधाता मनुष्य जन्म के समय ही करके उसे इस धरती पर भेजता है । बाद में मनाव उस कर्म जीवन को संजोते हुए आगे बढता है और अपने गुणों से, अपने कर्मो से, अपने सद व्योहार से उसमें जीवन के रंग भरता है। मनुष्य अपने जीवन में चाह कर भी वो नहीं कर सकता जो वह करना चाहता है। आखिरकार उसे करना वहीं पड़ता है जो उसके लिए विधाता द्वारा निर्धारित होता है । ऐसी ही एक रिपोर्ट यहां हम पाठकों के लिए लेकर आए जो विधाता के लिखें को चरितार्थ करती है। नगांव शहीद भोगेश्वरी फूकनीन सिविल अस्पताल के स्विपर दीपलाल बासफोर के कार्य जीवन के साढ़े तीन दशक पुरे कर लिए हैं। इन साढ़े तीन दशकों में उसने एक लाख से भी अधिक शवों की पोस्टमार्टम के लिए सर्जिकल ब्लेड से चीर फाड़ की है। दीपलाल नहीं होने से पोस्टमार्टम होना संभव नहीं। पोस्टमार्टम के लिए आने वाले शव की चीर-फाड़ के लिए पहले आवश्यकता होती है दीपलाल की बाद में जरुरत होती है चिकित्सक की। विधाता के लिखें कर्म जीवन की कहानी प्रस्तुत है दीपलाल बासफोर की जुबानी। साढ़े तीन दशक के अपने कार्य जीवन का वृत्तांत सुनाते हुए दीपलाल ने बताया कि साढ़े तीन दशक में उन्होंने पोस्टमार्टम करने के लिए एक लाख से भी अधिक शवों की सर्जिकल ब्लेड से चीर-फाड़ की है परन्तु किसी बच्चे के शव को वे पोस्टमार्टम टेबल पर देखते हैं तो उनकी आंखें नम हो जाती है और सर्जिकल ब्लेड हाथ में लेने के बाद हाथ कांपने लग जाते हैं । आंखों से बहती अश्रु धारा के बीच कांपते हाथों से वें अपना कर्म करते हैं परन्तु उन्हें बहुत दुःख होता है। इतना कहते कहते दीपलाल की आंखें झलक आती हैं। साढ़े तीन दशक से ऐसा हृदय विदारक कार्य करने वाले दीपलाल बासफोर का ह्रदय कितना कोमल है यह उसकी झलकती आंखों के आंसू बताने के लिए काफी थे। उन्होंने बताया कि पेट की आग बुझाने और परिवार के भरण-पोषण के लिए वे यह काम करते हैं लेकिन पोस्टमार्टम करने के बाद उनका मन विचलित रहता है। चिकित्सालय के शव गृह और पोस्टमार्टम कक्ष में ही उनका जीवन व्यतीत हुआ है। अब वे चाह कर भी इस कर्म से दूर नहीं हो सकतें। पिछले 35 वर्षों से चिकित्सालय के पोस्टमार्टम कक्ष में शव को चीर-फाड़ करने के दायित्व में वें लगें हुए हैं। उन्होंने कहा कि इन वर्षों में उन्होंने हर छोटे-बड़े उम्र के शवों की सर्जिकल ब्लेड से पोस्टमार्टम के लिए चीर-फाड़ की है ।कारण यही उनका मूल कार्य है। जिसकी कुल संख्या अब एक लाख के पार हो गई है। दीपलाल के नहीं आने तक चिकित्सक के लिए पोस्टमार्टम करना संभव नहीं होता है। क्योंकि वें जब तक शव को चीर-फाड़ नहीं करते चिकित्सक पोस्टमार्टम की बिना जांच किए पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार नहीं कर पाते हैं। दिन भर शवों के साथ रहने वाले दीपलाल कठोर व्यक्ति नहीं बल्कि एक संवेदनशील हृदय वाले व्यक्ति हैं। कभी कभी तो शव को पोस्टमार्टम टेबल पर रखने के बाद उनका मन सर्जिकल ब्लेड चलते समय डोल उढता है। वें नहीं चाह कर भी उन्हें शव की चीर-फाड़ करनी पड़ती है। दीपलाल बासफोर नगांव शहीद भोगेश्वरी फूकनीन सिविल अस्पताल में वर्ष 1986 में एक सफाई कर्मचारी के रूप में अपनी सेवा (नौकरी) का शुभारंभ किया था। शुरूआती तीन महीने उन्हें चिकित्सालय के अध्यक्ष कार्यालय की साफ-सफाई में व्यतित किये बाद में उन्हें शव गृह और पोस्टमार्टम कक्ष में नियुक्त कर दिया गया ।तब से आज तक लगभग 35 वर्षों से वें पोस्टमार्टम के लिए शवों की चीर-फाड़ करने के कार्य में ही लगें हुए हैं। दीपलाल ने आगे बताया कि प्रथम दिन शव को पोस्टमार्टम टेबल पर रखने के बाद सर्जिकल ब्लेड से चीर-फाड़ की तो उस दिन बहुत डर लगा था ।मन दिन भर विचलित रहा। प्रथम तीन महीने रात को नींद नहीं आती थी ।मन विचलित रहता था ।रात को सपने में चीर-फाड़ किए हुए शव दिखाई देते थे। पहले पहल हाथ भी कांपते थे। बाद में धिरे धिरे सब कुछ सामान्य होता चला गया। मन को यहीं दिलासा दिया कि यही मेरा कर्म है और यहीं मेरा कर्तव्य । वें अपना कर्म करते जा रहे हैं। अब हाथ नहीं कांपते। उन्होंने फिर एक अतीत की बात बताते हुए कहा कि यह 31 वर्ष पहले की बात है जब एक छोटी बालिका का शव पोस्टमार्टम टेबल पर रखने के बाद जैसे सर्जिकल ब्लेड हाथ में उढाया उनके दोनों हाथ कांपने लगे और वें चाह कर भी अपने मन को शांत नहीं कर पा रहे थे । वें काफी देर तक स्तब्ध होकर अपनी शारीरिक अवस्था और शव को देखते ही जा रहें थे । आंखों से अश्रु धारा बह रही थी । कर्म ही जीवन है को मानते हुए उन्होंने शव की चीर-फाड़ की परंतु उस दिन ना तो भोजन किया और ना ही रात को नींद आई। उन्होंने आगे बताया कि आत्महत्या करने वाले , दुर्घटनाग्रस्त हो कर मरने वाले लोगों की अस्वभाविक मौत होने वाले लोगों के शव को पोस्टमार्टम टेबल पर रखने के बाद सर्जिकल ब्लेड से ऊपर से नीचे तक चीरना पड़ता है जो एक हृदय विदारक कार्य है। अपने कर्म जीवन को निभाते हुए दीपलाल यह काम करते आ रहे हैं परंतु आज भी कोई बच्चें का शव उनके सामने होता है तो उनका हृदय कांप उढता है , सांसें फूलने लगती है और हाथ कांपने लग जाते हैं । दुर्घटनाग्रस्त होकर मरने वाले किसी बच्चे का शव जब पोस्टमार्टम टेबल पर आता है तो बच्चे के अभिभावक पोस्टमार्टम के लिए शव को काटने नहीं देते और रो रोकर आसमान उढा लेते हैं तब उनसे भी रहा नहीं जाता और वें भी रो पड़ते हैं । ऐसे में बच्चों के शव की चीर-फाड़ करने का उनका मन नहीं करता । उन्होंने आगे बताया कि अस्पताल में रोज पांच-छ शव पोस्टमार्टम के लिए आते हैं। कभी कभी तो एक दिन में 10-15 तक शव पोस्टमार्टम के लिए आ जाते हैं। 1992 के संप्रदायिक दंगों के समय एक दिन में 56 लोगों के शव पोस्टमार्टम के लिए आये थे और उन्होंने अकेले ही शवों की पोस्टमार्टम के लिए चीर-फाड़ की थी ।वो दृश्य अति मार्मिक था दीपलाल के जीवन में । मृत्युदेह पोस्टमार्टम करने वाले दीपलाल कहते हैं कि शवों की पोस्टमार्टम के लिए चीर-फाड़ करना सहज काम नहीं है परन्तु उनका कर्म यहीं है मान कर वो इसे सहजता से और कर्मठता से ग्रहण किए हुए हैं। सरकारी सुविधाएं उन्हें प्राप्त हैं जिससे वे संतुष्ट नजर आ रहे थे। दरमाहा उन्हें समय-समय पर मिलता है फिर भी वें चाहते हैं कि एक मददगार सेवक की सरकार नियुक्ति करें । वें अकेले हीं सभी कार्य निष्ठा से करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे परंतु एक स्विपर की ओर नियुक्ति हो जाती है तो उन्हें कार्य करने में मदद मिलेगी। उनका चार सदस्यों का परिवार है जिसमें उनकी पत्नी ,पुत्र और पुत्र वधू शामिल हैं। सभी एक सरकारी आवास में रहते हैं। पुत्र इसी चिकित्सालय में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहा है । साधारणतया देखा जाता है कि शव गृह में काम करने वाले कर्मचारी मदिरा का सेवन कर ऐसे कार्य करते हैं परन्तु दीपलाल ने अपने जीवन में कभी शराब को छुआ तक नहीं है यह दीपलाल के लिए एक आदर्श उदाहरण हैं । दीपलाल बासफोर के आदर्श और कर्मठ कार्य जीवन के लिए नगांव की विभिन्न संस्थाओं ने समय समय पर उनका अभिवादन कर उनकी सराहना की है । जिसे हम उनके आदर्श व कर्मठ कार्य जीवन की सामाजिक स्वीकृति भी कह सकतें हैं।








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