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आइए सुनते हैं राजस्थान के कई घुमंतू परिवारों की दास्तान

 


गुवाहाटी। गुवाहाटी के विभिन्न अंचलों में जैसे खानापाड़ा, लोखरा भरलूमुख ए टी रोड के फुटपाथ पर राजस्थान के कई घुमंतू बंजारा परिवारों ने अपना डेरा डाल रखा है। जीविका उपार्जन के लिए आकर्षक घोडे बनाते हैं जो कि देखने में काफी मजबूत और सुंदर होते हैं ।साथ ही हवा से फूलाने वाले कई खिलौनों को भी ये लेकर घूमते रहते हैं।यही है इनकी रोजी रोटी और उपार्जन का एकमात्र साधन। राजस्थान के अलवर, दौसा और जयपुर जिलों से कई बंजारा परिवार साल में दो-तीन बार आसाम ,बंगाल  त्रिपुरा, अरुणाचल इन राज्यों में घूम घूम कर यह सामान बिक्री करते हैं। जब इनके परिवार के सदस्यों से इस वजह के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि जीविका उपार्जन के लिए हम पूर्वोत्तर के राज्यों के अलावा अन्य राज्यों में भी घूमते रहते हैं। साल भर में हम पूरे भारत का चक्कर लगाकर कपड़े के बनाए हुए घोड़े हुए हवा से फुलाये हुए प्लास्टिक के खिलौने बिक्री करते हैं। राजस्थान में इनका कोई स्थाई ठोर ठिकाना नहीं होता है ।वहां इनके बनाए हुए यह खिलौनों की मांग भी कम होती है। क्योंकि इस तरह के हजारों परिवार एक ही तरह का धंधा करने के कारण मांग कम हो जाती है।ये ऐसे क्षेत्रों को चुनते हैं जहां इस तरह के खिलौने , कपड़े के घोड़े नहीं मिलते हैं। बंजारों ने अपनी कहानी सुनाते हुए यह भी बताया कि राजस्थान सरकार की ओर से उन्हें किसी भी तरह की सहायता नहीं मिलती है। महीने में सिर्फ 5 किलो अनाज मिलता है। जिससे 2 दिन भी काम नहीं चलता ।पैसे वाले लोग खाना देने की शर्त पर इनसे काम करवा लेते हैं ।घुमंतू बजारा परिवार की रहन-सहन शैली भी अलग ही होती है। किसी भी जगह पर यह तंबू तान कर रहे लेते हैं और किसी भी खुली जगह पर खाना बनाकर यह अपना पेट भर लेते हैं। इनके छोटे-छोटे बच्चे भी इनके साथ होते हैं। जिनका कोई भविष्य नजर नहीं आता ।शिक्षा से इनके बच्चे कोसों दूर रहते हैं। क्योंकि बच्चों को शिक्षा अध्ययन करवाने के लिए इन्हें अपने गृह जिले में रहना पड़ता है। जहां जीविका उपार्जन का कोई साधन इनके पास नहीं होता । सरकार भी इनकी इस समय समस्याओं से अनजान बनी रहती है। सरकारी स्कूलों में इन बच्चों को मुफ्त में शिक्षा तो मिल जाती है लेकिन पेट भरने का साधन इनके परिवार के पास नहीं होता।

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