गुवाहाटी, असम ही नहीं पूरे पूर्वोतर में राजस्थानी होली का अपना एक अलग वोअंदाज है। होली आने के करीब एक महीने पहले से ही टोली बनाकर चंग की धमाल और होली के गीत गाते हुए लोग देखे जा सकते हैं। करीब महीने भर तक चलने वाली इस मस्ती में और अधिक रंग भरने के लिए अब न सिर्फ अधिक स्थानीय ग्रुप और लोक कलाकार तैयार हो गये हैं, बल्कि राजस्थान के विभिन्न इलाकों से भी कलाकार आकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं और लोगों को होली के रस में सराबोर करते हुए आनंदित करते हैं। होली के दौरान गुवाहाटी सहित पूर्वोतर में राजस्थानी होली की धमाल के कलाकारों का एक बड़ा जमावड़ा देखा जा सकता है, जो पूर्वोतर की इस शस्य श्यामला धरा पर धोरा री धरती की सोंधी-सोंधी खुशबू बिखेर देता है। किंतु कलाकारों के आकाश में नक्षत्रों के समान इस जमावड़े के बीच लोकगायक बद्री व्यास चंद्रमा के समान राजस्थानी लोक कला के सम्राट के समान चमकता है। सच तो ये है कि पूर्वोत्तर में फागण की धमाल को एक नया आयाम देने वाला कलाकार ही बद्री व्यास है। बद्री ने ही सबसे पहले टोलियों में चलने वाले होली के कार्यक्रमों को मंचीय स्वरूप प्रदान किया, जिसे आज हम अलग-अलग कलाकारों द्वारा प्रस्तुत होते हुए देखते हैं। बहुत से लोगों को शायद पता भी नहीं होगा कि बद्री को यह प्रेरणा असम के महान संगीतज्ञ, गायक, फिल्मकार भूपेन हजारिका से मिली। भूपेन दा ने न सिर्फ बद्री को अपना वाद्ययंत्र दिया, बल्कि लोक गायन के इस महासागर में कूद पड़ने और तैरने का साहस भी दिया। उनके आशीर्वाद से बद्री ने इस दिशा में भगवान नटराज का नाम लेकर जो छलांग लगाई, उसकी लाज आज भी मां सरस्वती रख रही है। बद्री के लोकगायन के क्षेत्र में आने के बाद होली या फाग के संगीत की दशा और दिशा ही बदल गयी। बहुत से कलाकारों का इसके बाद पूर्वोत्तर में आना शुरु हो गया। परंतु आज भी कलाकारों की इस भीड़ में आज भी कोई उस ऊंचाई को नहीं छू पाया, जहां खड़ा होकर बद्री पिछले तीन दशकों से भी अधिक समय से राजस्थानी लोकगायन का बेताज बादशाह बना हुआ है। जो प्यार, मोहब्बत और शोहरत इस क्षेत्र में बद्री को लोगों ने दी है, वो बेमिसाल है। बद्री की एक और खासियत है कि उसने अपनी कला को कभी खुद तक सीमित नहीं रखा। उसने स्थानीय असमिया तथा अन्य भाषा के कलाकारों को भी राजस्थानी लोकगायन के साथ जोड़ा। इससे न सिर्फ सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ, बल्कि विभिन्न कलाकारों को रोजगार भी मिला। बद्री सही मायनों में एक कलाप्रेमी कलाकार है, जो दूसरे कलाकारों की कला का सम्मान करता है और उन्हें आगे बढ़ने का मौका देता है। सच तो ये है कि पूर्वोत्तर ही नहीं देश में भी राजस्थानी लोकगायन और खासकर होली की धमाल के कुछेक चुनिंदे कलाकारों में शुमार है बद्री। वो राजस्थानी लोकगायन का बद्री ही नहीं बद्री विशाल है।
बसंत पंचमी के बाद से ही गली-चौराहों पर चंगों की थाप सुनाई देने लगी है और इसके साथ ही होली प्रेमियों का मन मचलने लगा है होली की फुहारों की तरह| होली के दिन जैसे-जैसे पास आते हैं मौसम भी बावरा और बेईमान होने लगता है| होली केवल रंग, अबीर, पिचकारी और गुलाल का ही नाम नहीं है, यह फगुवाहटी बयार और मस्ती तथा हंसी-ठिठोली का त्योहार है जिसमें हर कोई बच्चा, जवान, बूढ़ा डूबना चाहता है| बसंत पंचमी के बाद होली के दिन तक पूरे एक माह से अधिक होली धमाल हर गांव-शहर की हर गली-चौराहे पर सुनाई देगी| फागुन आते ही बरबस ही मस्ती, रंग और फागों की झलक आंखों के सामने तैरने लगती है और इसी फागुनी बयार में सुनाई देने लगते हैं सदाबहार गीत-होलिया में उड़े रे गुलाल...| चालो देखण ने बाइसा थारो वीरो नाचे रे...इत्यादि| राजस्थान की लोक परंपराओं और प्रथाओं में फागुन मास के अल्हड़ लोकगीत और चंग की थाप अपना एक अलग ही महत्व रखते हैं| मस्ती और छेड़छाड़ भरे लोकगीतों के स्वर उस समय अधिक सुरीले हो जाते हैं जब घुंघरू की झंकार के साथ चंग की थाप में मस्तानों की टोलियां झूमती नजर आने लगती हैं| होली के त्योहार की मस्ती हो और चंग न बजे, ऐसा कैसे हो सकता है|
होली के आगमन के साथ ही हर चौराहे पर चंगों की थाप सुनाई देने लगती है और ऐसे मनमोहक क्षणों में सुरमयी अंदाज लिए जब गुवाहाटी में होली की टोलियां-जिनमें रंगीलो राजस्थान तथा होली की टोली सहित अन्य छोटी-छोटी टोलियां दस्तक देती हैं तो होली प्रेमी लालायित हो उठते हैं इन्हें देखने-सुनने को। फैंसी बाजार में फ्रेंड्स क्लब के तत्वावधान में होली के मौके पर होने वाले सांस्कृतिक आयोजन की सभी लोग बाट जोहते हैं|
आधुनिकता की चादर में समय ने बहुत सारी करवटें लीं लेकिन आज भी राजस्थानी समाज की लोक संस्कृति की झलक हमें होली के अवसर पर खूब देखने को मिलती है| सभी लोग अपने-अपने ढंग से होली की परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं| इनमें रंगीलो राजस्थान तथा होली की टोली की टीम अहम भूमिका निभा रहे हैं जो कि राजस्थान से सुदूर पूर्वोत्तर भारत में राजस्थानी लोक परंपरा को जीवित रखे हुए है|
लोक गायक बद्री व्यास की सुरगंगा म्यूजिकल टीम इस लोक परंपरा को आगे बढ़ाने में एक अहम स्थान रखती है| बद्री व्यास पारंपरिक×तथा होली के अत्याधुनिक गीतों और धमाल से पिछले कई दशकों से देश तथा पूर्वोत्तर के लोगों, खासकर असम के होली प्रेमियों को आनंदित करते आए हैं|
लोक गायक बद्री व्यास सुरगंगा की अपनी टीम के साथ एक बार फिर फागुन की फिजा में रंग घोलने के लिए तैयार हैं| गौरतलब है कि इस बार होली ४ मार्च (बुधवार) को है|
यह सर्वविदित है कि पूर्वोत्तर भारत में पारंपरिक होली को स्टेज पर लाने का श्रेय लोकगायक बद्री व्यास को जाता है| उन्होंने तीन दशक पहले इसकी शुरुआत की थी | पहले यहां कभी भी होली का स्टेज प्रोग्राम नहीं होता था| उन्होंने ही छोटे रूप से इसकी शुरुआत की जो कि आज विशाल रूप ले चुका है| अब पूर्वोत्तर के हर गांव-हर शहर में होली के स्टेज शो होते हैं| इसमें एक खास बात यह भी थी कि बद्री व्यास के स्टेज शो में सारे स्थानीय कलाकार असमिया कलाकार होते हैं| चाहे वे म्यूजिशियन हों या फिर गायिका हों या नृत्यांगना हों| सब कुछ लोकल होता है| बद्री व्यास ने न सिर्फ यहां के कलाकारों को राजस्थानी भाषा से अवगत कराया, बल्कि वाद्य कलाकारों को राजस्थानी संगीत का गुर सिखाया| ये बद्री व्यास ही थे जिन्होंने असम में राजस्थानी होली गीतों के एलबम की शुरुआत की| उन्होंने जब होली कार्यक्रम पेश करना आरंभ किया तब से असम के ही गायिकाओं के साथ मिलकर होली गीतों के एलबम का यह सिलसिला शुरू हो गया| उसके बाद लगातार सुरगंगा के बैनर तले कई राजस्थानी होली के एलबम बनाए गए, जो कि सुपरहिट हुए| बद्री व्यास पूर्वोत्तर के छोटे से लेकर सभी बड़े शहरों में होली के कार्यक्रम कर चुके हैं|
वे कहते हैं- ‘वैसे सुरगंगा म्यूजिकल ग्रुप अब इतना बड़ा हो चुका है कि मेरे साथ काफी कलाकार असम के बाहर से जुड़ गए हैं| अब मुझे पूरे साल देशभर में राजस्थानी गीतों के लिए श्रोतागण आमंत्रित करते रहते हैं| यह सब मेरे लिए श्रोताओं का बहुत बड़ा सम्मान है|’ सुरगंगा की टीम जहां भी जिस मंच पर अपना कार्यक्रम पेश करती है वह अपनी छाप छोड़ जाती है|
बद्री व्यास और सुरगंगा की पूरी टीम को श्रोताओं का भरपूर सम्मान मिलता रहा है और जहां भी जिस मंच पर जाते हैं वहां धूम मचाकर रख देते हैं|
बहरहाल, असम के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों के संगीत रसिकों व लोगों के मन-मिजाज को फगुवाहटी तेवर वजी खवीनकते सुरों से सराबोर करने के लिए इस बार भी बद्री व्यास अपनी पूरी टीम के साथ होली का धमाल मचाने को तैयार हैं|









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