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शीतलता की देवी शीतला माता



गुवाहाटी, होली के बाद शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है। यह होलिका दहन के आठवें दिन और चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है। विशेष कर उत्तर भारत जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। आमतौर पर लगभग सभी पूजा पाठ एवं देवी देवताओं की अर्चना में शुद्ध और ताजा व्यंजनों का ही भोग लगाया जाता है। लेकिन शीतला माता को बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा है। बासी और ठंडा भोजन का भोग लगाने पर माता प्रसन्न होती है। इसलिए शीतला अष्टमी के दिन उनके श्रद्धालुओं के घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। सप्तमी तिथि पर ही घरों में पूरी, पकौड़ी,कड़ी, मीठा चावल, हलवा आदि जैसे व्यंजन तैयार किए जाते हैं और अगले दिन शीतला अष्टमी पर इन चीजों का भोग लगाया जाता है। बासी भोजन का भोग लगाने के कारण इस पर्व को राजस्थान और हरियाणा में बासौड़ा या बासीड़ा नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन शीतला माता की पूजा होती है। शीतला माता को रोग सुख और विशेष कर चेचक तथा त्वचा रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। शीतल शब्द का अर्थ होता है शीतलता प्रदान करने वाली देवी। लोक मान्यता के अनुसार शीतला माता के आशीर्वाद से ही घर परिवार में स्वास्थ्य और सुख शांति बनी रहती है। इस अवसर पर घर में सभी बच्चों को विशेष रूप से शीतला माता की पूजा करवाई जाती है एवं बच्चों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

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