राजेश राठी, लखीमपुर
जब कोई व्यक्ति डॉक्टर के पास जाता है, तो वह केवल दवा लेने नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य और जीवन का विश्वास चिकित्सक के हाथों सौंपने जाता है। जांच के बाद डॉक्टर द्वारा दी गई प्रिस्क्रिप्शन उपचार की आधारशिला होती है। यह केवल एक कागज नहीं, बल्कि ऐसा चिकित्सकीय और कानूनी दस्तावेज है, जो मरीज की दवा, उसकी मात्रा, सेवन की अवधि और उपचार की दिशा तय करता है। इसलिए प्रिस्क्रिप्शन का स्पष्ट और मानक अनुसार लिखा जाना केवल अच्छी लिखावट का विषय नहीं, बल्कि मरीज की सुरक्षा, चिकित्सा नैतिकता और कानूनी जवाबदेही का प्रश्न है।
आज भी अनेक सरकारी और निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम तथा क्लीनिकों में ऐसी प्रिस्क्रिप्शन लिखी जाती हैं जिन्हें मरीज ही नहीं, कई बार उसके परिजन भी पढ़ नहीं पाते। परिणामस्वरूप मरीज पूरी तरह मेडिकल स्टोर या किसी तीसरे व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है। यह स्थिति मरीज के सूचना के अधिकार और सुरक्षित उपचार के अधिकार के अनुरूप नहीं मानी जा सकती।
यह विषय चिकित्सकों की निष्ठा या सेवा भावना पर प्रश्नचिह्न लगाने का नहीं है। देश के लाखों डॉक्टर कठिन परिस्थितियों में समर्पण के साथ सेवाएं दे रहे हैं और उनका योगदान अत्यंत सम्माननीय है। लेकिन चिकित्सा पेशे की गरिमा तभी और बढ़ती है जब उपचार के साथ पारदर्शिता, स्पष्टता और निर्धारित मानकों का भी पालन हो।
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने प्रिस्क्रिप्शन लेखन के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए हैं। प्रत्येक प्रिस्क्रिप्शन में डॉक्टर का नाम, योग्यता, पंजीकरण संख्या, अस्पताल या क्लीनिक का विवरण, तिथि, मरीज का नाम, आयु, आवश्यक चिकित्सकीय जानकारी, दवाओं का स्पष्ट उल्लेख, उनकी मात्रा, सेवन की विधि एवं अवधि तथा डॉक्टर के हस्ताक्षर होना चाहिए। इन मानकों का उद्देश्य मरीज को सुरक्षित, वैज्ञानिक और पारदर्शी उपचार उपलब्ध कराना है।
स्पष्ट प्रिस्क्रिप्शन की आवश्यकता केवल दवा खरीदने तक सीमित नहीं है। यदि मरीज को किसी अन्य अस्पताल में रेफर किया जाए, किसी विशेषज्ञ से परामर्श लेना हो या भविष्य में उपचार का रिकॉर्ड देखना पड़े, तो यही दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण बनता है। अस्पष्ट प्रिस्क्रिप्शन उपचार में विलंब, दवा संबंधी भ्रम और चिकित्सकीय त्रुटियों का कारण बन सकती है।
अक्सर कहा जाता है कि मेडिकल स्टोर वाले डॉक्टर की लिखावट समझ लेते हैं। लेकिन प्रिस्क्रिप्शन सबसे पहले मरीज का दस्तावेज है, किसी मेडिकल स्टोर का नहीं। मरीज को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसे कौन-सी दवा क्यों दी गई है, कितनी मात्रा में लेनी है और कितने समय तक उसका सेवन करना है।
भारत डिजिटल हेल्थ मिशन और ई-हेल्थ रिकॉर्ड की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में ई-प्रिस्क्रिप्शन प्रणाली को व्यापक रूप से अपनाना समय की आवश्यकता है। इससे लिखावट संबंधी भ्रम समाप्त होगा, उपचार का रिकॉर्ड सुरक्षित रहेगा और दवा संबंधी त्रुटियों में कमी आएगी।
अब आवश्यकता केवल नियम बनाने की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी पालन की है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग, राज्य चिकित्सा परिषदों तथा अस्पतालों को नियमित प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट, चिकित्सकों के प्रशिक्षण और मानकों की समीक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। जहां कमियां हों, वहां पहले सुधारात्मक कदम उठाए जाएं और आवश्यक होने पर नियमानुसार कार्रवाई भी की जाए।
साथ ही आम नागरिकों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना चाहिए। यदि प्रिस्क्रिप्शन स्पष्ट न हो, तो मरीज विनम्रतापूर्वक डॉक्टर से उसे समझाने या स्पष्ट लिखने का अनुरोध कर सकता है। दवा के जेनेरिक नाम, सेवन की विधि और संभावित दुष्प्रभावों की जानकारी प्राप्त करना भी उसका अधिकार है।
एक विकसित स्वास्थ्य व्यवस्था की पहचान केवल आधुनिक अस्पतालों से नहीं होती, बल्कि ऐसी व्यवस्था से होती है जहां मरीज के अधिकार सुरक्षित हों, उपचार पारदर्शी हो और कानून का सम्मान किया जाए। डॉक्टर की पर्ची कभी भी ऐसी पहेली नहीं होनी चाहिए जिसे समझने के लिए किसी तीसरे व्यक्ति की आवश्यकता पड़े।








कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें