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लखीमपुर में चल रहे चिकित्सकों के प्रिस्क्रिप्शन नियमों की अनदेखी पर बड़े सवाल: क्या मरीजों के अधिकारों से हो रहा खिलवाड़?



अपठनीय पर्चियां, चिकित्सकों की पसंदीदा फार्मेसी से दवा खरीदने की मजबूरी और नियमों के पालन पर उठे गंभीर प्रश्न


लखीमपुर से राजेश राठी कि रिपोर्ट


लखीमपुर, लखीमपुर जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा प्रिस्क्रिप्शन लिखने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बावजूद जिले के कई सरकारी और निजी चिकित्सकों द्वारा इन नियमों का पूर्ण पालन नहीं किए जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। इससे न केवल मरीजों के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि चिकित्सा व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी प्रश्नचिह्न लग रहा है। मरीजों और उनके परिजनों की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि कई चिकित्सकों द्वारा लिखी गई प्रिस्क्रिप्शन इतनी अस्पष्ट होती हैं कि मरीज स्वयं यह तक नहीं समझ पाता कि उसे कौन-सी दवा, कितनी मात्रा में और कितने दिनों तक लेनी है। कई मामलों में दवा का नाम, मात्रा, सेवन की अवधि, चिकित्सक का पंजीकरण संख्या, हस्ताक्षर अथवा अन्य आवश्यक विवरण भी स्पष्ट रूप से अंकित नहीं होते। परिणामस्वरूप मरीज पूरी तरह मेडिकल स्टोर संचालकों पर निर्भर हो जाता है। इतना ही नहीं, जिले में कुछ चिकित्सकों के विरुद्ध एक और गंभीर आरोप भी सामने आ रहा है।मरीजों का कहना है कि कई डॉक्टर ऐसी कंपनियों की दवाएं लिखते हैं जो केवल उनके अपने या उनकी पसंदीदा फार्मेसी पर ही उपलब्ध रहती हैं। जब मरीज वही दवा किसी अन्य मेडिकल स्टोर पर लेने पहुंचते हैं तो उन्हें साफ कह दिया जाता है कि यह दवा केवल उसी निर्धारित दुकान पर मिलेगी, कहीं और नहीं। ऐसी स्थिति में मरीजों के सामने कोई विकल्प नहीं बचता। मजबूरी में उन्हें उसी फार्मेसी से बिना किसी छूट के दवा खरीदनी पड़ती है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कुछ स्थानों पर मरीजों की मजबूरी का लाभ उठाकर दवाइयों के नाम पर एक प्रकार का सिंडिकेट तो नहीं चल रहा? यदि ऐसा है तो इसकी निष्पक्ष जांच अत्यंत आवश्यक है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार प्रिस्क्रिप्शन केवल एक पर्ची नहीं, बल्कि मरीज के उपचार का सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय और कानूनी दस्तावेज होता है। इसी के आधार पर दवा दी जाती है, आगे का इलाज तय होता है तथा आवश्यकता पड़ने पर यही दस्तावेज कानूनी साक्ष्य के रूप में भी उपयोग किया जाता है। एनएमसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रत्येक प्रिस्क्रिप्शन पर चिकित्सक का नाम, योग्यता, पंजीकरण संख्या, अस्पताल या क्लीनिक का नाम, तिथि, मरीज का विवरण, रोग का संक्षिप्त उल्लेख, दवा का स्पष्ट एवं पढ़ने योग्य नाम, दवा की मात्रा, सेवन की अवधि, हस्ताक्षर तथा सील अंकित होना आवश्यक माना गया है। साथ ही जहां संभव हो, जेनेरिक नामों में दवा लिखने और स्पष्ट लेखन पर विशेष बल दिया गया है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब संबंधित स्वास्थ्य विभाग को यह जानकारी होने की बात कही जाती है कि जिले के किन चिकित्सकों द्वारा इन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा, तो अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाएं और उनके पालन की निगरानी न हो, तो उनका उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। जनस्वास्थ्य से जुड़े जानकारों का कहना है कि अपठनीय प्रिस्क्रिप्शन केवल सुविधा का नहीं बल्कि मरीज की सुरक्षा का विषय है। दवा का नाम या मात्रा गलत समझे जाने पर गंभीर चिकित्सकीय जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। इसका सबसे अधिक खतरा बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा मधुमेह, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीजों को होता है। जिले के जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि जिला स्वास्थ्य विभाग सरकारी एवं निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम तथा क्लीनिकों में प्रिस्क्रिप्शन लिखने के नियमों के पालन की नियमित जांच करे। साथ ही यदि किसी चिकित्सक द्वारा नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो नियमानुसार कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि अब लखीमपुर जिले में चरणबद्ध तरीके से ई-प्रिस्क्रिप्शन प्रणाली लागू करने की दिशा में गंभीर पहल की जानी चाहिए। इससे अपठनीय लिखावट की समस्या समाप्त होगी, मरीजों को स्पष्ट जानकारी मिलेगी तथा उपचार का डिजिटल रिकॉर्ड भी सुरक्षित रहेगा। यह समाचार किसी चिकित्सक की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि मरीजों के अधिकारों, सुरक्षित उपचार, पारदर्शी चिकित्सा व्यवस्था तथा कानून के समान पालन की आवश्यकता को सामने लाने के उद्देश्य से प्रकाशित किया गया है। जिले के अधिकांश चिकित्सक पूरी ईमानदारी और समर्पण के साथ अपनी सेवाएं दे रहे हैं, किंतु यदि कहीं नियमों की अनदेखी हो रही है तो उसका सुधार भी उतना ही आवश्यक है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य मंत्री एवं लखीमपुर जिला आयुक्त तथा जिला स्वास्थ्य विभाग इन गंभीर शिकायतों का संज्ञान लेकर प्रभावी कार्रवाई करेगा, या फिर मरीजों को इसी तरह अपठनीय प्रिस्क्रिप्शन और सीमित विकल्पों के बीच अपनी जेब और स्वास्थ्य दोनों की कीमत चुकानी पड़ेगी?

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